खरी खरी : कारपोरेट को साथ लेकर चले और अब आमने-सामने खड़े हैं , अंजाम क्या होगा ?
भारत और विदेशों लाये गये पशु खास तौर पर हाथियों का लाना कितना सही था या कितना गलत था ? वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 और उसके अंतर्गत बनाये गये नियमों का पालन हो रहा है या नहीं हो रहा है ? वनस्पति और विलुप्त होने वाले जीव, उन प्रजातियों के व्यापार अंतराष्ट्रीय सम्मेलन (सीआईटीआईएस) और जीवित पशुओं के एक्सपोर्ट, इम्पोर्ट के लिए जो भी कानून बनाये गये हैं उनका पालन हो रहा है या नहीं हो रहा है ? पशुपालन, पशु चिकित्सा-देखभाल, पशु कल्याण मानक, पशुओं की मृत्यु दर, उसके कारणों का भी पता लगाईये, क्या हो रहा है अंदर ? जलवायु परिवर्तन परिस्थितियों से संबंधित शिकायतें, औद्योगिक क्षेत्र अगर निकट है तो उसका पशुओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? वेनिटी या निजी संग्रह से जो प्रजनन होता है या जो संरक्षण कार्यक्रम होता है तथा जैव विविधता संसाधनों के उपयोग से संबंधित शिकायतों की जांच ? पानी और कार्बन क्रेडिट के दुरुपयोग की शिकायतों की जांच ? याचिका में सामान्यतः न बोली जाने वाली कहानियां और लेख में उल्लिखित कानून के विभिन्न प्रावधानों का उल्लंघन करने वाली शिकायतें जिसके तहत पशु और पशु उत्पादकों के व्यापार और वन्य जीव तस्वीर आदि की जांच ? वित्तीय अनुपात (मनी लॉन्ड्रिंग) और वित्तीय अनियमितता की जांच ? जो भी आरोप लगाये गये हैं यदि वे किसी दूसरे मुद्दे या मामले से जुड़ते हैं तो उसकी भी जांच ? ये वे बिंदु हैं जिनकी जांच कर 12 सितम्बर तक रिपोर्ट देनी है सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित की गई चार सदस्यीय हाईप्रोफाइल एसआईटी को मुकेश अंबानी के छोटे बेटे अनंत अंबानी के द्वारा संचालित किये जा रहे वनतारा वन्यजीव बचाव और पुनर्वास एवं संरक्षण केन्द्र में। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित की गई एसआईटी हाईप्रोफाइल इसलिए भी है कि इसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस जे चेलमलेश्वर (की अगुआई), जस्टिस राघवेन्द्र चौहान (पूर्व चीफ जस्टिस उत्तराखंड व तेलंगाना हाईकोर्ट), मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर हेमंत नागराले एवं कस्टम्स अधिकारी अनिश गुप्ता को शामिल किया गया है। यह एसआईटी टीम हाईप्रोफाइल इसलिए भी है कि मुकेश अंबानी जैसे कार्पोरेट के लिए भी इन सदस्यों को प्रभावित करना आसान नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने जिन बिंदुओं को तय कर जांच रिपोर्ट मांगी है और जिनसे जांच रिपोर्ट मांगी है उन्हें देखकर प्रथम दृष्टया तो यही कहा जा सकता है कि उसने अंबानी परिवार और एसआईटी टीम के सामने बहुत बड़ा अग्नि परीक्षा जैसा संकट खड़ा कर दिया है। कहा जा सकता है कि यदि एसआईटी टीम ने सही रिपोर्ट दे दी तो वनतारा में ताला लग जायेगा। वनतारा का ताला तभी खुला रह सकता है जब एसआईटी टीम सही रिपोर्ट ना सौंपे।
मुकेश अंबानी के छोटे बेटे अनंत अंबानी का एक महत्वाकांक्षी ड्रीम प्रोजेक्ट है वाइल्ड लाइफ रेस्क्यू रिहैबिलिटेशन सेंटर वनतारा। जिसका उद्देश्य है घायल और संकटग्रस्त वन्यजीवों को बचाकर उनका उपचार करना, उन्हें प्राकृतिक आवास जैसा माहौल प्रदान कर उनका पुनर्वास करना। यह एक विशाल एनिमल रेस्क्यू सेंटर है जिसे हाथियों, तेंदुओं, मगरमच्छों और दुर्लभ प्रजाति के जानवरों का घर कहा जाता है। यहां का सालाना खर्चा लगभग 150 से 200 करोड़ रुपये का बताया जाता है। इस वन्यजीव संरक्षण केन्द्र की जांच करने वाले एसआईटी को यह भी अधिकार दिया गया है कि वह जांच में सहयोग लेने के लिए किसी भी विशेषज्ञ को हायर कर सकती है और पूरी रिपोर्ट तैयार कर 12 सितम्बर को कोर्ट में पेश