खरी-अखरी : कब तक वजीर प्यादे बनते रहेंगे
तमाम जद्दोजहद, उठापटक, शतरंजी चालों, घनौनी शाजिसों के बावजूद थलापति के नाम से मशहूर जोसेफ विजय ने 10 मई 2026 को चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू इंडोर स्टेडियम में आयोजित किए गये शपथ ग्रहण समारोह (जिसे 6 मई को सम्पन्न हो जाना चाहिए था) में पहले गैर द्रविड़ मुख्यमंत्री के तौर पर पद एवं गोपनीयता की शपथ ले ही ली। Date 09.05.2026 – – ORDER – – I, Rajendra Vishwanath Arlekar, Governor of Tamil Nadu, hereby appoint Thrivu C. Josaph Vijay, as the Chief Minister of state of Tamil Nadu, under Article 164 of the Constitution of India. ये वो आदेश है जो चौथी मुलाकात के बाद आखिरकार तमिलनाडु के राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ अर्लेकर को निकालना पड़ा। तो क्या यह माना जाए कि राज्यपाल को मोहरा बनाकर शोरशराबे के साथ बीजेपी के भीतर चाणक्य कहने जाने वाले तथाकथित व्यक्ति द्वारा चलाए जाने वाले आपरेशन को विपक्ष के एक व्यक्ति (जिसे बीजेपी की गुजराती जोड़ी द्वारा प्यादे से भी कम आंकते हुए पप्पू कहा जाता रहा है) द्वारा चले गए साइलेंट आपरेशन ने सिरे से ही ध्वस्त कर दिया है। जबकि इसके पहले 07 मई 2026 को लोकभवन तमिलनाडु की ओर जारी की गई प्रेस रिलीज में लिखा गया था Rajendra Vishwanath Arlekar, Hon’ble Governor of Tamil Nadu, has invited Thiru C. Joseph Vijay, President Tamilaga Vettri Kazhagam, today (7.5.2026) to Lok Bhavan. During the meeting, the Hon’ble Governor explained that the vequiste majority support in the Tamil Nadu Legislative Assembly, essential for forming the Government, has not been established. तमिलनाडु के राज्यपाल अर्लेकर ने विजय को तमिलनाडु का मुख्यमंत्री नियुक्त करने वाले 09 मई 2026 के आदेश में भारतीय संविधान के जिस अनुच्छेद 164 का उल्लेख किया है संविधान का यही आर्टिकल 164 राज्यपालों को कहता है कि आप सदन के भीतर सीएम को बहुमत हासिल करने से रोक नहीं सकते हैं।
सामान्य तौर पर राज्यपाल की भूमिका सबसे बड़ी पार्टी के नेता को सरकार बनाने का न्यौता देने और एक समय सीमा तय कर उसके भीतर सदन में अपना बहुमत साबित करने का निर्देश देने की ही होती है। यानी राज्यों में सरकार बनाने को लेकर राज्यपाल की भूमिका चिट्ठी के आदान-प्रदान तक ही सीमित होती है। 2018 में कर्नाटक में बीजेपी विधायक दल के नेता यदुरप्पा और 2019 में महाराष्ट्र में बीजेपी के विधायक दल के नेता देवेन्द्र फण्वनीस को पर्याप्त संख्या बल नहीं होने के बावजूद शपथ दिलाई गई थी और एक निश्चित तारीख के भीतर सदन में बहुमत सिध्द करने का निर्देश दिया गया था। महाराष्ट्र के भीतर तो इतिहास रचते हुए राज्यपाल ने जब मुंबई के भीतर की आधी से ज्यादा आबादी नींद के आगोश में थी तब देवेन्द्र फण्वनीस को मुख्यमंत्री की शपथ दिलवा दी थी। यह बात अलहदा है कि देवेन्द्र फण्वनीस को 24 घंटे के भीतर ही इस्तीफा देना पड़ा था। महाराष्ट्र के राज्यपाल की भूमिका को तो देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी असंवैधानिक कहकर टिप्पणी की थी लेकिन कोई फर्क़ नहीं पड़ा था। राज्यपाल की अनैतिक भूमिकाओं के नजारे मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, चंडीगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार