खरी-अखरी: तिजोरी की चाबी तो सुपरबाॅस की हथेली में कैद है
“लोगों को लगता है कि नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। 50 साल की छोटी आयु में मुख्यमंत्री बन गये। 25 साल से लगातार हेड आफ द गवर्नमेंट रहे हैं। यह अपनी जगह पर है लेकिन इन सबसे भी बड़ी चीज मेरे जीवन में है ये भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता हूं। यह सबसे बड़ा गर्व है। जब बात पार्टी के विषयों पर आती है तब माननीय नितिन नवीन जी मैं एक कार्यकर्ता हूं वे मेरे बाॅस हैं”। ये चासनी से लिपटे हुए वाक्य प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हैं, जो बीजेपी के सुपर बाॅस भी हैं, ने बीजेपी के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की ताजपोशी के दौरान कहे। इसके पहले भी तो नरेन्द्र मोदी के बाॅस की भूमिका में थे जेपी नड्डा। कितना सम्मान मिला उन्हें मोदी से ? कितना सम्मान मिलेगा मोदी से नितिन नवीन को ? कितना बोल पाये नड्डा और कितना बोल पायेंगे नवीन पार्टी कार्यकर्ताओं के मान सम्मान को लेकर ? सत्ता विस्तार को लेकर किस तरह से विजातीय राजनीतिक पार्टियों के सिर तक भृष्टाचार के आरोपों से सने लोगों को पार्टी में ना केवल शामिल किया गया बल्कि उन्हें चुनाव लड़ाया गया। जीत कर आने के बाद उन्हें मंत्री तक बनाया गया। और बीजेपी का खांटी कार्यकर्ता जो कल तक उन विजातीय पार्टी के नेताओं के भृष्टाचार को लेकर लानत – मनालत कर रहा था, मुर्दाबाद के नारे लगा रहा था, पुतले जला रहा था अब वही कार्यकर्ता गुलामों की माफिक रिमोट कंट्रोल से कंट्रोल होते हुए उन्हीं नेताओं की जय – जयकार कर रहा है, उनके गले में माला पहना रहा है।
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद तत्कालीन अध्यक्ष जेपी नड्डा की हिम्मत नहीं हुई कि वे पार्टी के संसदीय दल की बैठक बुलाकर नेता का चुनाव कर सकें। नरेन्द्र मोदी संसदीय दल की मोहर के बिना ही स्वयंभू प्रधानमंत्री बने हुए हैं। नितिन नवीन तो ठीक उसी तरह से अध्यक्ष बना दिये गये हैं गुजराती जोड़ी के द्वारा जैसे मध्यप्रदेश में मोहन यादव, छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साई, राजस्थान में भजन लाल शर्मा, उडीसा में मोहन चरण माझी, दिल्ली में रेखा गुप्ता को पर्ची निकाल कर मुख्यमंत्री बना दिया गया था। कह सकते हैं कि पालिटिक्स में भी टेक्नोलॉजी की तरह रोबोट कल्चर आ गया है। नितिन नवीन को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर जेपी नड्डा के मुंह से कहलवाई गई उस बात को अक्षरसः सिध्द कर दिया गया है कि अब बीजेपी अपने फैसले लेने में सक्षम है उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोई जरूरत नहीं है। संघ पिछले साल – डेढ़ साल से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन को लेकर, बीजेपी संगठन को चलाने को लेकर उछलकूद कर रहा था सब का पटाक्षेप एक झटके में कर दिया गया है। नितिन नवीन के चयन में ना तो बीजेपी के भीतर कोई सहमति बनाई गई ना ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जो कि खुद को बीजेपी का पितृ संगठन मानता है उसकी मंजूरी ली गई। एक झटके में पहले नितिन नवीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया उसके बाद फुल फ्रेस अध्यक्ष बनाने की औपचारिकता पूरी कर दी गई। नवीन को पार्टी की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठाने के लिए पार्टी की उस परंपरा को भी दरकिनार कर दिया गया जो बरसों से चली आ रही थी कि पहले व्यक्ति को पार्टी के भीतर राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी दी जाती थी मसलन उपाध्यक्ष, महामंत्री, संगठन मंत्री। इस दृष्टि से नवीन ने कभी भी राष्ट्रीय स्तर कोई जिम्मेदारी नहीं निभाई है ।