करे जिसकी सुनवाई 15 सितम्बर को की जायेगी। संयोग है कि 2 दिन बाद यानी 17 सितम्बर को नरेन्द्र मोदी का बर्थ-डे है। यह जामनगर (गुजरात) में रिफाइनरी काम्प्लेक्स के ग्रीन वेल्ट में 3000 एकड़ पर फैला हुआ है। यह वही वनतारा वन्यजीव बचाव और पुनर्वास संरक्षण केन्द है जो वैसे तो फरवरी 2024 को ही खुल गया था फिर भी उसका औपचारिक उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 4 मार्च 2025 को किया था तथा वन्यजीवों के साथ तरह-तरह के पोज देकर फोटोज खिंचवाये थे और वायरल किए गये थे। ये अनंत अंबानी मुकेश अंबानी का छोटा बेटा है जिस मुकेश अंबानी से मोदी की निकटता है और अनंत की शादी में नरेन्द्र मोदी ने शिरकत की थी। इस हाईप्रोफाइल शादी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका भी अपने पति और बेटी के साथ शामिल हुई थी तथा दुनिया भर के तमाम अतिरेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों की मौजूदगी थी। इस शादी में तकरीबन 600 मिलियन डॉलर से लेकर 01 बिलियन डॉलर तक खर्च होने का अनुमान है। सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस घराने से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इतनी निकटता हो और देश का कोई भी संवैधानिक संस्थान मोदी सत्ता की मर्जी के बगैर सांस भी नहीं ले सकता हो उस मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी के ड्रीम प्रोजेक्ट की जांच करने के लिए सुप्रीम कोर्ट एसआईटी गठित कर दे देश के गले नहीं उतर रहा है। कहीं यह सब मोदी सत्ता के ईशारे पर सुप्रीम कोर्ट के जरिए मुकेश अंबानी पर नकेल कसने के लिए तो नहीं किया जा रहा है क्योंकि मौजूदा वक्त के हालात इस तरफ साफ-साफ इशारा कर रहे हैं।
ये कार्पोरेट वार नहीं है। ये देश में कार्पोरेट और नैक्सस से निकली हुई ऐसी परिस्थिति है जिसमें देश के सबसे बड़े कार्पोरेट हाउस में से एक कार्पोरेट हाउस और देश की सबसे बड़ी राजनीतिक सत्ता आमने-सामने आकर खड़ी हो गई है। वह भी ऐसे वक्त जब दुनिया बदल रही है। आर्थिक तौर पर नई परिस्थितियां दुनिया के हर देश को नये संबंध बनाने की दिशा में ले जा रही है। दुनिया भर के कार्पोरेट में भी इस बात को लेकर हलचल है कि उसका अपना मुनाफा कहां पर टिका है और आगे जाकर कहां पर टिकेगा। बीते बरसों बरस जिस आसरे वह मुनाफा कमा रहा है या कहें उस कार्पोरेट ने अपनी लकीर को बड़ा किया है क्या वह एक झटके में राजनीतिक सत्ता के पाला बदलने से बदल जायेगी। भारत भर में नहीं बल्कि दुनिया भर में रिलायंस या कहें मुकेश अंबानी की पहचान भारत के सबसे बड़े कार्पोरेट घराने के तौर पर है। मुकेश अंबानी की राजनीतिक ताकत कई मौकों पर खुल कर दिखाई दी है। चाहे वह मनमोहन सिंह का दौर रहा हो या फिर राजीव गांधी का। अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में भी कार्पोरेटस ने सत्ता को बखूबी प्रभावित किया है। जिसमें अब्बल नम्बर रिलायंस का ही रहा है। यानी जब रिलायंस की का गठजोड़ राजनीतिक सत्ता से हो गया तो दोनों ताकतवर होते चले गए। यानी एक ओर राजनीतिक सत्ता मजबूत हुई और दूसरी ओर कार्पोरेट का नेटबर्थ हवाई उड़ान उड़ने लगा।
देश के भीतर के दो सबसे बड़े कार्पोरेटस अंबानी और अडानी इसके सबसे बड़े जीते-जागते सबूत हैं खास तौर पर 2014 से जब इनके नेटबर्थ ने देखते-देखते गगनचुंबी उड़ान भरी है। पहले नम्बर पर अडानी और दूसरे नम्बर पर अंबानी का नाम आता है। 