विदिशा का ऐतिहासिक राधारानी मंदिर जहां वर्ष में एक बार दर्शन देती हैं राधारानी सरकार
विदिशा एक ऐसी प्राचीन नगरी है जिसका वर्णन अनेक प्राचीन ग्रंथों मे मिलता है। रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न के पुत्र शत्रुघाती की राजधानी रहे इस नगर से गौतम बुद्ध के पुत्र व पुत्री महेन्द्र एवं संघमित्रा का भी संबंध रहा है। सम्राट अशोक की ससुराल के रूप में भी इस नगर की संपूर्ण विश्व में ख्याति रही है। इस नगरी में बहुत कुछ ऐसा है जो इतिहास के पन्नों में दर्ज है। यदि इतिहास के पन्नों को पलटे तो यहाँ कई ऐसी अनोखी और अनसुलझी कहानियाँ मिलती है जो केवल विदिशावासियों को ही नहीं बल्कि संपूर्ण देशवासियों को भावुक कर देती है। ऐसी ही एक मार्मिक दास्तान का साक्षी है विदिशा का राधारानी मंदिर, जिसके पट वर्ष में सिर्फ एक बार खुलते हैं। आज यह मंदिर विदिशा शहर के बीचों बीच है। विदिशा नगर के नंदवाना मोहल्ले में संकरी गलियों के बीच राधारानी सरकार के इस मंदिर के दरवाजे केवल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी यानि राधाअष्टमी के दिन ही खुलते है। इस दिन यहाँ राधारानी सरकार की संपूर्ण वैष्णव विधि विधान के अनुसार सेवा एवं पूजा अर्चना की जाती है। रात्रि में शयन आरती के बाद से भक्त जनों के लिए मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं। फिर अगले वर्ष राधाष्टमी तक केवल पुजारी परिवार ही गुप्त रूप से राधारानी की सेवा करता है और उसके लिए भी मुख्य दरवाजे से नहीं बल्कि बगल में बने दरवाजे से प्रवेश किया जाता है।
राधारानी के विदिशा आने की कहानी भी बड़ी ही मार्मिक है। कहा जाता है कि मुगल शासक औरंगजेब ने 9 अप्रैल 1669 को एक फरमान जारी किया था। बादशाह के इस आदेश पर मथुरा और गोकुल सहित कई स्थानों पर मंदिरों पर आक्रमण करके उन्हें तोड़ा गया। गोकुल में यमुना नदी के किनारे पर स्थित राधा रंगी राय मंदिर पर सात बार हमले किए गए । तब पुजारी परिवार एक टोकरी में राधारानी के विग्रह को लेकर वहाँ से निकल लिए। वे अपने साथ वहाँ से जितनी प्रतिमाएं ला सकते थे उतनी और साथ में ले चले । यह परिवार वर्षों तक राधारानी को साथ लिए यहां वहाँ विचरता रहा। वर्षों तक जंगलों में घूमने के बाद लगभग 20 वर्ष बाद उन्होने विदिशा के किले और लोहांगी की पहाड़ियों के बीच घने जंगल में डेरा डाला। उस समय किले के अंदर बस्ती बसी हुई थी,जहां अनेक मुस्लिम परिवार रहते थे। इस कारण पुजारी परिवार ने यहाँ गुप्त रूप से राधारानी की पूजा अर्चना, सेवा, उपासना करने का निर्णय लिया । बाद में जब धीरे- धीरे स्थितियां सामान्य हुई तब इस मंदिर के पट वर्ष मे एक बार राधाष्टमी के दिन श्रद्धालुओं के लिए खोले जाने लगे। राधारानी के इस प्राचीन मंदिर के कारण ही शहर के इस क्षेत्र को नंदवाना कहा जाता है।
सखियों संग राधारानी
इस मंदिर में राधारानी की अष्टधातु की नौ इंच की प्राचीन प्रतिमा है । यहाँ राधारानी के साथ राधावल्लभ जी एवं सखियां ललिता, विशाखा, चित्रा, चंपक और लता के विग्रह भी विराजमान हैं।
चांदी का झूला
वर्तमान में यहाँ राधारानी जिस चांदी के झूले पर विराजमान है उसका वजन 28 किलो है। कुल 65 किलो चांदी से राधा जी का पालना, झूला और विमान बनाए गए हैं।
राधारानी सरकार की दंडवत
इस मंदिर का इतिहास इसकी कहानी अपने आप सुना रहा है। यहां कभी गुप्त रुप से पूजी जानी वाली राधारानी सरकार के दर्शनों के लिए अब सारे देश से ही नहीं विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं। बचपन में मैंने भी अपने पिताजी (स्वर्गीय श्री दिनेश चंद्र वर्मा) के साथ यहां राधारानी सरकार की दंडवत की है। अब यहां दर्शनार्थियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती सहित अनेक नेता भी इस मंदिर में दर्शन करने आ चुके हैं।
पवन वर्मा-विनायक फीचर्स
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