हनुमान अंश पर विरोध, अश्लीलता पर खामोशी क्यों?
किसी फिल्म, वेब सीरीज या मनोरंजन सामग्री को लेकर समाज में बहस होना कोई नई बात नहीं है। भारत जैसे विविधताओं वाले देश में धर्म, संस्कृति, इतिहास, सामाजिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े विषयों पर अलग-अलग मत होना स्वाभाविक है। लेकिन आज एक बड़ा सवाल हमारे सामने खड़ा है कि हमारी आपत्तियाँ क्या समान कसौटी पर आधारित हैं? हाल के दिनों में ‘हनुमान अंश’ फिल्म को लेकर जिस तरह विरोध देखने को मिला, उसने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। यदि किसी फिल्म में धार्मिक या सांस्कृतिक विषयों को लेकर किसी वर्ग को आपत्ति है, तो उस पर लोकतांत्रिक तरीके से बहस होनी चाहिए। लेकिन क्या यही संवेदनशीलता उन फिल्मों, गानों और डिजिटल सामग्री के प्रति भी दिखाई देती है, जिनमें अश्लीलता, अत्यधिक हिंसा, अपमानजनक भाषा, नशे, अपराध या महिलाओं के प्रति आपत्तिजनक व्यवहार को प्रस्तुत किया जाता है?

कहा जा रहा है कि ‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्में समाज में हिंदुत्व या धार्मिक प्रभाव को बढ़ा सकती हैं। यह किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल की टिप्पणी हो सकती है और इस पर अलग-अलग मत संभव हैं। लेकिन इसी तर्क को व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखें तो प्रश्न उठता है कि यदि किसी फिल्म को देखकर समाज की विचारधारा प्रभावित हो सकती है, तो अश्लीलता, हिंसा, अपराध और गाली-गलौज से भरी सामग्री का समाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता? यदि धार्मिक विषयों वाली फिल्में सामाजिक सोच को प्रभावित कर सकती हैं, तो फिर लगातार दिखाई जाने वाली हिंसक और अश्लील सामग्री बच्चों और युवाओं की भाषा, व्यवहार और सोच को प्रभावित करने की संभावना पर गंभीर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए?
एक समय था जब मनोरंजन के साधन सीमित थे। रविवार या किसी निर्धारित दिन टेलीविजन पर फिल्म आती थी और परिवार के लोग साथ बैठकर उसे देखते थे। आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। OTT प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और मोबाइल फोन ने मनोरंजन को चौबीसों घंटे हमारी जेब में पहुँचा दिया है। अब किसी फिल्म को देखने के लिए सिनेमाघर जाने या टेलीविजन के सामने निश्चित समय पर बैठने की आवश्यकता नहीं है। एक क्लिक पर देश-दुनिया की अनगिनत सामग्री उपलब्ध है। इस सुविधा ने मनोरंजन को आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ समाज और परिवार की जिम्मेदारी भी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
सबसे बड़ी चिंता बच्चों और किशोरों को लेकर है। जिस उम्र में बच्चे भाषा, व्यवहार, रिश्तों, अनुशासन और सामाजिक मर्यादाओं को समझना शुरू करते हैं, उसी उम्र में वे मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया से भी लगातार सीख रहे होते हैं। वे क्या देखते हैं, किस भाषा को सुनते हैं और किन पात्रों को अपना आदर्श मानते हैं, इसका प्रभाव उनके व्यवहार पर पड़ सकता है। यदि मनोरंजन में बार-बार गाली-गलौज को सामान्य बातचीत की तरह दिखाया जाए, हिंसा को मनोरंजन बनाया जाए, महिलाओं को केवल वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाए या अपराध को रोमांच और आकर्षण के साथ दिखाया जाए, तो उसके संभावित प्रभाव पर चर्चा करना स्वाभाविक है।
हालाँकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि किसी अपराध के लिए केवल फिल्म या OTT सामग्री जिम्मेदार है। किसी व्यक्ति के व्यवहार के पीछे परिवार, शिक्षा, सामाजिक वातावरण, आर्थिक परिस्थितियाँ, व्यक्तिगत अनुभव और अनेक दूसरे कारण हो सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि मनोरंजन सामग्री के संभावित प्रभाव को पूरी तरह नकार देना भी उचित नहीं है। जब समाज में बच्चों के व्यवहार, भाषा और डिजिटल आदतों को लेकर चिंता बढ़ रही है, तब फिल्मों और डिजिटल प्लेटफॉर्म की सामाजिक जिम्मेदारी पर खुली और तथ्यपरक बहस होनी चाहिए।
