खरी-अखरी : क्या सुप्रीम कोर्ट अपनी आन बचाने की कोशिश कर रहा है ?
जं जी, जं अल्फा, युवा जिन सवालों को उठाते हुए सामने आये उसने मौजूदा वक्त की राजनीति ही नहीं बल्कि देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों परिस्थितियों को एक मैसेज दे दिया है कि लड़ाई जनरेशन की है। जनरेशन की लड़ाई के दायरे में गवर्नेंस के तौर तरीके, तानाशाही के तौर तरीके कोई मायने नहीं रखते हैं। राजनीतिक सत्ता को समझना होगा कि आप जिन पर राज करना चाहते हैं उनमें और आपके बीच में आधी सदी का फासला है। आप 75 साल के हैं वह 25 साल का है। उनकी सोच, समझ, सवाल सब आपकी समझ के दायरे से बाहर हैं। और खास कर इस दौर में जब आप बीते 12 बरस से जिस राजनीति के आसरे देश में अपने हिसाब से सामाजिक आर्थिक राजनीतिक परिभाषा गढ़ रहे हैं। जिस तरह से देश और दुनिया की टेक्नोलॉजी युवाओं की पहुंच में है उसको आप रोक नहीं सकते हैं। उस पर लाइसेंसिंग नहीं कर सकते हैं क्योंकि मौजूदा समय में आपके सवाल ही देश में कोई मतलब मायने नहीं रखते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जं जी के सवालों पर खामोशी ओढ़ लेते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गवर्नमेंट की साख डगमग है। जब जी 20 सम्मेलन हुआ तो पखवाड़े भर पहले से दिल्ली को दुल्हन की तरह सजा दिया गया था लेकिन अब जब चंद दिन बाद ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होने वाला है तो दिल्ली की मांग सिंदूर विहीन दिख रही है। तो क्या अंतरराष्ट्रीय तौर पर भारत को अंतरराष्ट्रीय ताकतें मान्यता नहीं दे रही हैं ? या मौजूदा समय में विदेश नीति या डिप्लोमेसी दुनिया के दूसरे देशों के साथ संबंध और सहयोग बनाने में विफल हो गई है ? क्या किसी सरकार का महत्व सिर्फ और सिर्फ इससे है कि उसने चुनाव जीता है ? वह भी तब जब तमाम विपक्षी पार्टियों के नुमाइंदे सड़क से लेकर पार्लियामेंट तक सरकार के चुनाव जीतने के तौर-तरीकों पर उंगली उठाते हैं। चुनाव आयोग यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट तक सत्ता के साथ खड़ा दिखाई देता है ! क्या सत्ता और राजनीति की उपयोगिता देश में खुद को आटोक्रेट बनाने की है ? जहां हम जो कहें सिर्फ उसी को सुना जाए बाकी के कहे को देशद्रोह करार दे दिया जाए।
शिक्षक दिवस के दिन चीफ जस्टिस आफ इंडिया जस्टिस सूर्य कांत ने एक कार्यक्रम में कहा कि हर महीने एक सेमिनार डेमोक्रेसी को लेकर आयोजित किया जाएगा। तो क्या उसमें ऐसे विषयों पर मंथन होगा जिन पर बीते 12 सालों से चर्चा हुई ही नहीं और अगर हुई भी है तो सिर्फ एक ही आवाज सुनाई देती रही जो सत्ता के अनुकूल होती थी। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के भीतर से आवाज आ रही है कि हम जाग गये हैं। हम संविधान की व्याख्या करेंगे। सुप्रीम कोर्ट जिस तरीके से गाहेबगाहे सेमीनारों में जिन बातों का जिक्र करता है अगर वह हर उस मसले को जो देश के नागरिकों के हक और अधिकार से जुड़े हुए हैं उन्हें न्याय दिलाने लग जाए तो क्या बीते बारह बरस की सत्ता की ऐंठन खत्म हो जाएगी ? क्योंकि अभी तक तो सत्ता से जुड़े हुए हर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खामोशी ही बरती हुई थी।
देश की प्रीमियर ऐजेंसियों की दुर्दांदता को लेकर जब भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया तो उसने अपने हाथ खींच लिए। सुप्रीम कोर्ट ने पीएम केयर फंड को लेकर आंखें बंद कर ली। क्या अब वह पीएम केयर फंड को लेकर सवाल खड़ा करते हुए देश के प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा करेगा ? सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रोरल बाण्ड को लेकर यह तो कह दिया कि यह गैरकानूनी और असंवैधानिक है लेकिन उसने यह कहने से परहेज किया कि जो 100 करोड़ से ज्यादा की पालिटिकल फंडिंग हुई है वह ब्लैकमनी है तो वह तमाम राजनीतिक