खरी-अखरी : समझदारी की मुझसे क्या तवक़्क़ो, जाहिल कौम का सरदार हूँ मैं !
जं जी ने देश को ऐसी ताकत दी है जिससे लगने लगा है कि देश अब खुले आसमान तले सांस लेने की परिस्थिति में आ रहा है
ये गुमराह बच्चे हैं। उनको राह दिखाना हमारा काम है। उनको सजा देना, अदालतों के चक्कर कटवाना, समाज में उनको प्रताड़ित करना इससे हम परिस्थितियां नहीं बदल पाएंगे। मैं उन्हें माफ करना चाहता हूं। ये बोल उस व्यक्ति के हैं जो बीते 12 बरस से देश को गुमराह कर देश की सबसे बड़ी दूसरे नम्बर वाली प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा हुआ है। सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह समझ पाये हैं कि जंतर-मंतर पर कौन और क्यों उतरे हैं ? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह समझ पाये हैं कि नीट का पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने के बाद दो दर्जन से अधिक छात्रों ने आत्महत्या क्यों की है ? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन परिजनों के दर्द को महसूस किया है जिनके चिराग नीट के पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने से सदा सदा के लिए बुझ गये हैं ? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन परिवारों का दुख साझा करने उनके दरवाजे पर गये हैं ?
क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पता है कि जंतर-मंतर पर उपस्थित अभिजीत दीपके, सौरभ दास, आशुतोष रांका, रत्ना सिंह कौन हैं ? इन सबके उत्तर हैं – नहीं। अभिजीत दीपके यूएसए के मैसाचुसेट्स राज्य के बोस्टन शहर में स्थित बोस्टन युनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहा है। सौरभ दास वही जर्नलिस्ट है जिसने एक वक्त एक मैग्ज़ीन में लिखे अपने आर्टिकल में सीजेआई डीवाई चंद्रचूड को परफार्मेटिव जस्टिस (क्रियात्मक जज) बताते हुए उनका पूरा नकाब उतार दिया था। आशुतोष रांका आईआईटी कानपुर और लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स से पढ़ा हुआ है। रत्ना सिंह भी लीगल जर्नलिस्ट है। इनके अलावा और भी जो हजारों की संख्या में जंतर-मंतर पर जमा छात्र थे उनमें से एक भी फर्जी डिग्रीधारी नहीं है ना ही कोई अपनी डिग्री छुपाना चाहता है।
ये सभी लोग जंतर-मंतर पर इसलिए शरीक हुए क्योंकि वे सभी हायर एज्युकेशन को ढहते हुए देख रहे हैं। देश के ढहते हुए एज्युकेशन और मोदी सरकार की उदासीनता से इतने आहत हुए कि कईयों ने खुदकुशी कर ली। और देश के प्रधानमंत्री के मुंह से पश्चाताप का एक शब्द भी नहीं निकाला। शायद यही वजह है कि जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छात्रों को माफ करने का संदेश इंस्ट्राग्राम पर जारी किया तो पीड़ित परिवारों के बीच जाकर उनका दुख दर्द साझा करने वाले नेता प्रतिपक्ष ने उसका माकूल जवाब देते हुए इंस्ट्राग्राम पर ही लिखा “अपने बच्चों को खोने वाले माता-पिता के आंसू, उनका बिलखना इससे बड़ा कोई दुख नहीं होता। ये एक गम उनके साथ हमेशा जिंदा रहेगा और साथ ही रह जाते