सहित तमाम राज्यों में देखने को मिला है। जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि राज्यपाल के पास जो प्रोटोकॉल होता है, उनके पास एक संवैधानिक किताब होती है जिसके आसरे वह काम करते हैं इस दौर वह पूरी तरह से गायब सा हो गया है और राज्यपाल इस रास्ते को छोड़ कर दिल्ली की लाल दीवारों के भीतर धड़कती धड़कनों (क्षेत्रीय छत्रपों और उनकी पार्टी को नेस्तनाबूद करना है क्योंकि हर राज्य में छत्रपों की मौजूदगी बीजेपी की आंखों में उस समय खटकने लगती है जब वह उन छत्रपों के कांधे पर बेताल की तरह सवार होकर उस राज्य पर कब्जा कर लेती है) को सुनकर काम कर रहे हैं। मतलब दिल्ली दरबार पर कब्जा कर चुकी पार्टी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि राज्यपाल को राज्य के भीतर एक खलनायक और राजभवन को बीजेपी हेडक्वार्टर नम्बर दो के तौर पर देखा जाने लगा है। या कहें कि दिल्ली दरबार की कुर्सी पर विराजमान दल ने राज्यपालों की हालत एक शतरंजी प्यादे से भी कम बनाकर रख दी है।
जैसे ही 4 मई 2026 को पांच राज्यों की विधानसभा के साथ ही तमिलनाडु विधानसभा का नतीजा सामने आया जिसमें छै दशक से अदल-बदल कर सत्ता पर काबिज रहने वाली पार्टी को दरकिनार कर नवजात राजनीतिक पार्टी TAMILAGA VETTRI KAZHAGAM सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभर कर सामने आई है लेकिन वह सरकार बनाने के जादुई आंकड़े 118 से 10-11 सीट पीछे रह गई वैसे ही तमिलनाडु के राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ अर्लेकर सक्रिय हो जाते हैं। जाहिर है कि दिल्ली भी सक्रिय हो चुकी है और हाॅट लाइन जुड़ चुकी है। छै दशक से सत्ता पर अदल बदल कर काबिज रहने वाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) अपने गठबंधति दलों के साथ दहाई के आंकड़े में ही सिमट कर रह गई हैं और सिल्वर स्क्रीन से राजनीति में नये – नये अवतरित हुए थलापति यानी विजय द्वारा बनाई गई नई नवेली पार्टी ने सैकड़ा भर से ज्यादा सीटें हासिल कर ली है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस पार्टी को 5 सीटें मिली हैं। उसके हाईकमान ने तमिलनाडु में पार्टी की राजनीति को साधने वाले अपने कद्दावर नेताओं से सलाह मशविरा किये बिना विजय को समर्थन का पत्र सौंप दिया। कांग्रेस के पांच विधायकों को मिलाकर विजय के पास 113 सदस्य संख्या हो जाती है तो वह राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करते हैं लेकिन दिल्ली दरबार की कठपुतली की तरह पेश आ रहे अर्लेकर राज्यपाल के पद की गरिमा और दायित्व को ताक पर रख कर विजय से 118 सदस्यों की सूची सौंपने को कहते हैं। जो यह बताती है कि दिल्ली दरबार की राजनीतिक सक्रियता राज्यपाल के जरिए तमिलनाडु के भीतर प्रवेश कर चुकी है।
बीजेपी चाहती थी कि पूरा देश उसके साथ पश्चिम बंगाल में मिली जीत में शरीक होकर उसकी जीत के पैमाने को देखने लगे और चुनाव आयोग पर राजनीतिक तौर पर लग रहे आरोपों की बौछार कम हो जाए। कांग्रेस ने विजय की पार्टी को जो समर्थन दिया है उसमें एक शर्त यह जोड़ी गई है कि वह यानी टीवीके किसी भी हालत में साम्प्रदायिक ताकतों का साथ नहीं लेंगे यानी बीजेपी और उसके सहयोगी दलों (NDA) का साथ नहीं लेंगे क्योंकि हमारा मिशन साम्प्रदायिक ताकतों से लड़ना है। तमिलनाडु के भीतर 1952 से 1967 तक कुमारस्वामी कामराज (के कामराज) की शख्सियत की बदौलत कांग्रेस सत्ता में काबिज रही है। 