संपादकीय : परोपकार बन रहा प्रचार और व्यापार का माध्यम !
आज के दौर में एक पुरानी कहावत अब बदल चुकी है। कभी कहा जाता था— “नेकी कर और दरिया में डाल।” लेकिन अब जमाना ऐसा है कि लोग कहते हैं— “नेकी कर और सोशल मीडिया पर डाल।”
सच यह है कि समाज सेवा और परोपकार का भाव दिल से होना चाहिए, न कि दिखावे से। लेकिन सोशल मीडिया की चकाचौंध ने इस मूल भावना को कहीं न कहीं धुंधला कर दिया है। किसी भूखे को खाना खिलाने या जरूरतमंद को कपड़े देने का वास्तविक उद्देश्य इंसानियत की सेवा है। परंतु जब वही काम कैमरे और पोस्ट के जरिए ‘फॉलोअर्स’ और ‘लाइक’ बटोरने का साधन बन जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है कि असल मकसद मदद है या प्रचार।
दुर्भाग्य यह है कि कई बार छोटी-सी मदद को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। पांच लोगों को जूते बाँटे जाते हैं और बताया जाता है कि पाँच सौ को बाँटे। एक भूखे को खाना खिलाकर लिखा जाता है कि सैकड़ों का पेट भर दिया। यही प्रवृत्ति समाज में दिखावे की मानसिकता को जन्म देती है।
सोशल मीडिया से आगे एक और नया ट्रेंड परोपकार में दिखाई पड़ने लगा है जो भी जिस शहर में रहता है वह उसे शहर के चौक चौराहों पर अपने परोपकार के बोर्ड लगवा देता है । ताकि लोगों को पता चल सके कि अमुक व्यक्ति कितना बड़ा परोपकारी है । दरअसल परोपकार भी अब व्यापार बन गया है । यह सब दिखावा इसलिए किया जाता है ताकि लोगों से कहना ना पड़े और लोग अपने आप ही आकर अपनी स्वेच्छा से जेब गर्म कर जाए । अब उसमें कितना पैसा इस्तेमाल होगा और कितना नहीं इसका हिसाब कौन पूछता है । यही परोपकार का कड़वा सच है ।
सच्चा परोपकार वही है, जो बिना शोर-शराबे और प्रचार की चाहत के किया जाए। जो लोग वास्तव में समाज सेवा में लगे हैं, वे कभी सोशल मीडिया पर अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा नहीं पीटते। वे जानते हैं कि दान और सेवा का असली सुख उसी क्षण मिलता है, जब मदद पाने वाले की आँखों में कृतज्ञता झलकती है, न कि स्क्रीन पर आने वाले ‘लाइक’ और ‘शेयर’ की गिनती से।
आज समाज को जरूरत है कि हम परोपकार को ‘प्रचार और व्यापार का साधन’ बनाने के बजाय, उसे ‘जीवन का हिस्सा’ बनाएं। परोपकार दिल से होना चाहिए, कैमरे से नहीं।
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