दलों से वापस लेकर देश के खजाने में जमा की जाएगी। पेगासस के जरिए देश के तमाम खास लोगों की यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के जजेज की जासूसी कराने का मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया और सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ लेकर जानकारी साझा करने से मना कर दिया तो सुप्रीम कोर्ट ने खामोशी ओढ़ ली। जबकि सुप्रीम कोर्ट को सरकार को कटघरे में खड़ा करके कहना चाहिए था कि आपने जो भी किया है वह आपके अधिकार क्षेत्र से बाहर है इसलिए हम आपके खिलाफ एक नए केस की शुरुआत करते हैं।
महाराष्ट्र में जब शिवसेना को तोड़ कर बीजेपी ने सरकार बनाई और मामला सुप्रीम कोर्ट की ड्योढ़ी पर पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने यह तो कहा कि राज्यपाल की भूमिका गैरकानूनी थी लेकिन उसने बीजेपी सरकार को हटा कर पिछली सरकार को बहाल नहीं किया। जबकि उसे पिछली सरकार को बहाल करना चाहिए था या फिर बीजेपी गवर्नमेंट को डिसक्वालीफाई करते हुए चुनाव कराने का आदेश देना था। सुप्रीम कोर्ट के पास जब ईवीएम और एसआईआर का मामला आया तो उसने जिस तरह की कार्यप्रणाली अपनाई उसने देश को निराश ही किया यह कहकर कि हम चुनाव आयोग के मामले में दखल नहीं देंगे। जबकि यह मामले चुनाव आयोग से ज्यादा देश के नागरिकों को संविधान प्रदत्त अधिकारों का मामला था। इसकी बड़ी लंबी फेहरिस्त है।
संविधान की व्याख्या तो आखिर सुप्रीम कोर्ट ही करता है और सारी विपरीत परिस्थितियों के बाद भी देशवासियों की उम्मीद न्याय को लेकर न्यायपालिका पर ही टिकी होती है। मोदी ने जब ताजा ताजा दिल्ली की सल्तनत सम्हाली तो उसने जजों की नियुक्ति में अपनी भागीदारी करने के लिए कमेटी तक बना दी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपनी आन पर बट्टा लगते देख सरकार के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। लेकिन यही प्रक्रिया मोदी सरकार आज अपनाने लग जाए तो क्या सुप्रीम कोर्ट उसे खारिज कर सकता है ? वह भी तब जब ऐसी ऐसी घटनाएं घटती चली गई। मौजूदा राजनीतिक सत्ता ने चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करने वाली कमेटी से चीफ जस्टिस आफ इंडिया को बाहर का रास्ता दिखा दिया और सुप्रीम कोर्ट देखता रह गया। सीजेआई जस्टिस बीआर गवई पर जूता फेका गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चीफ जस्टिस आफ इंडिया जस्टिस डीवाई चंद्रचूड के घर गणेश जी की पूजा-अर्चना करने पहुंच गए। सीजेआई रंजन गोगोई को रिटायर्मेंट के चंद महीने के भीतर ही राज्यसभा में नामिनेट कर दिया गया।
बीते 12 बरस में मौजूदा राजनीतिक सत्ता ने जो फैसले लिए और वह सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंचे उस पर कोर्ट ने खामोशी ही बरती या फिर उसके फैसले सरकार के पक्ष में दिखाई दिए। लेकिन अब ऐसा महसूस हो रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की तंद्रा टूट रही है या फिर उसे समझ में आने लगा है कि अगर उसने इसी तरीके की खामोशी बरती गई तो उसकी बची खुची साख भी बचेगी नहीं। बीते 12 बरस में दो ही तो मंत्रालय हैं जो सबसे ज्यादा सक्रिय रहे। पीएमओ और गृह मंत्रालय या कहें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह। पीएमओ से जारी कोई भी पर्चा, कोई भी लिखित शब्द वह एक ऐसी लकीर होती है जिसे कोई मिटा नहीं सकता। इससे हटकर ना तो किसी दूसरे मंत्रालय की कोई पहचान है ना किसी मंत्री की। यहां तक कि मंत्री की अपने मंत्रालय तक में कोई औकात नहीं है। भले ही एजुकेशन मिनिस्टर को हटा दिया गया लेकिन फजीहत तो प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की ही हो रही है। ई-20 एथेनाल को लेकर भी उंगली यह कहते हुए उठ रही है कि निर्णय तो सरकार ही लेती है और सरकार का मतलब तो पीएम मोदी ही है।