1967 में कांजीवरम नटराजन अन्नादुराई (सी. एन. अन्नादुराई) ने इरोड वेंकटप्पा रामासी (ई. वी. रामासी) द्वारा 17 सितम्बर 1949 को गठित की गई द्रविड़ कड़गम से वैचारिक मतभेद (खासकर चुनावी राजनीति में भाग लेने के मुद्दे पर) पर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम नामक पार्टी का गठन किया और चुनावी वैतरणी पर सवार हो गई। जनता ने हाथों हाथ लिया और के. कामराज यानी कांग्रेस को खारिज करते हुए डीएमके को सत्ता सौंप दी। सी एन अन्नादुराई के सिध्दांतों (समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की नीतियों) पर मतभेद होने के चलते तमिल फिल्मों के सुपर स्टार और राजनीतिज्ञ मारुदुर गोपालन रामचंद्रन (एमजीआर) ने 17 अक्टूबर 1972 को अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का गठन किया और जनता ने एमजीआर की एआईएडीएमके को चुनावी नैया पार कराते हुए सत्तासीन करा दिया। तब से लेकर 2026 के विधानसभा चुनाव तक तमिलनाडु की राजनीतिक सत्ता इन्हीं दोनों पार्टियों के बीच कबड्डी खेलती रही है। अपनी जिंदगी के साठ बसंत पार कर चुकी पार्टियों को 2026 में जनता ने खारिज करते हुए एक बार फिर सिल्वर स्क्रीन से राजनीति में पदार्पण करने वाले थिरू सी जोसफ विजय को हाथों-हाथ लेकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने लाकर खड़ा कर दिया है। जो कि सत्ता पर काबिज होने के लिए साम-दाम-दंड-भेद के साथ ही हर दूसरी विधा अपनाने वाली बीजेपी यानी मोदी-शाह की बीजेपी के लिए किसी सदमे से कम नहीं है।
शायद इसी सदमे से बाहर निकलने के लिए राज्यपाल अर्लेकर को सक्रिय किया गया कि किसी भी पार्टी की गवर्नमेंट नहीं बनने दी जाए और असंवैधानिक तरीके से ही सही तमिलनाडु को एकबार फिर से चुनाव की भट्टी में झोंक दिया जाए तो हो सकता है इस बार रही सही कसर चुनाव आयोग पूरा कर बीजेपी को सत्ता दिला दे। वैसे मोदी-शाह की नजर 2029 के लोकसभा चुनाव पर लगी हुई है। उनकी पूरी कोशिश होगी कि इस बार 400 पार का नारा दिए बगैर 400 पार कर लिया जाए क्योंकि हम ही खिलाड़ी और एंपायर दोनों हैं इसके बावजूद सबसे बड़ी चुनौती दक्षिण भारत के प्रदेशों की आने वाली 129 लोकसभा सीटें हैं। कांग्रेस और विपक्ष भी 2029 के लोकसभा चुनाव को लेकर ही रणनीति बनाने की कवायद कर रहा है। उसे मालूम है कि बीजेपी उत्तर, पूर्व और पश्चिम भारत में दक्षिण भारत की तुलना में काफी मजबूत स्थिति में है। इसीलिए वह भी आंध्रप्रदेश की 25, तेलंगाना की 17, केरलम् की 20, कर्नाटक की 28 और तमिलनाडु की 39 यानी कुल जमा 129 लोकसभा सीटों को बीजेपी के खाते से एक मुश्त कम करना चाहता है यानी 543 माइनस 129 बीजेपी। मतलब बीजेपी को 400 पार करने के लिए नार्थ, ईस्ट और वेस्ट में 80 फीसदी का दुर्लभतम स्ट्राइक रेट रखना पड़ेगा।
