जब मौत ने कहा—“मैं तो मजाक कर रही थी!”
उस अस्पताल में मृत्यु प्रमाण-पत्र से ज्यादा सांसों की वापसी ने मचाई हलचल। देखा जाये तो अस्पतालों में आमतौर पर मरीज इलाज कराने जाते हैं और डॉक्टर बीमारी का इलाज करते हैं। लेकिन कभी-कभी हालात ऐसे बन जाते हैं कि इलाज से पहले खबरों का इलाज जरूरी हो जाता है।
रीवा के एक अस्पताल की घटना ने तो मानो चिकित्सा विज्ञान और हास्य के बीच की दूरी ही खत्म कर दी। करीब 80 वर्षीय महिला को जांच के बाद मृत घोषित कर दिया गया। परिवार ने मन भारी कर लिया, अस्पताल की प्रक्रिया आगे बढ़ने लगी और मामला लगभग समाप्त मान लिया गया।
लेकिन अगले दिन कहानी में ऐसा ट्विस्ट आया कि मौत भी शायद अपनी डायरी लेकर बैठ गई होगी—
“अरे, मेरा नाम गलत लिख दिया क्या?”
महिला की सांसें फिर चलती मिलीं। अस्पताल में हड़कंप मच गया। डॉक्टरों ने तत्काल उन्हें दोबारा गंभीर रोगी वार्ड में भर्ती किया और उपचार शुरू कर दिया।
अब सवाल यह नहीं कि सांसें कैसे लौट आईं—सवाल यह है कि मौत की घोषणा इतनी जल्दी क्यों कर दी गई?
क्योंकि आजकल हर जगह “फास्ट सर्विस” का जमाना है। ऑनलाइन खाना जल्दी, मोबाइल रिचार्ज जल्दी, टिकट जल्दी और शायद कुछ जगहों पर मौत की घोषणा भी जल्दी!
मगर चिकित्सा कोई फास्ट-फूड काउंटर नहीं है कि—
“एक मरीज मृत घोषित कर दीजिए…
और हाँ, पैक करके परिजनों को दे दीजिए!”
इस घटना का सबसे बड़ा व्यंग्यात्मक पक्ष यही है कि जिस महिला को कागजों में मृत बता दिया गया था, वह अगले दिन मानो खुद अस्पताल से कह रही हों—
“भाइयों, कागज बाद में देख लेना, पहले मुझे सांस लेने दो!”
अस्पताल के दस्तावेजों में मृत्यु दर्ज हो चुकी थी, लेकिन जिंदगी ने दस्तावेजों की परवाह किए बिना अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। यह स्थिति हमें याद दिलाती है कि कागज पर लिखी गई बात और जमीन पर मौजूद सच्चाई में फर्क होता है।
मृत्यु जैसी गंभीर स्थिति में जांच और चिकित्सकीय मानकों का पालन बेहद जरूरी है। आखिर डॉक्टर के एक निर्णय से किसी परिवार की उम्मीद, भावनाएं और आगे की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
और अगर कोई मरीज अगले दिन उठकर सांस लेने लगे तो परिवार वाले डॉक्टर से शायद यही पूछेंगे—
“डॉक्टर साहब, मृत्यु प्रमाण-पत्र वापस ले लें,
मरीज ने खुद ही अपना अपील-पत्र दाखिल कर दिया है!”
यह घटना हंसने का अवसर जरूर देती है, लेकिन इसके भीतर एक गंभीर संदेश भी छिपा है—चिकित्सा में जल्दबाजी की कोई गुंजाइश नहीं। जिंदगी और मौत के बीच का फैसला पूरी सावधानी, उचित जांच और निर्धारित चिकित्सकीय प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए।
वरना कहीं ऐसा न हो कि अगली बार मौत खुद अस्पताल पहुंचकर बोले—
“भाई साहब, मुझे बदनाम मत करो…
मैं तो अभी इस मरीज को लेने आई ही नहीं थी!”
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर





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