श्रद्धालुओं का विश्वास कैसे कायम रखें, पारदर्शी व्यवस्था जरूरी
अयोध्या में स्थित श्रीराम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि देश विदेश में बैठे हर श्रद्धालुओं की आस्था, विश्वास और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र है। ऐसे में मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी और अनियमितताओं से जुड़े मामले में विशेष जांच दल (एसआईटी) की रिपोर्ट में बड़े खुलासों के संकेत सामने आना अत्यंत गंभीर विषय है। यह मामला केवल धन के दुरुपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि उस भरोसे से भी जुड़ा है जो श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के साथ मंदिर प्रबंधन पर व्यक्त करते हैं। हालांकि इस रिपोर्ट में क्या है यह बाहर नहीं आया है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि इस रिपोर्ट में बहुत कुछ बड़ा है जिस पर चिंतन मनन चल रहा है। यह सभी जानते हैं कि यह श्रीराम मंदिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जुगो जुगो तक ५०० वर्षों के बाद वह विजय गाथा है जो भारतीय जनता पार्टी के लिए संजीवनी बूटी का काम करेगी? चढ़ावा चोरी मामले की जांच को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाकर देखा जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि श्रद्धालुओं का विश्वास कैसे कायम रखा जाए। क्योंकि मंदिर की भव्यता पत्थरों से नहीं, बल्कि भक्तों की अटूट श्रद्धा और विश्वास से निर्मित होती है।
प्रारंभिक सूचनाओं के अनुसार एसआईटी को चढ़ावे के संग्रह, गिनती और जमा करने की प्रक्रिया में कुछ संदिग्ध पहलुओं के प्रमाण मिले हैं। यदि जांच में यह साबित होता है कि चढ़ावे की राशि में हेराफेरी हुई है, तो यह न केवल कानूनी अपराध होगा बल्कि धार्मिक भावनाओं के साथ विश्वासघात भी माना जाएगा। राम मंदिर निर्माण और संचालन से जुड़ी संस्थाओं पर देश-विदेश के करोड़ों लोगों की निगाह रहती है, इसलिए पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा भी स्वाभाविक रूप से अधिक है।यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच पूरी होना आवश्यक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोप और दोषसिद्धि के बीच स्पष्ट अंतर होता है। इसलिए केवल आशंकाओं या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर निर्णय देना उचित नहीं होगा। एसआईटी को निष्पक्ष, स्वतंत्र और तथ्यों पर आधारित जांच करनी चाहिए ताकि सत्य सामने आ सके।
इस घटना ने एक बार फिर देश के बड़े धार्मिक संस्थानों में वित्तीय प्रबंधन और लेखा-परीक्षण की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। मंदिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों और चर्चों सहित सभी धार्मिक संस्थानों में प्राप्त दान और चढ़ावे का नियमित ऑडिट, डिजिटल रिकॉर्डिंग और सार्वजनिक रिपोर्टिंग सुनिश्चित की जानी चाहिए। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और भ्रष्टाचार की संभावनाएं कम होंगी। राजनीतिक दलों को भी इस मामले को केवल राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखने से बचना चाहिए। आस्था से जुड़े मुद्दों का राजनीतिकरण समाज में अनावश्यक विभाजन पैदा कर सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई हो और यदि आरोप निराधार सिद्ध हों तो संबंधित संस्थाओं की प्रतिष्ठा भी बहाल की जाए।
अयोध्या राम मंदिर केवल एक भवन नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आस्था का प्रतीक है। इसलिए चढ़ावे की चोरी से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई न केवल कानून का प्रश्न है, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा का भी दायित्व है। एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट से सच सामने आएगा, और यही अपेक्षा की जानी चाहिए कि सत्य तथा पारदर्शिता की जीत हो।
वहीं एसआईटी ने मंगलवार को अपनी 20 पन्नों की शुरुआती जांच रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी, जिसमें 150 लोगों से पूछताछ का विवरण है। रिपोर्ट में एफआईआर दर्ज करने और ट्रस्ट को दुबारा गठित करने की सिफारिश की गई है। साथ ही, किसी वरिष्ठ अधिकारी को मंदिर का सीईओ नियुक्त करने का सुझाव भी दिया गया है। एसआईटी ने पिछले पांच साल के चढ़ावे का ऑडिट कराने और भविष्य में अनियमितताओं को रोकने के लिए सुझाव दिए हैं, जिसमें ट्रस्ट के पदाधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। राज्य सरकार ने रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को भेजी है, जो अब ट्रस्ट के सदस्यों के भविष्य पर अंतिम निर्णय लेगा।
अब यह विषय समय के गर्त में है क्योंकि आगमी दिनों में मानसून सत्र भी आने वाला है अगर ऐसे में मंदिर संबंधी चोरी पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई तो यह मुद्दा उछलेगा ? वहीं प्रधानमंत्री मोदी जी पुराने लटके बिलों को पास करवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। आम आदमी पार्टी , टीएमसी , शिवसेना व अन्य से बिखरे हुए बागी सांसद भी सत्ता के साथ कदम से कदम मिलाकर देखे जा रहे हैं। इसलिए मोदी सरकार जल्द से जल्द से एसआईटी की रिपोर्ट सार्वजनिक कर दोषियों के खिलाफ कड़ा एक्शन लेगी ताकि मानूसन सत्र में यह मुद्दा हावी न हो?
अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में देखा जा रहे है कि जनमानस को भी गहरा धक्का लगा है क्योंकि चढ़ावे में जिस तरीके से गिरावट दर्ज की गई है वह किसी से छिपी नहीं है। अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े चढ़ावा चोरी प्रकरण ने केवल आर्थिक अनियमितताओं के सवाल ही नहीं खड़े किए हैं, बल्कि श्रद्धालुओं के विश्वास और मंदिर प्रशासन की पारदर्शिता पर भी बहस तेज कर दी है। जिस तरह हाल के समय में मंदिर में आने वाले चढ़ावे की राशि में गिरावट दर्ज की गई है, वह किसी से छिपी नहीं है। यद्यपि चढ़ावे में कमी के पीछे मौसम, तीर्थयात्रियों की संख्या, आर्थिक परिस्थितियां और अन्य कई कारण हो सकते हैं, लेकिन चोरी और अनियमितता के आरोपों ने इस गिरावट को लेकर नई आशंकाओं को जन्म दिया है। किसी भी धार्मिक स्थल की सबसे बड़ी पूंजी श्रद्धालुओं का विश्वास होता है। श्रद्धालु यह मानकर दान करते हैं कि उनकी अर्पित राशि धार्मिक, सामाजिक और जनकल्याणकारी कार्यों में उपयोग होगी। यदि चढ़ावे की सुरक्षा, लेखा-जोखा या प्रबंधन पर सवाल उठते हैं तो स्वाभाविक रूप से लोगों का भरोसा प्रभावित होता है। यही कारण है कि अयोध्या जैसे राष्ट्रीय आस्था केंद्र में सामने आए आरोपों की निष्पक्ष और गहन जांच आवश्यक है। यदि जांच में किसी कर्मचारी, अधिकारी या संबंधित व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि आरोप निराधार सिद्ध होते हैं तो प्रशासन को तथ्यों के साथ जनता के सामने स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। आधी-अधूरी जानकारी और अफवाहें आस्था तथा संस्थाओं दोनों को नुकसान पहुंचाती हैं। यह भी आवश्यक है कि मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं में आधुनिक तकनीक आधारित निगरानी, डिजिटल लेखांकन, नियमित ऑडिट और सार्वजनिक रिपोर्टिंग की व्यवस्था मजबूत की जाए। जब करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है, तब उसकी पारदर्शी व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। इससे न केवल भ्रष्टाचार की संभावनाएं कम होंगी बल्कि श्रद्धालुओं का विश्वास भी और अधिक सुदृढ़ होगा।
अयोध्या राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आस्था का प्रतीक है। इसलिए चढ़ावा चोरी मामले की जांच को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाकर देखा जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि श्रद्धालुओं का विश्वास कैसे कायम रखा जाए। क्योंकि मंदिर की भव्यता पत्थरों से नहीं, बल्कि भक्तों की अटूट श्रद्धा और विश्वास से निर्मित होती है।
सौरभ वार्ष्णेय




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