2014 के बाद से सरकार के साथ खड़े होकर अंबानी कमोबेश हर क्षेत्र में छाते चले गए। अंबानी के तकरीबन हर कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी देखी गई है। मसलन अस्पताल का उद्घाटन हो या फिर जियो (जियो) लांच करने का मौका हो, अखबार के पहले पन्ने पर नरेन्द्र मोदी की आदमकद फोटो चस्पा की गई थी। उसके बाद से ही दूरसंचार की सरकारी कम्पनी बीएसएनएल का ढहना और रिलायंस या कहें जियो का उठना शुरू हुआ और आज के दौर में बीएसएनएल अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है और जियो शिखर पर छाया हुआ है। इस सवाल को विपक्ष ने पार्लियामेंट के भीतर अनेकों बार उठाया जरूर लेकिन उसकी आवाज़ मोदी सत्ता के नगाड़े तहत दब कर दम तोड़ गई। 2016-17 आते-आते खुले तौर पर साफ हो गया कि मोदी सत्ता देश के दो सबसे बड़े कार्पोरेटस के साथ खड़ी है। देश में कार्पोरेटस का नेटबर्थ हवाई गति से बढ़ेगा भले ही देश की जीडीपी नीचे चली जाय। जहां देश के एक परसेंटेज कार्पोरेटस के पास लगभग ढाई ट्रिलियन डॉलर है तो वहीं देश के बाकी निन्यानवे फीसदी लोगों के पास तकरीबन डेढ़ ट्रिलियन डॉलर ही है। दोनों को मिलाकर ही (चार ट्रिलियन डॉलर) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी उपलब्धियों में शामिल कर बताते रहते हैं।
सवाल यह है कि जब दुनिया के तमाम कार्पोरेटस में इस बात को लेकर हलचल है कि टेरिफ वार के बाद राजनीतिक स्थितियां बदल रही हैं तो क्या कार्पोरेट भारत की राजनीतिक सत्ता को डिगा सकता है ? क्योंकि ये सवाल बीते एक – डेढ़ महीने से लगातार देश के भीतर तैर रहा है। यह सब कुछ रिलायंस और मुकेश अंबानी को लेकर की किया जा रहा है क्योंकि आने वाले समय में उप राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला है और मोदी सरकार बैसाखियों के सहारे टिकी हुई है। ब्लूमबर्ग और राइटर्स की रिपोर्ट में खुलकर खुलासा किया गया कि भारत की दो कंपनियों रिलायंस और नायरा ने रशिया से सस्ती दर पर तेल खरीद कर उसे रिफाइन कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंचे दामों पर बेच कर कितना फायदा कमाया। सरकार कार्पोरेट के साथ ही खड़ी है क्योंकि सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया कि सस्ती कीमत पर खरीदे जा रहे तेल का लाभ भारतीय जनता को तेल की कीमत कम करके दिलाया जा सके। फिलहाल यह बात पीछे छूटती हुई अब इस रास्ते खड़ी हो गई है क्या वाकई मौजूदा राजनीतिक सत्ता के सामने कार्पोरेट की चुनौती खड़ी हो गई है तथा अब राजनीतिक सत्ता कार्पोरेट को ध्वस्त करने की दिशा में चल पड़ी है ? इस सवाल ने तूल तब पकड़ा जब मुकेश अंबानी के भाई अनिल अंबानी पर एसबीआई के जरिए उसके बैंक अकाउंट को फ्राड साबित करते हुए सीबीआई और ईडी की जांच और इन सबके बीच लगातार छापों की फेहरिस्त से बात आगे बढ़ते हुए मुकेश अंबानी के छोटे बेटे अनंत अंबानी के ड्रीम प्रोजेक्ट वनतारा वन्यजीव बचाव और पुनर्वास एवं संरक्षण केन्द्र को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दस बिन्दु निर्धारित करते हुए चार सदस्यीय स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम गठित करते हुए रिपोर्ट सबमिट करने की डेडलाइन 12 सितम्बर तय कर दी।
मोदी के कालखंड में अडानी का आगे बढ़ना, हर सेक्टर में अडानी की मौजूदगी ने इस सवाल को पैदा कर दिया कि मोदी के लिए अधिक महत्वपूर्ण कौन है अडानी या अंबानी ? और ये सवाल राजनीतिक चुनौती के तौर पर अमेरिका के भीतर भी गूंजा जब अंबानी के बजाय अडानी की फाइल खोली गई। बीते एक बरस से दुनिया के तमाम बैंक जो अडानी को लोन दिया करते थे उनने लोन देना बंद कर दिया है। कह सकते हैं कि यह भी एक कारक हो सकता है मोदी और अंबानी के बीच पनप रही तल्खी के बीच का । वनतारा की जांच के जरिए यह लड़ाई कार्पोरेट विरुद्ध राजनीतिक सत्ता – उस दौर में तब्दील होती हुई दिख रही है जब इस दौर में लंगडी मोदी सत्ता को बीजेपी के भीतर से ही संघ की विचारधारा व संघ की विचारधारा को समेटे सांसदों और मंत्रियों से चुनौती मिल रही है। आरएसएस मोदी सत्ता के समानांतर रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका द्वारा लगाये गये 25 फीसदी अतिरिक्त टेरिफ से भारत की इकोनॉमी, रोजगार, एक्सपोर्ट पर पड़ने वाले असर को लेकर दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिनी सेमीनार कर रहा है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारत की पारंपरिक इकोनॉमी डगमग है। अंतरराष्ट्रीय तौर पर भारत के पारंपरिक रिश्ते डगमग हैं।
