राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस और 73वाँ संविधान संशोधन : ग्रामीण लोकतंत्र की सुदृढ़ नींव
हमारा देश गांवों का देश है और गाँव स्तर पर भारतीय लोकतंत्र को सशक्त बनाने के उद्देश्य से भारत में प्रतिवर्ष 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है। यह दिन इसलिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि 24 अप्रैल 1993 को भारत में 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम लागू हुआ था, जिसके माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। यहां पाठकों को जानकारी देता चलूं कि यद्यपि यह संशोधन भारतीय संसद द्वारा वर्ष 1992 में पारित किया गया था, परंतु इसे 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी किया गया। यही कारण है कि यह तिथि भारतीय ग्रामीण लोकतंत्र के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
वास्तव में, 73वाँ संविधान संशोधन भारतीय संविधान में किया गया एक ऐतिहासिक, नायाब और दूरदर्शी संशोधन था। कहना ग़लत नहीं होगा कि इस संशोधन ने ग्रामीण स्वशासन की वास्तविक नींव रखी। इस संशोधन के बाद राज्य सरकारों के लिए पंचायती राज व्यवस्था को लागू करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य हो गया। इसके माध्यम से संविधान में भाग-IX जोड़ा गया, जिसमें पंचायतों से संबंधित प्रावधान सम्मिलित किए गए। साथ ही, इसमें 11वीं अनुसूची भी जोड़ी गई, जिसमें पंचायतों को सौंपे जाने वाले 29 विषयों का उल्लेख किया गया।
इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन को मजबूत करना, लोकतंत्र को गाँव-गाँव तक पहुँचाना तथा जनता की सीधी भागीदारी सुनिश्चित करना था। इसके अंतर्गत पूरे देश में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई, जिसमें क्रमशः ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, मध्यवर्ती/ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243-‘ब’ के अनुसार प्रत्येक राज्य में इन तीन स्तरों पर पंचायतों के गठन का प्रावधान किया गया। हालांकि, जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से कम है, वहाँ मध्यवर्ती (ब्लॉक) स्तर पर पंचायत बनाना अनिवार्य नहीं है। पाठक जानते होंगे कि पंचायतों के सदस्यों के चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा किए जाते हैं। ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर के निर्वाचित सदस्यों का चयन सीधे मतदाताओं द्वारा होता है, जबकि मध्यवर्ती एवं जिला स्तर के अध्यक्षों का चुनाव निर्वाचित सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। पंचायत चुनावों के संचालन हेतु प्रत्येक राज्य में राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया।
इतना ही नहीं, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243-‘इ’ के अनुसार प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया है, यदि उसे पूर्व में भंग न किया जाए। इससे पंचायतों को स्थायित्व और निरंतरता प्राप्त हुई।इस संशोधन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक सामाजिक न्याय और समावेशिता है। इसके अंतर्गत अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) तथा महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया। महिलाओं को पंचायतों में प्रतिनिधित्व मिलने से ग्रामीण नेतृत्व में व्यापक परिवर्तन आया और महिला सशक्तीकरण को नई दिशा व उन्नयन मिला। इतना ही नहीं, पंचायतों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए प्रत्येक राज्य में राज्य वित्त आयोग गठित करने का प्रावधान किया गया, जो पंचायतों को वित्तीय संसाधनों के वितरण पर सुझाव देता है।बहुत कम लोग जानते होंगे कि इस संशोधन के तहत अनुच्छेद 243-O भी जोड़ा गया, जिसके अनुसार पंचायत चुनावों से संबंधित परिसीमन या सीटों के आवंटन को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। चुनाव संबंधी विवादों का निपटारा केवल राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित प्राधिकारी द्वारा किया जाएगा। इससे चुनाव प्रक्रिया में अनावश्यक न्यायिक हस्तक्षेप कम हुआ।एक उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि जहाँ विधायक या सांसद बनने के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष निर्धारित है, वहीं अनुच्छेद 243-एफ के अंतर्गत पंचायत चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष रखी गई है। इससे युवाओं को कम आयु में नेतृत्व और जनसेवा का अवसर प्राप्त हुआ।
बहरहाल, यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि यह अधिनियम कुछ विशेष क्षेत्रों में स्वतः लागू नहीं होता है। इनमें नागालैंड, मेघालय, मिजोरम, अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्र, मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्र, तथा पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग जिला (दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल क्षेत्र) शामिल हैं। हालांकि, यह बात अलग है कि भारतीय संसद आवश्यकतानुसार अपवादों और संशोधनों के साथ इन क्षेत्रों में भी इसके प्रावधान लागू कर सकती है।
निष्कर्षतः, यहां यह बात कही जा सकती है कि 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम भारतीय लोकतंत्र(इंडियन डेमोक्रेसी) को जमीनी स्तर तक सुदृढ़ करने वाला ऐतिहासिक कदम सिद्ध हुआ। इसने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देकर ग्रामीण जनता की भागीदारी सुनिश्चित की, सामाजिक समावेशिता को बढ़ावा दिया तथा गाँवों को अपने विकास के निर्णय लेने का अधिकार प्रदान किया। सरल शब्दों में यह बात कही जा सकती है कि 73 वें संविधान संशोधन ने लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत कर ग्रामीण विकास में आम जन की भागीदारी सुनिश्चित की है, जिससे भारत ‘प्रतिनिधिक लोकतंत्र’ से ‘सहभागी लोकतंत्र’ की ओर बढ़ा है। निस्संदेह यह संशोधन ग्राम स्वराज, सशक्त ग्रामीण भारत और सहभागी लोकतंत्र की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
सुनील कुमार महला,
फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़,
उत्तराखंड



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