प्रशासनिक रवैये से भाजपा से शहरवासियों का मुंह खट्टा?
पार्षद जनता के बीच घिरे, प्रशासनिक फैसलों ने बिगाड़े रिश्ते! विकास न हुआ, शिकायतें भी अनसुनी रहीं—क्या इसकी राजनीतिक कीमत भाजपा को चुकानी पड़ेगी?
चंडीगढ़। नगर निगम चुनावों की आहट के बीच चंडीगढ़ की राजनीति में एक बड़ा सवाल तेजी से उभर रहा है—क्या प्रशासनिक कार्यशैली ने भाजपा के पार्षदों को उनके ही वार्डों में कमजोर कर दिया?
शहर के कई हिस्सों में लोगों के बीच यह चर्चा है कि पार्षदों ने जनता की समस्याएं प्रशासन तक पहुंचाईं, लेकिन समस्याओं का समाधान न होने का खामियाजा अंततः उन्हें ही भुगतना पड़ा।
स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे आरोपों के मुताबिक, पिछले वर्षों में कई भाजपा पार्षद अपने वार्डों में सड़क, पानी, सफाई, पार्क, पार्किंग, निर्माण और अन्य नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दे उठाते रहे। लेकिन आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर उनकी मांगों को अपेक्षित गंभीरता नहीं मिली।
परिणाम यह हुआ कि जनता सवाल पार्षद से पूछती रही और पार्षद जवाब के लिए प्रशासन की ओर देखते रहे।
सबसे गंभीर स्थिति उन मामलों में बताई जा रही है, जहां कॉलोनियों, मकानों अथवा अन्य निर्माणों पर कार्रवाई का मामला सामने आया। आरोप है कि संबंधित पार्षदों ने लोगों की परेशानियां प्रशासन के सामने रखीं और कार्रवाई रोकने अथवा राहत देने की मांग की, लेकिन कई मामलों में कार्रवाई जारी रही।
इससे पार्षदों और उनके वार्डवासियों के बीच वर्षों से बने संबंधों में भी खटास आने की बात कही जा रही है।
राजनीतिक तौर पर सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जनता प्रशासनिक फाइल नहीं देखती, उसे अपने चुने हुए प्रतिनिधि का चेहरा दिखाई देता है। काम न होने पर सवाल पार्षद से होता है, भले ही निर्णय किसी दूसरे स्तर पर हुआ हो।
यही स्थिति भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकती है। यदि पार्षद जनता की समस्याएं उठाते रहे, लेकिन उन्हें प्रशासनिक स्वीकृति या अमल नहीं मिला, तो जनता के बीच यह संदेश गया हो सकता है कि उनके प्रतिनिधि प्रभावहीन हैं।
आरोप यहां तक लगाए जा रहे हैं कि प्रशासनिक फैसलों और कथित उदासीनता ने भाजपा पार्षदों की राजनीतिक जमीन कमजोर करने में भूमिका निभाई। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और प्रत्येक मामले में प्रशासन का पक्ष अलग-अलग आवश्यक है।
नगर निगम चुनाव नजदीक आने पर यही अधूरे काम, लंबित शिकायतें और प्रशासन-पार्षदों के बीच कथित तालमेल की कमी चुनावी मुद्दा बन सकती है।
यदि पार्षद जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं, तो उनकी बात प्रशासन में कितनी सुनी गई? और यदि उनकी बात नहीं सुनी गई, तो जवाबदेही किसकी है?
चंडीगढ़ की जनता आने वाले चुनाव में केवल यह नहीं देखेगी कि किसने क्या वादा किया था, बल्कि यह भी देखेगी कि पांच साल में उसके वार्ड में वास्तव में क्या बदला।
- पार्षदों की छवि खराब हुई या प्रशासनिक व्यवस्था ने उन्हें कमजोर किया?
- विकास कार्यों में देरी क्यों हुई?
- पार्षदों की सिफारिशों पर कितनी कार्रवाई हुई?
- जनता की शिकायतों पर कितने लिखित निर्णय हुए?
- निर्माण/तोड़फोड़ के मामलों में पार्षदों की आपत्तियों का क्या हुआ?
- जनता पार्षद से सवाल करे तो पार्षद प्रशासन से जवाब क्यों मांगता रहे?
- क्या प्रशासनिक फैसलों का राजनीतिक नुकसान भाजपा को उठाना पड़ेगा?
जगदीप शर्मा




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