हैं इस टूटी और भृष्ट एज्युकेशन सिस्टम के बारे में कई सवाल। पेपर लीक। रद्द परीक्षाएं। सालों की तैयारी। एक पल में बर्बाद। हमारे छात्रों को उस सिस्टम में ईमानदारी से मेहनत करने के लिए कहा जाता है जो खुद बेईमान है। और उसके बाद भी प्रधानमंत्री की ये हिम्मत है कि वो छात्रों को माफ करने की बात करते हैं। क्या वो एक भी शोकाकुल परिवार से मिले, जिन्होंने अपने बच्चे को खोया है या उन लोगों से जिनकी जमा पूंजी, जिंदगी, वक्त और सपने सब पेपर लीक से छीन लिए गए ? जवाब है – नहीं। भारत के छात्रों को प्रधानमंत्री की क्षमा की जरूरत नहीं – मोदी जी को उनसे माफी मांगनी चाहिए”।
यानी एलओपी राहुल गांधी पीएम मोदी से कह रहे हैं कि एक बार उनके परिवार को देखिए। उनके माता पिता से मुलाकात तो करिए। कितनी पीड़ा है उन परिवारों के भीतर जिन्हें आप माफ करने का जिक्र कर रहे हैं। भारतीय राजनीति में संवाद पार्लियामेंट के भीतर होना चाहिए लेकिन प्रधानमंत्री पार्लियामेंट नहीं जा रहे हैं। देश का गृहमंत्री भी पार्लियामेंट से नदारत है। संसद लगातार ठप्प है। जो संवाद हो रहा है वह सोशल मीडिया के जरिए हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी खुशी का इजहार करते हुए Instagram पर आते हैं और विपक्ष का नेता दुखी मन से Instagram पर आकर जवाब देता है। विपक्ष संसद के गलियारे में नारेबाजी करता है और उसी को दिखा कर मीडिया यह सोचते हुए खुश हो जाता है कि हमारी रिपोर्टिंग हो गई। मीडिया कभी भी उस दरवाजे पर नहीं जाता है जहां दर्द पसरा हुआ है। वह उसी राजनीतिक परिस्थितियों में अभी भी फंसा हुआ है जहां पर उसे लगता है कि मौजूदा सत्ता का बरकरार रहना उसके बिजनेस माॅडल के लिए अनुकूल है। क्योंकि उसने अपनी जिस साख को खो दिया है वह उसे दुबारा पा नहीं सकता है तो ऐसे में इसी राख को बार बार चेहरे पर मलता रहे। The students are saying that the education system is not working. Our papers are leaked. We grow through extreme pain and discomfort. It is too expensive and what is the government response.
कोई कितने समय तक खामोश रह सकता है ? यह सवाल पीएम मोदी के लिए कोई खास मायने रखता नहीं है ! वे तो मणिपुर को लेकर आज तक खामोश हैं। फिर भी पीएम मोदी कब तक पार्लियामेंट नहीं जायेंगे ? जंतर-मंतर के भीतर जो मानवीयता को रौंदने वाले कृत्य हुए हैं उसके बारे में गृहमंत्री कब तक चुप्पी साधे रहेंगे ? क्योंकि अब जो सवाल और उसके समाधान के स्वर देश के भीतर से निकल रहे हैं उसके मुताबिक अगर देश को संविधान के आसरे चलाना है तो हरहाल में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की मौजूदगी पार्लियामेंट में होनी चाहिए। अन्यथा स्थितियां देश के हाथ से कान्स्टिट्यूशनली निकलने लगेंगी। देश के भीतर के जो भी इंस्टीटयूशनसं जंतर-मंतर से निशाने पर आए हैं जिसमें मसला सिर्फ एज्युकेशन भर का नहीं है। उस एज्युकेशन के दायरे में तो एक पूरा सिस्टम रेंगता है। वह पूरा सिस्टम लुंजपुंज हो चुका है, पूरी तरह से