पीएम मोदी ने जारी किया था जीडीपी का आंकड़ा : GDP ने रफ्तार पकड़ी, फिर नौकरी की रफ्तार क्यों थमी? 7.8% ग्रोथ के पीछे छिपी रोजगार की बड़ी पहेली
भारत की अर्थव्यवस्था ने अप्रैल-जून तिमाही में 7.8% की मजबूत GDP ग्रोथ दर्ज की है, लेकिन इस तेज आर्थिक रफ्तार के साथ एक अहम सवाल भी खड़ा हो गया है—अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है तो युवाओं को बड़ी संख्या में अच्छी और स्थायी नौकरियां क्यों नहीं मिल रहीं?
GDP के शुरुआती अनुमान को अंतिम आंकड़ा नहीं माना जाता। आगे होने वाले संशोधनों के बाद इसमें बदलाव संभव है। इसलिए मौजूदा 7.8% को लेकर तकनीकी बहस से ज्यादा महत्वपूर्ण यह समझना है कि आर्थिक विस्तार का फायदा रोजगार की गुणवत्ता में कितना दिखाई दे रहा है।
निवेश बढ़ा, लेकिन तस्वीर पूरी नहीं बदली
निवेश के मोर्चे पर संकेत उत्साहजनक हैं। वास्तविक ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (GFCF) में 11.9% की वृद्धि हुई और GDP में इसकी हिस्सेदारी करीब 31.4% से बढ़कर 34.3% हो गई। CMIE के आंकड़ों के मुताबिक पहली तिमाही में निजी कंपनियों के नए निवेश में भी करीब 97% उछाल आया। कैपिटल गुड्स सेक्टर की लगभग 15% वृद्धि भी औद्योगिक निवेश में तेजी की ओर इशारा करती है।
FDI को लेकर भी तस्वीर केवल नकारात्मक नहीं है। 2025-26 में ग्रॉस FDI करीब 94.53 अरब डॉलर पहुंचा, जो पिछले वर्ष के 80.62 अरब डॉलर से अधिक है। हालांकि नेट FDI अपेक्षाकृत कमजोर रहा, क्योंकि विदेशी कंपनियों की पूंजी निकासी और भारतीय कंपनियों के विदेश में निवेश का असर पड़ा।
रोजगार बढ़ा, लेकिन ‘अच्छी नौकरी’ की कमी
PLFS के अनुसार बेरोजगारी दर 2017-18 के 6% से घटकर 2023-24 में 3.2% रह गई। इसी अवधि में श्रम बल भागीदारी दर 49.8% से बढ़कर 60.1% और वर्कर-पॉपुलेशन रेशियो 46.8% से बढ़कर 58.2% हुआ।
लेकिन इन आंकड़ों की एक सीमा है। रोजगार में व्यक्ति का काम करना दर्ज होता है, उसकी नौकरी की गुणवत्ता नहीं। खेत में परिवार की मदद करने वाला व्यक्ति या कम आय वाला स्वरोजगार करने वाला भी रोजगार की श्रेणी में आ सकता है। असली चुनौती उत्पादक, औपचारिक और बेहतर वेतन वाली नौकरियां पैदा करना है।
कंपनियां नियमित भर्ती से क्यों बचती हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार एक बड़ी वजह स्थायी और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की लागत में अंतर है। नियमित कर्मचारी पर PF, ESI, छुट्टी, बोनस, ग्रेच्युटी और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ जोड़ने से कंपनियों की कुल लागत काफी बढ़ सकती है। ऐसे में कारोबारी संस्थानों के पास आउटसोर्सिंग, कॉन्ट्रैक्ट वर्क और ऑटोमेशन की ओर जाने का आर्थिक प्रोत्साहन रहता है।
यही वजह है कि सिर्फ GDP को 7% से 8% तक पहुंचा देना रोजगार की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। आर्थिक वृद्धि के साथ श्रम बाजार में ऐसे सुधार भी जरूरी हैं, जिनसे कंपनियों के लिए औपचारिक रोजगार पैदा करना आसान हो और कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा भी मिले।
आंकड़ों पर बहस से ज्यादा जरूरी पारदर्शिता
GDP के आंकड़ों की तकनीकी पद्धति पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन इससे अपने आप आंकड़ों में हेरफेर साबित नहीं होता। जरूरत इस बात की है कि सरकार मूल डेटा, उसके वेट और गणना की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाए।
भारत के सामने अब असली चुनौती सिर्फ तेज GDP ग्रोथ हासिल करना नहीं, बल्कि उस ग्रोथ को ऐसी नौकरियों में बदलना है जिनसे युवाओं की आय, सुरक्षा और जीवन स्तर वास्तव में बेहतर हो।





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