आज फिल्मों और वेब सीरीज में हिंसा का स्तर भी काफी बढ़ा हुआ दिखाई देता है। अपराध-केंद्रित कहानियाँ, हत्या, मारपीट, बदला, अपमानजनक भाषा और अश्लील दृश्य कई बार मनोरंजन का हिस्सा बन जाते हैं। समस्या केवल यह नहीं कि ऐसी सामग्री मौजूद है, बल्कि सवाल यह भी है कि उसे किस उम्र के लोग आसानी से देख सकते हैं। यदि बच्चों के हाथ में मोबाइल है और उनके सामने आयु-सीमा से जुड़ी सामग्री भी आसानी से पहुँच सकती है, तो केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि अभिभावक बच्चों को न देखने दें। डिजिटल युग में प्लेटफॉर्मों, अभिभावकों, शिक्षकों और स्वयं दर्शकों की साझा जिम्मेदारी बनती है।
यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में रचनात्मक अभिव्यक्ति पर विचारों की विविधता स्वाभाविक है। हर ऐसी फिल्म जिसे कोई व्यक्ति पसंद नहीं करता, उसे प्रतिबंधित करने की मांग समाधान नहीं हो सकती। इसी तरह हर आपत्तिजनक सामग्री को यह कहकर नजरअंदाज करना भी उचित नहीं कि यह केवल मनोरंजन है। आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है जिसमें कानून, आयु-आधारित वर्गीकरण, अभिभावकीय नियंत्रण और डिजिटल साक्षरता के माध्यम से दर्शकों को सुरक्षित और जिम्मेदार विकल्प मिल सकें।
सवाल यह भी है कि सामाजिक विरोध की प्राथमिकताएँ क्या होनी चाहिए। यदि धार्मिक भावनाओं से जुड़ी किसी फिल्म पर लोग आवाज उठाते हैं, तो उन्हें ऐसा करने का लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन समाज को यह भी देखना चाहिए कि क्या हम अश्लील गीतों, आपत्तिजनक दृश्यों, अत्यधिक हिंसा और बच्चों तक पहुँच रही अनुचित सामग्री पर भी उतनी ही गंभीरता से बात कर रहे हैं। विरोध का आधार व्यक्ति, दल, धर्म या राजनीतिक सुविधा नहीं, बल्कि समान सामाजिक कसौटी होनी चाहिए।
आज यह भी समझने की आवश्यकता है कि दर्शक केवल निष्क्रिय उपभोक्ता नहीं है। जिस तरह की सामग्री को दर्शक बार-बार देखते हैं, साझा करते हैं और लोकप्रिय बनाते हैं, बाजार उसी दिशा में और सामग्री तैयार करता है। इसलिए समाज की जिम्मेदारी केवल फिल्म निर्माता या सरकार तक सीमित नहीं है। माता-पिता को बच्चों के साथ संवाद करना होगा। बच्चों को यह समझाना होगा कि स्क्रीन पर दिखाई जाने वाली हर चीज वास्तविक जीवन का आदर्श नहीं होती। स्कूलों में डिजिटल और मीडिया साक्षरता पर चर्चा होनी चाहिए और OTT प्लेटफॉर्मों को आयु-आधारित नियंत्रण तथा अभिभावकीय सुविधाओं को प्रभावी बनाना चाहिए।
संस्कृति की रक्षा केवल किसी एक फिल्म का विरोध करने से नहीं होगी। यदि चिंता वास्तव में आने वाली पीढ़ी की सोच, भाषा, व्यवहार और सामाजिक मूल्यों को लेकर है, तो बहस का दायरा भी उतना ही व्यापक होना चाहिए। धार्मिक विषयों वाली फिल्मों पर तथ्य और कानून के आधार पर चर्चा हो, लेकिन उसी गंभीरता से अश्लीलता, हिंसा, नशे, अपराध और गाली-गलौज वाली सामग्री के प्रभाव पर भी प्रश्न उठें। किसी एक प्रकार की सामग्री को निशाना बनाकर दूसरी प्रकार की सामग्री को अनदेखा करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।
आज जब बच्चे से लेकर युवा, महिलाएँ, पुरुष और प्रौढ़ सभी डिजिटल मनोरंजन की दुनिया से जुड़े हैं, तब हमें यह तय करना होगा कि मनोरंजन की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। सवाल सिर्फ ‘हनुमान अंश’ फिल्म का नहीं है। सवाल उस पूरे दृश्य संसार का है, जिसे हमारी अगली पीढ़ी रोज देख रही है, सुन रही है और कहीं न कहीं अपने व्यवहार में उतार भी रही है। इसलिए जरूरत चुनिंदा विरोध की नहीं, बल्कि समान कसौटी, जिम्मेदार मनोरंजन और स्वस्थ डिजिटल संस्कृति पर गंभीर सामाजिक बहस की है। आखिर सवाल यह नहीं कि कौन-सी फिल्म किस विचार को बढ़ावा देती है; सवाल यह है कि हम अपने बच्चों और समाज के सामने कैसी दृश्य संस्कृति छोड़कर जा रहे हैं।
– डॉ. सत्यवान सौरभ




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