निजता की आड़ में पत्रकारिता पर लगाम? 21 मीडिया प्रकाशक पहुंचे सुप्रीम कोर्ट
मई 2027 से लागू होने वाले डेटा संरक्षण कानून के प्रावधानों पर उठे सवाल, खोजी पत्रकारिता, खबरों के रिकॉर्ड और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा को लेकर जताई चिंता
नई दिल्ली। क्या डिजिटल निजता की रक्षा के लिए बनाया गया कानून भविष्य में पत्रकारों के लिए भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का पर्दाफाश करना मुश्किल बना सकता है? भारत में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून (DPDP Act) को लेकर उठे विवाद ने प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिकों की निजता के बीच संतुलन पर बहस तेज कर दी है। रॉयटर्स की 26 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 21 समाचार प्रकाशकों ने कानून के कुछ प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए पत्रकारिता के लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा की मांग की है। विवादित प्रावधानों का एक हिस्सा मई 2027 से लागू होना है।
प्रकाशकों की मुख्य चिंता यह है कि यदि पत्रकारिता के लिए पर्याप्त छूट नहीं दी गई, तो सार्वजनिक हित से जुड़ी खबरों की पड़ताल, महत्वपूर्ण दस्तावेजों का इस्तेमाल और भ्रष्टाचार उजागर करने की प्रक्रिया कानूनी उलझनों में फंस सकती है। यह मामला केवल मीडिया संस्थानों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन नागरिकों से भी जुड़ा है, जो पत्रकारिता के माध्यम से सरकारी विभागों, कंपनियों और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के कामकाज की जानकारी हासिल करते हैं।
खबर छापने से पहले ही आरोपी की सहमति जरूरी हुई तो?
खोजी पत्रकारिता में कई बार ऐसे लोगों और संस्थानों की जांच करनी पड़ती है, जिनकी भूमिका खुद सवालों के घेरे में होती है। प्रकाशकों का तर्क है कि यदि व्यक्तिगत जानकारी जुटाने से पहले संबंधित व्यक्ति की सहमति लेना जरूरी हो गया, तो जांच की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है।
उदाहरण के तौर पर, किसी सरकारी विभाग में कथित भ्रष्टाचार या कंपनी के संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की पड़ताल कर रहे पत्रकार को यदि पहले ही संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेनी पड़े, तो सबूत मिटाने, दस्तावेज छिपाने या संभावित गवाहों को प्रभावित करने का जोखिम पैदा हो सकता है।
यही वजह है कि मीडिया प्रकाशक कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट अपवाद चाहते हैं। उनका कहना है कि निजता की रक्षा जरूरी है, लेकिन उसका दायरा इस तरह तय होना चाहिए कि जनहित में तथ्यों की जांच करने का अधिकार प्रभावित न हो।
पुरानी खबरें हटवाने का रास्ता खुलने की आशंका
विवाद का एक अन्य पहलू व्यक्तिगत जानकारी को मिटाने की मांग से जुड़ा है। प्रकाशकों को आशंका है कि पर्याप्त कानूनी सुरक्षा के अभाव में इस व्यवस्था का इस्तेमाल पुरानी खबरों को हटवाने या उनमें से महत्वपूर्ण तथ्यों को निकलवाने के लिए किया जा सकता है।
किसी घोटाले, कारोबारी अनियमितता या सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के विवादित कामकाज से संबंधित पुरानी रिपोर्टें समय के साथ महत्वपूर्ण दस्तावेजी रिकॉर्ड बन जाती हैं। यदि ऐसी खबरों को हटाने या बदलने की मांगों पर मीडिया संस्थानों को बार-बार कानूनी दबाव झेलना पड़े, तो सार्वजनिक महत्व की सूचनाओं तक लोगों की पहुंच प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि कानून के तहत हर खबर हटाने की मांग स्वीकार हो जाएगी। वास्तविक प्रभाव संबंधित प्रावधानों की व्याख्या, उनके क्रियान्वयन और अदालत के फैसले पर निर्भर करेगा।
गोपनीय सूत्रों की पहचान पर भी सवाल
