31-12-2025
This content is restricted.
This author has not written his bio yet.
But we are proud to say that khabariprashad contributed 4759 entries already.
This content is restricted.
बीता साल, बचे सवाल: 2025 का भारत – डॉ सत्यवान सौरभ इतिहास केवल तारीख़ों और घटनाओं का संग्रह नहीं होता, वह समाज की सामूहिक चेतना का आईना भी होता है। बीते कुछ वर्ष, और विशेष रूप से वर्ष 2025, भारत के लिए ऐसा ही एक आईना बनकर सामने आए—जिसमें हमने अपनी उपलब्धियाँ भी देखीं और […]
अरावली पहाड़ियों की जिस परिभाषा को पहले माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया था, उसी पर अब रोक लगाकर नई उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति के गठन का आदेश देना स्वागत योग्य कदम है। वास्तव में,यह संकेत देता है कि पहले की रिपोर्ट को लेकर जो आम लोगों द्वारा जो आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं, वे […]
This content is restricted.
कालबोध का द्वंद्व या एक सांस्कृतिक धर्मयुद्ध किसी भी जीवंत राष्ट्र के लिए ‘नववर्ष’ उसकी सामूहिक चेतना, उसकी जीवन-दृष्टि और प्रकृति के साथ उसके तादात्म्य का उद्घोष होता है। भारतवर्ष में कालबोध कभी भी यांत्रिक नहीं रहा। यह सदैव ब्रह्मंडीय, प्राकृतिक और आध्यात्मिक रहा है किंतु, वर्तमान कालखंड की विडंबना यह है कि भारतीय समाज […]
— डॉ. सत्यवान सौरभ भारत में आस्था अक्सर तर्क से बड़ी हो जाती है। यही कारण है कि यहाँ मंदिर के बाहर घंटियों की आवाज़ से ज़्यादा तेज़ कभी-कभी साँसों की घुटन होती है, लेकिन हम सुनना नहीं चाहते। मुंबई की एक अदालत का हालिया फैसला—जिसमें सार्वजनिक स्थान पर कबूतरों को दाना डालने पर ₹5000 […]
बचपन से ही सुना था, कि सहभोज से मेल बढ़ता है। गरीब अमीर का भेद मिटता है। सहभोज में अनेक प्रकार के व्यंजनों का स्वाद चखने को मिलता है। संग बैठ कर भोजन करने से स्वाद द्विगुणित हो जाता है। लगता है कि सहभोज सामाजिक समरसता तक अधिक सीमित है राजनीतिक क्षेत्र में सहभोज किसी […]
(जब करोड़ों भी दुल्हन नहीं दिला पाएँ: उत्तर भारत के लिंगानुपात की भयावह सच्चाई) उत्तर भारत में दुल्हन की तलाश में भटकते कुंवारे पुरुष कोई व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि उस समाज की सामूहिक त्रासदी हैं जिसने वर्षों तक बेटियों को बोझ समझा। करोड़ों की संपत्ति, ऊँची नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा आज बेबस दिख रही है। […]
(एक से अधिक पेंशन, यात्रा भत्ते की सर्वसम्मति और 60 साल सेवा के बाद भी पेंशन से वंचित कर्मचारी—लोकतंत्र की उलटी प्राथमिकताओं की कहानी) सवाल राशि का नहीं, नियत का है। सवाल यह है कि जब एक आम कर्मचारी 30–35 साल सेवा देने के बाद भी पेंशन के लिए दर-दर भटकता है, जब लाखों कर्मचारी […]
This content is restricted.
