मुख ढकने की बढ़ती प्रवृत्ति चिंता का विषय : भारतीय संस्कृति का संदेश- चरित्र और कर्म से बनती है पहचान न कि मुख छिपाने से
आधुनिक भारत तीव्रता से उन्नति के मार्ग पर प्रसस्त है। विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और आधुनिक जीवनशैली ने समाज को नई दिशा दी है, लेकिन कुछ ऐसे चलन भी तेजी से बढ़े हैं जो सामाजिक और सुरक्षा की दृष्टि से चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। इन्हीं में से एक है युवाओं द्वारा बिना किसी आवश्यक कारण के पूरे मुख को कपड़े, स्कार्फ, नकाब या अन्य माध्यमों से ढककर सार्वजनिक स्थानों पर घूमना। न केवल कुछ युवक ऐसा कर रहे हैं अपितु अधिकतर युवतियां भी सड़कों, सार्वजनिक स्थानों पर मुख ढककर चलते, यात्रा करते अथवा कोई न कोई वाहन चलाते सड़क पर दिखाई देती हैं। ऐसा प्रचलन केवल एक फैशन नहीं रह गया है, बल्कि कई बार अपराधियों के लिए अपनी पहचान छिपाने का आसान माध्यम भी बन जाता है। अभी कल ही फरीदाबाद के सिकरौना ग्राम में एक शिक्षिका की हत्या की घटना ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। प्रारंभिक जानकारी एवं सीसीटीवी फुटेज के अनुसार आरोपी ने अपना चेहरा पूरी तरह ढक रखा था, जिससे उसकी पहचान करना न केवल कठिन हो गया है अपितु सिद्ध करना भी एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। यह घटना केवल एक अपराध नहीं है, बल्कि समाज के सामने एक गंभीर प्रश्न भी खड़ा करती है कि क्या हमारी सार्वजनिक व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें कोई व्यक्ति अपनी पहचान पूरी तरह छिपाकर आसानी से घूम सके?
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यदि कोई व्यक्ति धूल, प्रदूषण, संक्रमण, बीमारी या चिकित्सकीय कारणों से मास्क पहनता है, तो वह पूरी तरह उचित और आवश्यक है। कोविड-19 महामारी ने हमें सिखाया कि कई परिस्थितियों में मास्क जीवनरक्षक भी हो सकता है। इसलिए स्वास्थ्य संबंधी कारणों से मास्क पहनने पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती। चिंता उस प्रवृत्ति से है जिसमें बिना किसी आवश्यकता के पूरे चेहरे को इस प्रकार ढक लिया जाता है कि व्यक्ति की पहचान ही संभव न रहे।
भारतीय संस्कृति में मुख मंडल सम्मान, आत्मविश्वास और पहचान का प्रतीक माना गया है। हमारी सभ्यता ने सदैव सत्य, पारदर्शिता और उच्च आचरण वाले व्यक्तित्व को महत्व दिया है। हमारे देवी-देवताओं—माँ दुर्गा, माँ लक्ष्मी, माँ सरस्वती और नवदुर्गा—के सभी चित्रों और प्रतिमाओं में उनका तेजस्वी एवं खुला मुख दिखाई देता है। यह संदेश देता है कि शक्ति, सम्मान और आत्मविश्वास अपनी पहचान छिपाने में नहीं, बल्कि उसे गरिमा के साथ प्रस्तुत करने में है।
आज सोशल मीडिया और फिल्मी प्रभाव के कारण अनेक युवा बिना यह सोचे कि इसका सामाजिक प्रभाव क्या होगा, पूरे चेहरे को ढककर घूमना आधुनिकता और स्टाइल का प्रतीक मानने लगे हैं। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है। जब अधिकांश लोग अपना चेहरा छिपाने लगते हैं, तब अपराधियों के लिए भी भीड़ में घुल-मिल जाना सरल हो जाता है। ऐसे में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के सामने पहचान करना कठिन हो जाता है, जिससे अपराधों की जाँच भी प्रभावित हो सकती है। सार्वजनिक स्थानों, विद्यालयों, महाविद्यालयों, बाजारों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों, बैंक, एटीएम और सरकारी कार्यालयों में पहचान स्पष्ट होना सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है। आज अधिकांश स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं ताकि अपराधों पर अंकुश लगाया जा सके। लेकिन यदि व्यक्ति का चेहरा पूरी तरह ढका हो, तो कैमरों की उपयोगिता भी काफी कम हो जाती है। इस विषय पर समाज, परिवार और शैक्षणिक संस्थानों को भी गंभीरता से विचार करना होगा। माता-पिता अपने बच्चों को यह समझाएँ कि फैशन का अर्थ अपनी पहचान छिपाना नहीं है। शिक्षक विद्यार्थियों में सामाजिक जिम्मेदारी का भाव विकसित करें। सामाजिक संगठनों को जागरूकता अभियान चलाने चाहिए कि सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का भी दायित्व है। प्रशासन भी इस विषय पर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। जहाँ सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यकता हो, वहाँ पहचान सुनिश्चित करने के लिए उचित नियम बनाए जा सकते हैं। कई देशों में संवेदनशील क्षेत्रों में प्रवेश से पहले चेहरे की पहचान अनिवार्य होती है।
भारत में भी सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाते हुए व्यावहारिक उपाय किए जा सकते हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी भी व्यक्ति के पहनावे या वेशभूषा का सम्मान करना हमारा संवैधानिक और सामाजिक दायित्व है। इसलिए इस विषय पर चर्चा करते समय किसी धर्म, समुदाय या परंपरा को लक्ष्य बनाना उचित नहीं है। हमारा उद्देश्य केवल यह होना चाहिए कि सार्वजनिक सुरक्षा सुदृढ़ हो, अपराधियों को पहचान छिपाने का अवसर न मिले और सामान्य नागरिक सुरक्षित वातावरण में जीवन जी सकें। भारत की पहचान उसकी संस्कृति, सभ्यता, विश्वास और स्वतंत्र सामाजिक व्यवहार से रही है। हमारा मुख केवल हमारी पहचान नहीं, बल्कि हमारे आत्मविश्वास, पारदर्शिता और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है। इसलिए आवश्यकता है कि हम फैशन और सुविधा के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसे आचरणों को बढ़ावा दें जो समाज को अधिक सुरक्षित और विश्वासपूर्ण बनाएँ। आज समय की माँग है कि युवा अपनी ऊर्जा राष्ट्र निर्माण में लगाएँ, अपनी पहचान पर गर्व करें और ऐसे किसी भी चलन से बचें जिससे समाज में असुरक्षा का वातावरण उत्पन्न हो। जब नागरिक जागरूक होंगे, परिवार सजग होंगे और प्रशासन सतर्क रहेगा, तभी हम एक सुरक्षित, संस्कारित और जिम्मेदार भारत का निर्माण कर सकेंगे। मुख छिपाने से नहीं, चरित्र और कर्म से पहचान बनती है। यही भारतीय संस्कृति का संदेश है और यही सुरक्षित समाज की आधारशिला भी है।
डॉ. अशोक कुमार वर्मा




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