1991 में पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में जब प्लानिंग कमीशन की बागडोर प्रणव मुखर्जी के पास थी तथा मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे और भारत की इकोनॉमी रिफार्म कर रही थी तब धीरूभाई अंबानी की रिलायंस ने चलना शुरू किया था। भारत की अर्थव्यवस्था समाजवादी पायदान से पूंजीवादी पायदान पर खड़ा होने के लिए आगे बढ़ रही थी मगर 2025 में अमेरिका या कहें ट्रंप के साथ भारत या फिर मोदी के बीच जिन परिस्थितियों ने जन्म लिया है उससे जो एक बड़ा ट्रांसफार्मेशन भारत की इकोनॉमी को लेकर हुआ है कि भारत अब एक लेफ्ट स्टेट चाइना के करीब जा रहा है। इन सारी परिस्थितियों को लेकर कारपोरेटस भी सोचने पर मजबूर हो गया है कि उसका रास्ता किधर जायेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब भी कारपोरेटस की डील होती है या कोई भी काम पड़ता है तो वह ना तो देश की सीमा देखता है ना ही देश की करेंसी उसके लिए तो सब कुछ डाॅलर में होता है। इस समय मुकेश अंबानी का नेटबर्थ तकरीबन 105 बिलियन डॉलर यानी 9-10 लाख करोड़ रुपये है। क्या मोदी सत्ता इसे ध्वस्त करने के लिए आगे बढ़ रही है.? यह कोई नई खबर नहीं है कि मुकेश अंबानी अपनी मुट्ठी में 140 सांसदों को रखते हैं और उन सांसदों में सबसे ज्यादा तादाद बीजेपी के उन सांसदों की है जो आरएसएस की विचारधारा से पालित-पोषित हैं। मोदी-शाह ने जो एक राजनीतिक बिसात गुजरात में बिछाई थी जिसमें अंबानी – अडानी के साथ ही गुजरात के 20 के ज्यादा कार्पोरेट तथा देश भर के तकरीबन 55 कार्पोरेट मौजूद थे।
आज जब कार्पोरेट के बेटे पर हाथ डाला गया है जिसकी गूंज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय तौर सुनाई देने लगी है तो फिर मानकर चलिए ये जंग इतनी जल्दी खत्म होने वाली नहीं है ये किसी न किसी अंजाम पर जरूर पहुंचेगी। सवाल सिर्फ इतना है कि कार्पोरेट की पूंजी के आसरे जिस देश में राजनीति होती हो, सत्ता को बेदखल करने का काम किया जाता हो, विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त होती हो, बकायदा इलेक्टोरल बांड्स के जरिए करोड़ों के वारे-न्यारे हो चुके हों, उस देश की राजनीति को डिगा पाने की क्षमता क्या कार्पोरेट में है ? या फिर कारपोरेटस को डिगा पाने की परिस्थितियां क्या मौजूदा राजनीतिक सत्ता के पास है ? वह भी तब जब खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात में ऐलान कर रहे हों कि मुश्किल वक्त है देश की इकोनॉमी के लिए तथा मुश्किल समय है देश के किसानों, छोटे उद्योग को चलाने वालों के लिए, फिर भी हम उनके साथ खड़े हैं और स्वदेशी का राग महात्मा गाँधी को याद कर अलापा जा रहा हो इस बात को नजरअंदाज करते हुए कि जब सादगी की प्रतिमूर्ति महात्मा गांधी ने स्वदेशी का नारा लगाया था तब उनके तन पर एक धोती (आधी पहने – आधी ओढ़े) के सिवाय दूसरा कपड़ा नहीं था। जिस वक्त लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान – जय किसान का नारा लगाते हुए देशवासियों से मदद देने और उपवास रखने की अपील की थी तब सादगी बहादुर शास्त्री के साथ जुड़ी हुई थी लेकिन आज मोदी सत्ता रईसी के साथ जुड़ कर सादगी और स्वदेशी का राग अलाप रही है।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार
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