करप्ट हो गया है और वह सिर्फ और सिर्फ सत्ता के अनुकूल रह कर अपने अनुसार और सत्ता के अनुसार काम करता है उसे बदलना ही होगा। क्योंकि अब देश ने पारंपरिक मुद्दे उठाकर सत्ता में आने की इजाजत देना बंद कर दिया है। मीडिया को उन दरवाजों पर जाना होगा जहां पर पूरे सिस्टम ने दर्द और पीड़ा की एक चादर डाल रखी है। संपादकों को अपने आंख में बंधी पट्टी खोलनी होगी। मीडिया मालिकों को अपने बिजनेस माॅडल को बदल कर सत्ता के ऊपर की निर्भरता से निकल कर नये रास्ते तलाशने होंगे। जं जी ने चेता दिया है कि संपादक, मीडिया संस्थान, फोर्थ स्टेट का काम निगरानी करना है ना कि सत्ता की चापलूसी करना, ना कि सत्ता के लिए ढोल पीटकर कमाई करना। सत्ता से सवाल करने होंगे। यानी डेमोक्रेसी के हर पिलर को अपना काम करना होगा।
और ऐसे में THE JUDICIAL TRANSPARENCY INDEX ASSESSING DISCLOSURE OF INFORMATION BY THE SUPREME COURT AND HIGH COURT (सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय द्वारा सूचना के प्रकटीकरण का आंकलन करने वाला न्यायिक पारदर्शिता सूचकांक) विषय पर एक सेमीनार के पैनल डिस्कशन में उपस्थित सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुइंया ने जो कहा वह सीधे और सांकेतिक तौर बहुत महत्वपूर्ण है। जस्टिस भुइंया ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि जजों की नियुक्ति के लिए कालेजियम की सिफारिशों और सरकार के इंकार में वजह नहीं बताई जाती है जो कि बताई जानी चाहिए। इसे ना बताना जजों के साथ अन्याय होने के साथ ही जनहित के खिलाफ भी है। कालेजियम जिसकी सिफारिश करती है सरकार उसकी नियुक्ति करने से बिना किसी तार्किक कारण के मना कर देती है। जबकि जजों की नियुक्ति सही चर्चा और ठोस कारणों के आधार पर होनी चाहिए। ऐसे फैसले लेने के लिए पूरी तरह से बहस करने में क्या दिक्कत है ? क्या सरकार के सामने ऐसा कोई संकट आकर खड़ा हो जाता है कि वह बहस भी नहीं करना चाहती। तो क्या इस दौर में जजों की नियुक्ति तक में तानाशाही परिस्थिति पैदा हो गई है या एक काॅकस के तहत चीजें चल रही हैं जो वैचारिक तौर पर सत्ता के अनुकूल हो।
जस्टिस भुइंया ने सेमीनार में मौजूद सीनियर एडवोकेट सौरभ कृपाल का जिक्र करते हुए कहा कि कालेजियम ने उनके नाम की सिफारिश हाईकोर्ट जज बनाने के लिए दो बार की थी लेकिन सरकार ने बिना कोई कारण और आधार बताए ठुकरा दिया। जबकि कालेजियम द्वारा दिए गए तर्क और कारण वजनदार थे। उन्होंने कहा कि दरअसल नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि अदालतों में क्या हो रहा है ? उनके न्यायाधीश कौन हैं ? उन्होंने शिक्षा दीक्षा कहां से ली है ? उनका सफर कैसा रहा है ? उनके पहले के फैसले कैसे रहे हैं ? यह सारी बातें लिखनी चाहिए। उन्होंने कालेजियम की तीन सिफारिशों का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार द्वारा उन्हें बिना कारण बताए खारिज कर दिया गया तो उसे क्यों नहीं निश्चित तौर पर पारदर्शिता के सिध्दांत से पीछे हटना माना जाना चाहिए ?