सबसे दयनीय हालत तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हो गई है जो अभी तक यही मानकर चल रहा था कि भारतीय जनता पार्टी के संगठन को वही चलाता है इसीलिए संघ अपने प्रचारक को बीजेपी का संगठन चलाने के लिए भेजता था। जैसे एक वक्त पर गोविंदाचार्य को भेजा गया था। अभी तक बी एल संतोष थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिस राजनीतिक सोच के तहत जनसंघ बनाने का प्रस्ताव लेकर गुरु गोलवलकर के सामने गये थे वह राजनीतिक सोच 2025 आते – आते हांफने लगी और 2026 का पहला महीना खत्म होने के पहले ही खत्म हो गई। एक समय था जब वाकई बीजेपी के भीतर संघ की तूती बोलती थी। लालकृष्ण आडवाणी को अध्यक्ष पद से हटाने में संघ की ही भूमिका थी। 2005 में जब वह पाकिस्तान गये और जिन्ना की मजार पर जाकर उन्होंने जो कुछ लिखा उससे बवाल हो गया। नितिन गडकरी को एक झटके में अध्यक्ष बना दिया गया। नितिन गडकरी भी 2012 में तब हटा दिये गये जब उनके दफ्तरों पर छापे पड़ रहे थे और राजनाथ सिंह की ताजपोशी कर दी गई थी। नितिन नवीन के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है वही उस चुनौती का समाधान भी है। इस वक्त नये अध्यक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती है नरेन्द्र मोदी और अमित शाह और समाधान भी वही हैं। चुनौती इसलिए हैं क्योंकि इनके बगैर बीजेपी कहीं नहीं है वैसे अब तो संघ भी कहीं नहीं है। बीजेपी और संघ के भीतर जो लोग जिन गाड़ियों में घूम फिर कर ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं, इन लोगों को जो सिक्युरिटी मिली हुई है वह सत्ता ही मुहैया करा रही है।
पार्टी और संघ के भीतर शायद यही सवाल रेंग रहा है कि “कार्यकर्ता को प्रेसीडेंट बना दिया गया है या फिर उस चेस बोर्ड में किसी प्यादे को वजीर बनाकर पार्टी को ही धराशाई कर दिया गया है ? आज के दौर में ना तो वामपंथ की राजनीति बची है ना ही समाजवादी सोच बची है कांग्रेस कहीं पर नजर आ नहीं रही है तथा छत्रपों की राजनीति भी सिमटती जा रही है। बची है तो सिर्फ बीजेपी। बीजेपी के पीछे वही संघ खड़ा था जिसने शुरुआत में राजनीतिक पार्टी के रूप में जनसंघ को खड़ा किया था उसके बाद 1976-77 में जनता पार्टी में विलय कर दिया। जब दोमुहें की बात आई तो 1980 यानी 6 अप्रैल 1980 को ऐसी भारतीय जनता पार्टी बनाई जो राजनीतिक दलों के परिवारों को गरियाती है, देश के मुसलमानों से ना केवल नफरत करती है बल्कि खुलेआम कहती है कि हमें मुसलमानों के वोट नहीं चाहिए। वह भारत में हिन्दू राष्ट्र काबिज करने की वकालत करती है। उसी बीजेपी को लेकर संघ के भीतर भी सवाल है और खुद बीजेपी के भीतर भी राजनीति और सियासत को साधने के तौर तरीकों को लेकर सवाल हैं। बीजेपी के भीतर तिजोरी यानी पूंजी कभी मायने रखती नहीं थी लेकिन 2014 से बीजेपी तिजोरीमय यानी पूंजी की गुलाम हो चुकी है। बीजेपी ने 1996, 1998, 1999, 2004, 2009 के चुनाव में यानी 5 चुनाव में जितना खर्च किया था उससे ज्यादा पैसा 2014 के चुनाव में खर्च किया गया सिर्फ़ और सिर्फ़ सत्ता में आने के लिए। इसके बाद चुनाव दर चुनाव सत्ता को बचाये रखने के लिए तिजोरी से पैसा निकलता चला गया।
2014 में जहां तकरीबन 923 करोड़ रुपये खर्च किये गये थे जो 2019 में बढकर लगभग 1352 करोड़ हो गये और 2024 में तो बकायदा चुनाव आयोग को बताया कि 3335 करोड़ रुपये खर्च किये गये हैं। यह वह आंकड़ा है जो केन्द्रीय बाॅडी ने खर्च किया है। इसमें प्रत्याशियों द्वारा अपनी जेब से किया गया खर्च शामिल नहीं है ना ही उसका कोई लेखा-जोखा है। 2014 में जहां बीजेपी की तिजोरी में 674 करोड़ थे वहीं 2024 में वह बढकर 7113 करोड़ हो गया। आज की स्थिति में तो वह 10000 करोड़ पार कर चुका है। 2014 में बीजेपी के पास देशभर में 200 के करीब अस्थाई आफिस हुआ करते थे। आज देशभर में 772 हाईटेक आफिस हैं वह भी अपने मालिकाना हक के। बताया जाता है कि हर जिले के आफिस को बतौर खर्च के लिए 1.5 करोड़ तथा राज्य के आफिस के लिए 3 से 5 करोड़ का बजट रखा जाता है। 2024-25 में बीजेपी ने इलेक्टोरल बांड्स के जरिए मिले पैसों से 6000 करोड़ का ट्रस्ट बनाया था। उस ट्रस्ट में तमाम कंपनियों और व्यक्तिगत तौर से मिलने वाला पैसा जमा होता चला गया। पता चला कि भारत में काॅटनमैन के रूप में पहचान बना चुके अमृत लाल कोट नाम के शख्स ने 30 करोड़, अल्ला दक्षायनी ने 25 करोड़, दिनेश चंद्र अग्रवाल ने 21 करोड़ तथा इनके बेटे हार्दिक अग्रवाल ने 20 करोड़ दिये हैं। इसी तरह रमेश कुकुन्न ने भी 17 करोड़ दिये हैं।