कर्नाटक, केरलम और तेलंगाना में कांग्रेस अपने दम पर काबिज है। तमिलनाडु में भी वह TVK के साथ मिलकर सरकार में आ चुकी है। आंध्रप्रदेश में बीजेपी टीडीपी की रोशनी के सहारे इसलिए टिमटिमा रही है क्योंकि उसे दिल्ली में अपनी सत्ता बनाये और बचाये रखने के लिए चंद्रबाबू नायडू की बैसाखी की जरूरत है। दक्षिण भारत के सभी राज्य जहां पर बीजेपी काबिज नहीं है वहां की इकाॅनामी उत्तर, पश्चिम, पूर्व के उन राज्यों से बहुत आगे है जहां पर बीजेपी काबिज है। चाहे वह डवलपमेंट हो, इंफ्रास्ट्रक्चर हो, विकास दर हो, एग्रीकल्चर हो, हेल्थ सेंटर हो। हकीकत यह है कि अगर दक्षिण भारत माइनस उत्तर भारत कर दिया जाय तो खुद नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय नेता के तौर पर खड़े नहीं हो पा रहे हैं ! यह भी एक अंतर्द्वंद्व है बीजेपी के भीतर जिसे राज्य दर राज्य राज्यपाल संभाले हुए हैं। मौजूदा वक्त में सबसे बड़ा एंपायर प्लेयर भी है या कहें प्लेयर खुद एंपायरिंग कर रहा है। अपने तरीके से नियम कायदे बना रहा है।
पहली बार 2014 के बाद से देश में चुनावी लोकतंत्र गायब हो गया है। परीक्षा संविधान और संविधान बनाने वालों की है जिन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कभी देश एक ऐसे मुहाने पर आकर खड़ा हो जाएगा जहां मुद्दा खुद संविधान होगा ? मुद्दा देश का लोकतंत्र होगा ? मुद्दा देश का चुनाव होगा ? लेकिन देश इस मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 में बीजेपी यानी मोदी-शाह की जोड़ी ने पूरे सिस्टम को चुनावी सिस्टम से जोड़ कर अपने अनुकूल कर लिया है। देश के भीतर तकरीबन 275 सीटें एनडीए के साथ नहीं है यानी विपक्ष से जुड़ी हुई है। इसीलिए इन सीटों को थामने वालों पर ईडी, सीबीआई, आईटी के हमले हो रहे हैं। मीडिया सत्ता के सामने श्वान की माफिक दुम हिला रहा है। अदालतों ने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है। अदालतों के फैसले या तो सत्तानुकूल होते हैं या फिर सरकार के खिलाफ गये तो नख दंत विहीन यानी भोथरे होते हैं। राजनीति प्रतिस्पर्धा का खेल है जिसे सामने खड़ी सत्ता के साथ खेलना पड़ता है। इस सवाल और इस विश्वास के साथ कि लोकतंत्र एक अबूझ पहेली है जिसे हल करने के लिए देश की जनता जागेगी। लोकतंत्र छीना जा रहा है और ना तो जनता को इसका अह्सास हो रहा है ना ही नेताओं को। लोकतंत्र का ताना-बाना सत्ता अपनी सुविधानुसार गढ़ती चली जा रही है। लोकतंत्र को छीनने के लिए नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं जिसे कुछ दिनों बाद हकीकत में तब्दील कर दिया जाता है।
सूप हंसे तो हंसे चलनी क्यों हंसे जिसमें बहत्तर छेद
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को तमिलनाडु में जोसेफ विजय का मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना इतना ज्यादा चुभ गया कि दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक के बेंगलुरु में अपनी जन्मजात दुश्मन पार्टी कांग्रेस को कोसने से बाज नहीं आये क्योंकि विजय का मुख्यमंत्री बनना के समर्थन से मुमकिन हुआ है। पीएम मोदी ने कांग्रेस को पीठ पीछे वार (BACKSTABBING) करने वाला बताया और गोदी मीडिया उस पर उड़ान भरने लगा। मोदी अपने गिरेबां में झांकना भूल गए कि उन्होंने भी सत्ता की मलाई खाने के लिए पीडीपी, टीडीपी, एनसीपी (अजीत पवार गुट), शिवसेना (शिंदे गुट), जेजेपी (दुष्यंत चौटाला), जेडीयू (नितीश कुमार) पार्टियों के साथ गठबंधन किया था और बड़ी चतुराई का काम कहते रहे हैं तथा पालतू मीडिया उसे कमाल (MASTERSTROKE) बताने के लिए नंगा नाच नाचता रहा है। जबकि राजनीति में हर पार्टी अवसरवादी होती है। ना कोई सिध्दांत ना कोई विचारधारा सिर्फ और सिर्फ सत्ता इसके अलावा कुछ नहीं।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार


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