खोजी पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण आधार वे गोपनीय सूत्र होते हैं, जो सरकारी विभागों, कंपनियों या अन्य संस्थानों के भीतर की जानकारी सामने लाने में मदद करते हैं। कई बार ये लोग अपनी पहचान उजागर होने के डर से गोपनीयता की शर्त पर दस्तावेज और सूचनाएं साझा करते हैं।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, प्रकाशकों ने सरकार को व्यक्तिगत डेटा से संबंधित जानकारी मांगने की व्यापक शक्तियां दिए जाने पर भी आपत्ति जताई है। उनकी आशंका है कि पर्याप्त सुरक्षा न होने पर पत्रकारों के पास मौजूद सूचनाओं और उनके स्रोतों की गोपनीयता खतरे में पड़ सकती है।
यदि सूचना देने वालों को अपनी पहचान सामने आने का डर सताने लगे, तो वे अनियमितताओं से जुड़े दस्तावेज साझा करने से पीछे हट सकते हैं। इससे उन मामलों की पड़ताल प्रभावित होने की आशंका है, जिनमें सार्वजनिक संस्थानों की जवाबदेही तय करना जरूरी होता है।
नेटवर्क18, एनडीटीवी और इंडियन एक्सप्रेस समेत 21 प्रकाशक
इस कानूनी चुनौती में देश के कई प्रमुख मीडिया संस्थान शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की ओर से दाखिल याचिका में नेटवर्क18, एनडीटीवी, द इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट जैसे मीडिया समूहों से जुड़े प्रकाशक शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं ने विवादित प्रावधानों को रद्द करने की मांग करते हुए दलील दी है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी रिपोर्टिंग पर ऐसा दबाव बन सकता है, जो खबर प्रकाशित होने से पहले ही उसके कामकाज को प्रभावित करे। उन्होंने कुछ प्रावधानों के संभावित प्रभाव को पूर्व-सेंसरशिप जैसी स्थिति से भी जोड़ा है।
यह याचिकाकर्ताओं की कानूनी दलील है। इन प्रावधानों की वैधता और पत्रकारिता पर उनके वास्तविक प्रभाव को लेकर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी सामने आना बाकी है।
सरकार के आश्वासन पर क्यों नहीं हुआ भरोसा?
रॉयटर्स के अनुसार, मीडिया कंपनियों को अगस्त में सरकार के साथ हुई बैठक में आश्वासन दिया गया था कि कानून प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करेगा। इसके बावजूद प्रकाशकों की चिंता बनी हुई है, क्योंकि उनके मुताबिक पत्रकारिता के लिए स्पष्ट लिखित छूट और सुरक्षा का होना जरूरी है।
इस मामले में मूल सवाल यह है कि क्या सामान्य आश्वासन खोजी पत्रकारिता की व्यावहारिक जरूरतों को पर्याप्त रूप से सुरक्षित कर सकते हैं? पत्रकारों को कई बार ऐसी जानकारी जुटानी होती है, जिसे संबंधित व्यक्ति या संस्था सार्वजनिक नहीं करना चाहती। ऐसे मामलों में निजता के अधिकार और सार्वजनिक हित के बीच स्पष्ट कानूनी सीमाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि टिप्पणी के लिए संपर्क किए जाने पर DNPA, संबंधित मीडिया समूहों और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से जवाब नहीं मिला।
निजता भी जरूरी, प्रेस की आजादी भी
डिजिटल युग में व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा नागरिकों का महत्वपूर्ण अधिकार है। निजी जानकारी का दुरुपयोग रोकना सरकार और संस्थानों की जिम्मेदारी है। लेकिन इस उद्देश्य को लागू करते समय यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि सार्वजनिक हित में की जाने वाली पत्रकारिता अनावश्यक कानूनी बाधाओं में न उलझे।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका इसी संतुलन को लेकर अहम है। मई 2027 से लागू होने वाले विवादित प्रावधानों पर न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि पत्रकारिता को किस तरह की सुरक्षा मिलेगी और डेटा संरक्षण संबंधी शक्तियों की सीमाएं क्या होंगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या निजता की रक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच ऐसा संतुलन बनाया जा सकेगा, जिसमें नागरिकों का डेटा भी सुरक्षित रहे और भ्रष्टाचार, घोटालों तथा सार्वजनिक संस्थानों की अनियमितताओं को उजागर करने वाली पत्रकारिता भी अपना काम कर सके? फिलहाल, 21 प्रकाशकों की कानूनी चुनौती ने इस सवाल को देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में ला खड़ा किया है।





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