फिर तेरा क्या होगा ट्रंप , जब मिल बैठेंगे तीन राष्ट्रध्यक्ष !
मोदी-शी-पुतिन मुलाकात : क्या जन्म ले रही है नई वैश्विक शक्ति-संरचना?
रीतेश माहेश्वरी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा केवल एक औपचारिक कूटनीतिक पड़ाव नहीं है, बल्कि इसे बदलते वैश्विक समीकरणों के संकेतक के रूप में देखा जा रहा है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की शिखर बैठक में शामिल होने से पहले मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से अलग-अलग मुलाकातें अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई सवाल खड़े कर रही हैं।
अमेरिका के लिए चुनौतीपूर्ण संकेत
अमेरिकी थिंक-टैंक्स और मीडिया इस संभावित त्रिकोणीय गठजोड़—भारत, चीन और रूस—को लेकर खासा चिंतित दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका पहले से ही चीन के साथ व्यापार युद्ध में उलझा है और रूस के साथ यूक्रेन संघर्ष ने उसकी रणनीतिक मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में भारत, जो अब तक वॉशिंगटन का ‘प्राकृतिक सहयोगी’ माना जाता था, यदि बीजिंग और मॉस्को के साथ तालमेल बढ़ाता है, तो यह अमेरिकी प्रभाव को सीधे चुनौती देगा।
अमेरिका पर 35 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का कर्ज है और चीन ने हाल ही में अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की बिक्री शुरू कर दी है। यह कदम अमेरिका की आर्थिक स्थिरता के लिए खतरे की घंटी है। यदि चीन और भारत मिलकर सप्लाई चेन और उत्पादन का वैकल्पिक तंत्र खड़ा करते हैं, तो अमेरिकी निर्यात और आयात दोनों को झटका लगेगा।
भारत-चीन समीकरण: दुश्मनी से साझेदारी तक?
भारत और चीन के रिश्ते लंबे समय से सीमा विवाद और अविश्वास से घिरे रहे हैं। डोकलाम और गलवान जैसी घटनाओं ने दोनों देशों के बीच गहरी दरार पैदा की थी। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है। चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने हाल ही में लिखा कि मोदी का यह दौरा सीमा विवाद को ‘बातचीत और विश्वास बहाली’ के जरिए कम करने का संकेत है।
यह बदलाव अचानक नहीं है। अमेरिका द्वारा भारत पर लगातार टैरिफ दबाव, पाकिस्तान के साथ जबरन मध्यस्थता की कोशिश और एशियाई राजनीति में भारत की भूमिका को कमतर दिखाने से नई दिल्ली को यह एहसास हुआ कि वॉशिंगटन पर आंख मूंदकर भरोसा करना रणनीतिक भूल होगी।
रूस की भूमिका और भारत का संतुलन
पुतिन इस समीकरण के तीसरे महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं। यूक्रेन युद्ध के चलते रूस वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ा, लेकिन भारत ने पश्चिमी दबाव के बावजूद रूसी कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। इससे मॉस्को और नई दिल्ली के बीच भरोसे की एक नई परत जुड़ी। पुतिन जानते हैं कि भारत एक ऐसा संतुलन साध सकता है जो रूस को पूर्ण अलगाव से बचा सकता है।
वैश्विक राजनीति का नया नक्शा?
अगर SCO सम्मेलन में भारत, चीन और रूस आपसी आर्थिक सहयोग और सुरक्षा साझेदारी की ठोस रूपरेखा पर सहमत होते हैं, तो यह विश्व राजनीति के लिए निर्णायक मोड़ होगा। इसे अमेरिका के नेतृत्व वाली पश्चिमी व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखा जा सकता है।
लेकिन यहां कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी हैं—
भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भरोसे की कमी।
रूस-चीन का पहले से गहरा सामरिक गठजोड़, जिसमें भारत को केवल ‘जूनियर पार्टनर’ की तरह जगह मिलने का जोखिम।
अमेरिका और जापान के साथ भारत की पुरानी साझेदारी, जिसे पूरी तरह छोड़ना संभव नहीं।
यह स्पष्ट है कि मोदी-शी-पुतिन मुलाकातें केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का प्रारूप हैं। अगर यह गठजोड़ वास्तविक व्यापारिक और सामरिक सहयोग में बदलता है, तो वॉशिंगटन की “एकध्रुवीय विश्व” की परिकल्पना इतिहास का हिस्सा बन सकती है।
आख़िरकार यह मुकाबला “लाउड माउथ” (अमेरिकी धमकाने वाली रणनीति) और “साइलेंट प्लानर्स” (भारत-चीन-रूस की शांति-आधारित योजनाओं) के बीच है। सवाल है—नई दिल्ली इस गठजोड़ में ‘निर्णायक शक्ति’ बनेगा या केवल संतुलन साधने वाला खिलाड़ी?
प्रधानमंत्री मोदी चीन पहुंचे, SCO समिट में होंगे शामिल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को दो दिवसीय जापान यात्रा पूरी करने के बाद चीन पहुंच गए, जहां वे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की शिखर बैठक में हिस्सा लेंगे। यह मोदी का सात साल बाद चीन का दौरा है।
31 अगस्त से 1 सितंबर तक होने वाली इस बैठक में 20 से अधिक देशों के नेता शिरकत करेंगे। समिट से इतर प्रधानमंत्री मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय वार्ताएं भी प्रस्तावित हैं। चर्चाओं के दौरान पुतिन के दिसंबर में भारत दौरे की रूपरेखा पर भी विचार होगा।
मोदी का यह दौरा ऐसे समय पर हो रहा है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों से प्रभावित है। ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50% और चीन पर 30% आयात शुल्क लगाया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर गहरा असर पड़ा है।
कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, SCO समिट भारत के लिए केवल बहुपक्षीय मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का अवसर नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की आक्रामक व्यापार नीतियों के बीच नई रणनीतिक साझेदारियों की दिशा तय करने का मौका भी हो सकता है।
राजनाथ सिंह का बयान: “दोस्ती-दुश्मनी नहीं, सिर्फ स्थायी हित होते हैं”
अमेरिकी टैरिफ विवाद के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने साफ कहा है कि अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में न तो स्थायी दोस्त होते हैं और न ही स्थायी दुश्मन, बल्कि केवल स्थायी राष्ट्रीय हित होते हैं।
शनिवार को एक रक्षा सम्मेलन में बोलते हुए राजनाथ ने कहा कि दुनिया में इस समय व्यापार युद्ध जैसे हालात बन रहे हैं। विकसित देश तेजी से संरक्षणवाद की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत किसी देश को दुश्मन नहीं मानता, लेकिन राष्ट्रीय हित और जनता के हितों से समझौता कभी नहीं करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि राजनाथ का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका की टैरिफ नीति ने भारत, रूस और चीन के बीच सामरिक निकटता की संभावनाओं को बढ़ा दिया है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान यात्रा के बाद चीन पहुंच चुके हैं, जहां वे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) समिट में हिस्सा लेने के साथ राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से अलग-अलग मुलाकात करेंगे।
विश्लेषकों के अनुसार, राजनाथ सिंह का यह रुख भारत की कूटनीति को स्पष्ट करता है कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच देश किसी दबाव में झुकेगा नहीं और हर परिस्थिति में अपने हितों को सर्वोपरि रखेगा।
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