जस्टिस उज्जवल भुइंया ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस रिटायर्ड जज का जिक्र करते हुए कहा, जिसने सर्विस के दौरान विश्व हिन्दू परिषद के एक कार्यक्रम में शिरकत करते हुए मुसलमानों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, क्या सरकार वजह छिपा कर न्यायपालिका में ऐसे लोगों को नियुक्त करने की गुंजाइश बनाती है जो समय आने पर लोगों के समूह को चीटियां कहने के साथ ही असंवैधानिक और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ भी टीका टिप्पणी कर सकें। यह अकाट्य सत्य है कि काॅकरोच शब्द तो चीफ जस्टिस आफ इंडिया जस्टिस सूर्य कांत के मुख से ही निकला है। यह दीगर बात है कि सीजेआई को सफाई देनी पड़ी लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। यानी एक तरीके से जस्टिस भुइंया ने साफ तौर पर कहा कि अगर जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता नहीं होगी तो ऐसे वाक्ये होने की संभावना बनी रहेगी।
जस्टिस भुइंया ने जनप्रतिनिधियों का जनता के साथ किसी प्रकार का सरोकार नहीं होने पर भी ऊंगली उठाई। जनता को रोजगार मिल नहीं रहा है। उसकी आमदनी कम होती जा रही है। मंहगाई बढ़ रही है। लेकिन सांसद विधायक इन चीजों से कटा होता है। उनका अपना वेतन बढ़ता रहता है। सुविधाएं मिलती रहती हैं। विशेषाधिकार मिले हुए हैं। जनता जिन सवालों को उठाती है पार्लियामेंट के भीतर उनका कोई मतलब होता नहीं है। और अब तो सत्ता ने पार्लियामेंट को अपने हिसाब से चलाना भी शुरू कर दिया है। विपक्ष कुछ कर नहीं सकता है।
जब जं जी अपनी पूरी ताकत से सड़क पर आया तो सत्ता के निर्देश पर सारे संस्थान उसे उखाड़ फेंकने में लग गए लेकिन वह पूरी हिम्मत के साथ अपनी आजादी, अपनी अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति के तौर-तरीकों पर डटा रहा। जिसकी गूंज सात समुंदर पार तक सुनाई दी। यह अलग बात है कि देशी मीडिया आज भी मौजूदा राजनीतिक सत्ता की ढाल बना हुआ है। इसके बावजूद सत्ता की तानाशाही दरक चुकी है। सवाल उठने लगे हैं और सवाल उन जगहों से उठ रहे हैं जिसकी पैनी नजर ही नहीं बल्कि पूरी निगरानी के साथ बीते बारह बरस से सत्ता चलती चली आ रही थी, यह अह्सास कराते हुए कि जनता ने उसे चुना है वह जो मन चाहे वह कर सकती है।
न्याय की आखिरी देहरी सुप्रीम कोर्ट भी देश को निराशा में डुबोने लगी, तभी जं जी सड़क पर उतरा और उसने देश को ऐसी ताकत दी कि ऐसा लगने लगा है कि देश अब खुले आसमान तले सांस लेने की परिस्थिति में आ रहा है। यह ताकत उन संस्थानों तक भी पहुंचती दिख रही है जिस ताकत की उम्मीद देश ने खो दी थी। इसमें देश के सुप्रीम कोर्ट को भी शामिल किया जा सकता है। तभी सुप्रीम कोर्ट के एक जस्टिस की आवाज देश सुन रहा है। यह अलग बात है कि इसी दौर में चीफ जस्टिस आफ इंडिया जस्टिस सूर्य कांत के कार्यक्रम रद्द हो रहे हैं। क्या सरकार को डर लगने लगा है कि पता नहीं सीजेआई सूर्य कांत कब कहां क्या कैसे बोल बोल दें या फिर एक झटके में जो हिम्मत जं जी ने देश के भीतर परोसी है तो सीजेआई सूर्य कांत भी उसी का जिक्र ना करने लग जाएं। ठीक वैसे ही जैसे जस्टिस उज्जवल भुइंया ने पारदर्शिता होनी चाहिए का जिक्र खुलकर कर दिया। उम्मीद की जा सकती है कि पारदर्शिता के जिस सवाल को जस्टिस उज्जवल भुइंया ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के संदर्भ में उठाया है उसका विस्तार होगा।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार



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