जिस लहजे में सुपरबाॅस ने नये नवेले बाॅस के सामने प्रजेंटेशन दिया उससे नये अध्यक्ष के सामने कौन सी चुनौती है ? मोहन भागवत घबराये हुए क्यों हैं ? बीजेपी का अस्तित्व सुपरबाॅस पर क्यों टिक गया है ? जिस दिन सुपरबाॅस फिसले उस दिन क्या होगा ? ताजपोशी के दौरान अपने अगल- बगल खड़े अमित शाह, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और जेपी नड्डा जो एक समय अपने तौर पर अध्यक्ष रह चुके हैं तथा पीछे खड़े नरेन्द्र मोदी को देख कर घबराहट क्यों हो रही थी ? नये बाॅस के कालखंड में ही पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल में चुनाव होना है जहां बीजेपी सत्ता के लिए तरस रही है तो वहां चुनाव जीतेंगे कैसे ? उत्तर प्रदेश को भी बरकरार रखेंगे कैसे ? अगर इन राज्यों में बीजेपी सत्ता तक नहीं पहुंच पाई तो ठीकरा किसके सिर फोड़ा जायेगा ? इसी बीच परिसीमन भी होना है। इसी दौर में 33 फीसदी आरक्षण भी होगा। 2029 का आम चुनाव भी तो होगा। सवाल यह भी है कि 2029 तक मोदी 80 का आंकड़ा छूने लगेंगे तो नया लीडर कौन होगा ? आज के हिसाब से देखें तो अमित शाह संगठन को अपनी मुट्ठी में दबाये दो नंबरी बने बैठे हैं। अपने कार्यकर्ताओं के बीच प्रियता लिए हुए योगी आदित्यनाथ हैं तो दूसरी तरफ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस भी नये तरीके से उभर रहे हैं। वह भी आंकड़ो की बाजीगरी और राजनीति को साधने की समझ रखने लगे हैं।
देखा जाए तो 2014 के बाद से सत्ता और संगठन में प्रखर लोगों को हासिए पर धकेल कर डफर लोगों को आगे बढ़ाया जा रहा है। दुनिया को जियो पालिटिक्स प्रभावित कर रही है। बीजेपी हेडक्वार्टर में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का चरण चुंबन हो चुका है। अमेरिका से ट्रेड डील अधर में लटकी हुई है। ईरान से व्यापार, मिडिल ईस्ट के साथ समझौते सब कुछ तो पीएमओ यानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यानी सुपरबाॅस देख रहे हैं। कुशाभाऊ ठाकरे के अध्यक्षीय कालखंड में भी फैसला पीएमओ से होता था लेकिन तब पीएमओ सब कुछ नहीं था तथा पीएमओ के समानांतर कोई मिनिस्ट्री नहीं थी। आज के दौर में पीएमओ ही सब कुछ हो गया है और पीएमओ के समानांतर होम मिनिस्ट्री आकर खड़ी हो गई है। नरेन्द्र मोदी को लेकर बीजेपी के भीतर हर कोई जानता है कि वे जब तक चाहेंगे तब तक पीएम की कुर्सी पर बैठे रहेंगे लेकिन वो कब तक चाहेंगे कोई नहीं जानता है। लेकिन इस अंतर्विरोध के बीच सवाल ये है कि देश के भीतर की राजनीति और बाहर की स्थितियों में जो आर्थिक संकट गहराया हुआ है वह जब और ज्यादा गहरायेगा तब क्या होगा ? वितरण के तौर तरीकों का लोकतांत्रिककरण कैसा होगा ? देश के भीतर वैचारिक और सांस्कृतिक, जातीय, भाषाई, क्षेत्रीयता, धार्मिकता, राष्ट्रवाद को लेकर जो द्वंद है वह सब कुछ इस दौर में धराशाई होता चला गया।
भारत की राजनीति उस प्वाइंट पर आकर खड़ी हो गई है जिसके आगे बीजेपी जा नहीं सकती है क्योंकि हर कोई अपने श्रेष्ठतम दौर में है। इसी दौर में नितिन नवीन की ताजपोशी हुई है। तो चुनौती खुद को लेकर है या चुनौती आने वाले वक्त में उन फैसलों को लेकर होगी जिसकी चाबी उनके पास नहीं है। यह चाबी तो किसी और के पास है। यह चाबी संघ को भी थामने नहीं दी जा रही है। तो यह चाबी किसके पास होगी और वह चाबी किसे थमाई जायेगी यही है सुपरबाॅस का खेल ! वो चाबी किस हथेली में जायेगी, वो हथेली कौन सी होगी कोई नहीं जानता है लेकिन हर हथेली यह जानती है कि अब भारत की