2014 में दिल्ली पुलिस का बजट 4631 करोड़ था जो आज की स्थिति में 12504 करोड़ यानी तकरीबन तीन गुना ज्यादा है। गृह मंत्रालय का बजट 2014 में 74 हजार करोड़ था उसमें अकल्पनीय बढ़त होते हुए 2 लाख 55 हजार करोड़ रुपये हो गया है। पुलिसिंग डेमोक्रेसी को अपने हाथ में समेटना चाहती है। इस दौर में ट्रेनिंग के बाद या पासिंग आउट पर जब प्रधानमंत्री आईएएस, आईपीएस से मुलाकात करते हैं तो उनको क्या यह मैसेज दिया जाता है कि आपको सत्ता के अनुकूल ही रहना है। सत्ता कुछ भी करे आपको उसी लकीर पर चलना होगा जो सत्ता ने अपने लिए खींची है। गृह मंत्रालय या कहें गृहमंत्री अमित शाह की पुलिसिंग पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुइंया ने एक किताब विमोचन के कार्यक्रम में यह कहते हुए उंगली उठा दी कि जो नए आईपीएस आये हैं उनके हाथों में लाठियां थी जंतर-मंतर पर।
जस्टिस उज्जवल भुइंया कहते हैं “All of us are dismissed when we see young officers of the Indian police service personally going and assaulting protesters and demonstrators this something very very redistricting to observe the detachment expected of police officer sums to be disappearing and this is need a matter of grave concern. Far most common people a police man on the street building a whistle and blackjack represent the power and authority of the state. When they feel song they see the help of the police. It is there for all that the police force maintain it’s credibility it can do so only by strictly ethering to the Constitution by functioning as a truly professional force acting impartially distrusting debt and acting with conviction maintaining integrity and adhering to the cellular principles their by are polling the rule of law. जंतर-मंतर की हालत देखकर आक्रोशित या दुखी होने की जरूरत नहीं है। यह तो इस देश के भीतर का एक ऐसा अवसाद है जो लोकतंत्र के इंस्टीटयूशंस को अपने पास गिरवी रखकर जिस परिभाषा को गढ़ा गया है उस परिभाषा में कोई दवाई काम नहीं कर सकती है।
चीफ जस्टिस आफ इंडिया जस्टिस सूर्य कांत ने ही तो प्रतिबंध लगाया था ज्युडीशरी में करप्शन है पाठ वाली एनसीईआरटी की आठवीं वाली किताब पर। यहां तक कि जिन तीन शिक्षाविदों ने उस चैप्टर को लिखा था उन पर भी प्रतिबंध लगाने का हुक्मनामा जारी कर दिया था। लेकिन अब उन्होंने ही सू-मोटो लेकर उस प्रतिबंध को हटा दिया है। नोएडा में मजदूरों का आंदोलन हुआ तो डी एम के कहने पर आकृति चौधरी पर एनएसए लगा दिया गया, मामला जब इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया और डीएम के वेतन से मुआवजे की राशि दिए जाने का आदेश दे दिया। आखिर यह हृदय परिवर्तन क्यों और कैसे हो रहा है। इस दौर में क्या सुप्रीम कोर्ट उन तमाम सवालों को परखने के लिए तैयार है जो सवाल जं जी के सवालों के बीच खामोश कर दिए गए थे और अब वह एक झटके में उभरने लगे हैं।
जंतर-मंतर पर जिस तरह से जं जी पर लाठियां भांजी गई लेकिन यह बात निकल कर आ रही है कि नौकरशाही इस तरह से बच्चों पर हाथ उठाना नहीं चाहती थी वह तो दिल्ली सल्तनत के दबाव में किया गया है। तो क्या यह मैसेज समाज के भीतर उस चर्निंग पोजीशन में देश को लाकर खड़ा कर रहा है जहां पर देश का पालिटिकल ट्रांसफार्मेशन पहली बार उस सोशल ट्रांसफार्मेशन को साथ लेकर चल रहा है जिसको हमेशा से राजनीति में इग्नोर किया है। तो क्या यह माना जाए कि इस दौर में सवाल सुप्रीम कोर्ट, पीएमओ, होम मिनिस्ट्री को परेशान कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट हरकत में आ रहा है। ट्रांसफार्मेशन देश के सोशल स्ट्रक्चर को लेकर हो रहा है और पालिटिकल जड़ें हिली हुई हैं।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार





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