150 रुपये के विवाद का 45 साल लंबा सफर, 700 से ज्यादा पेशियों के बाद आया फैसला
बिहार में 150 रुपये के उधार से शुरू हुआ एक विवाद करीब साढ़े चार दशक तक अदालत में चलता रहा। इस लंबे मुकदमे में 700 से अधिक पेशियां हुईं, करीब 130 तारीखें पड़ीं और दोनों पक्षों ने लाखों रुपये खर्च कर दिए। आखिरकार फैसला तब आया, जब आरोपी की उम्र 75 वर्ष हो चुकी थी।
मामला मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट थाना क्षेत्र का है। घटना की शुरुआत 5 मई 1981 को हुई, जब लोढ़न सहनी ने गांव के ही भिखारी सहनी से अपने 150 रुपये वापस मांगे। आरोप है कि इसी बात को लेकर विवाद बढ़ गया और उसी रात कुछ लोग लाठी-डंडों के साथ पीड़ित परिवार के घर पहुंच गए।
प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि घर में मारपीट की गई, लोढ़न सहनी के हाथ-पैर बांध दिए गए और घर में आग लगा दी गई। आग में अनाज, कपड़े और अन्य सामान समेत करीब 2,500 रुपये की संपत्ति के नुकसान का दावा किया गया था। घटना के बाद पुलिस ने 1981 में चार्जशीट दाखिल की और 1983 में अदालत ने आरोप तय किए।
इसके बाद शुरू हुआ तारीखों का लंबा सिलसिला। कई दशक तक चले इस मामले में गवाहों के बयान दर्ज हुए और सुनवाई जारी रही। रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2018 से 2026 के बीच ही करीब 130 तारीखें लगीं। पूरे मुकदमे के दौरान 700 से अधिक बार अदालत में पेशी होने का अनुमान है।
मुकदमे पर खर्च भी विवाद की मूल रकम से कई गुना अधिक हो गया। दोनों पक्षों ने वकीलों की फीस, यात्रा और अन्य कानूनी खर्चों को मिलाकर लगभग 5 से 6 लाख रुपये तक खर्च किए। सुनवाई के दौरान सात गवाहों के बयान दर्ज किए गए, जबकि कुछ गवाह अपने पुराने बयानों से मुकर गए।
जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश-20 की अदालत ने मामले में जीवित बचे आरोपी भिखारी सहनी को मारपीट और बंधक बनाने का दोषी माना। हालांकि उसकी उम्र, आर्थिक स्थिति और करीब 45 वर्षों तक चले मुकदमे को देखते हुए अदालत ने उसे जेल भेजने के बजाय चेतावनी देकर रिहा कर दिया। इस मामले के दूसरे आरोपी कप्पल सहनी की सुनवाई के दौरान ही मृत्यु हो चुकी थी।
यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में देरी और छोटे विवादों के लंबे कानूनी संघर्ष में बदल जाने का उदाहरण बन गया है। 150 रुपये से शुरू हुआ विवाद आखिरकार लाखों रुपये के खर्च और कई पीढ़ियों तक चलने वाली कानूनी लड़ाई की कहानी बन गया।




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