राजनीति, भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा, सियासत साधने की सोच सब कुछ तिजोरी के भीतर ही है जिसकी चाबी इस वक्त सुपरबाॅस की हथेली में कैद है। और सुपरबाॅस की चाबी के सामने ना भारतीय जनता पार्टी कोई मायने रखती है ना ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई मायने रखता है, ना विचारधारा कोई मायने रखती है ना ही विपक्ष की राजनीति कोई मायने रखती है क्योंकि आज के दौर में चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा धर्म है। चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा बिजनेस है। चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा प्रॉफिट है। तो फिर जब वह चाबी अपनी हथेली में दबा ली गई है तो फिर बाकी की मशक्कत क्यों की जाय।
इसीलिए तो Theory of elimination के जरिए अवतरित हुए महामानव सुपरबाॅस नये बाॅस की ताजपोशी में मग्न थे और इधर देश की साख का प्रतीक रुपया डाॅलर के सामने नतमस्तक होकर इतिहास रच रहा था। शेयर बाजार में एतिहासिक गिरावट हो रही थी। निवेशक त्राहिमाम – त्राहिमाम कर रहे थे। उन्हें तो अपनी ही पार्टी की नेता प्रतिपक्ष रही स्वर्गीय सुषमा स्वराज का वह कथन भी याद नहीं होगा जो उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कालखंड में जब रुपया डाॅलर के मुकाबले 68 पर आया था तो संसद के भीतर कहा था “इस करेंसी के साथ देश की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई होती है और जैसे – जैसे करेंसी गिरती है वैसे – वैसे देश की प्रतिष्ठा गिरती है। इसलिए आज मैं आपसे मांग करती हूं कि वित्त मंत्री के बयान का जो हस्त्र होना था वो हो गया। हमने देख लिया। लेकिन आज हमें प्रधानमंत्री से इस पर व्यक्तव्य चाहिए”। आज तो रुपया 91 पार कर गया है। निवेशकों के दस लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गये हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुप्पी साधे हुए हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन से लेकर बिना सिर-पैर की बातों में बंदरों की तरह उछलकूद करने वाली बीजेपी चुप है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जो आये दिन राजनीतिक रंग में रंगे बौध्दिक देते फिरते हैं वो भी संटी मार कर बैठे हुए हैं।
नितिन गडकरी भले ही नितिन नवीन की ताजपोशी में शामिल रहे हैं लेकिन उन्होंने अपने मन की पीड़ा यह कहते हुए व्यक्त कर दी Older generation must step aside when things start running smoothly and make way for new generation. यानी सारा काम अगर व्यवस्थित तरह से चल रहा है, स्मूथ तरीके से चल रहा है तो पार्टी और सरकार के भीतर जो पुरानी पीढ़ी के लोग हैं उन्हें अलग हट जाना चाहिए। मतलब जबरिया रिटायर किये जाने से बेहतर है रिटायर्मेंट ले लेना चाहिए। गडकरी के कहे के दो मायने निकाले जा रहे हैं। पहला तो यह कि बीजेपी के भीतर इतना बड़ा कबाड़ा मच चुका है, इतना सब कुछ खत्म हो चुका है कि अब पुरानी पीढ़ी के लोगों को अपने आप पार्टी से अलग हो जाना चाहिए। इसी में समझदारी और इज्जतदारी है। सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी एक बार कहा था कि 75 साल की उम्र होने पर अगर कोई आपको शाल उढ़ा दे तो आपको समझ लेना चाहिए कि अब आपका काम खत्म हो चुका है और आपको बिना हटाये हट जाना चाहिए। यह दीगर बात है कि बाद में भागवत ने समझा दिया था कि उन्होंने जो कहा है उसका यह मतलब कतई यह ना लगाया जाय कि मैं हट रहा हूं और नरेन्द्र मोदी हट रहे हैं (पर उपदेश कुशल बहुतेरे)। दूसरा यह कि जब 45 साल के नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया है तो उम्रदराज हो चुके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को स्वमेव आगे आकर नई पीढ़ी को मौका देने के लिए अपने – अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार




Leave a Reply
Want to join the discussion?Feel free to contribute!