निगम के डेढ़ अरब रुपए की डकैती का मामला : अगर थानेदार के घर में ही हो जाए चोरी तो कसूरवार कौन?
पिछले एक पखवाड़े से पंचकूला नगर निगम में लगभग डेढ़ अरब रुपए के फिक्स्ड डिपॉजिट से जुड़े कथित घोटाले ने पूरे प्रदेश में हलचल मचा दी है। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि निगम द्वारा वास्तविक फिक्स्ड डिपॉजिट कराए जाने के बावजूद रिकॉर्ड में कथित रूप से नकली दस्तावेज सामने आए। यह घटना प्रशासनिक व्यवस्था और वित्तीय निगरानी पर कई बड़े सवाल खड़े करती है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सोमवार 30 मार्च को कोटक महिंद्रा बैंक द्वारा पंचकूला नगर निगम को 127 करोड़ रुपए वापस कर दिए गए हैं। हालांकि, रकम की वापसी के बावजूद यह सवाल अब भी कायम है कि आखिर इतनी बड़ी चूक कहां और कैसे हुई। जिम्मेदारी तय होना अभी बाकी है और जांच की दिशा को लेकर भी स्पष्टता नहीं है।
इतिहास के आईने में मामला
यदि इस पूरे घटनाक्रम को पीछे मुड़कर देखा जाए तो यह मामला पिछले कुछ वर्षों के राजनीतिक और प्रशासनिक परिदृश्य से जुड़ा नजर आता है। पंचकूला विधानसभा सीट पर ज्ञानचंद गुप्ता का वर्चस्व लगभग एक दशक तक बना रहा। उनका पहला कार्यकाल 2014 से 2019 तक और दूसरा कार्यकाल 2019 से 2024 तक रहा। अपने दूसरे कार्यकाल में ज्ञानचंद गुप्ता पंचकूला से विधायक चुने गए थे और हरियाणा के विधानसभा स्पीकर भी रहे । तब उनको सत्ता में ताकतवर मंत्री के तौर पर देखा जाता था एक समय तो ज्ञानचंद गुप्ता मुख्यमंत्री बनने का भी सपना देख रहे थे । यह अलग बात है कि यह सपना पूरा नहीं हो पाया ।
बताया जा रहा है कि यह कथित घोटाला मुख्यतः उनके दूसरे कार्यकाल (2019–2024) के दौरान हुआ है , जिसने पूरे घटनाक्रम को और भी संवेदनशील बना दिया है।
“थानेदार के घर में चोरी” जैसे हालात?
2019 से 2024 के दौरान ज्ञानचंद गुप्ता न केवल पंचकूला से विधायक थे, बल्कि हरियाणा विधानसभा के स्पीकर पद पर भी आसीन होकर पंचकूला की जनता की नजरों में एक ताकतवर मंत्री के तौर पर उभर रहे थे । वहीं 4 जनवरी 2021 को कुलभूषण गोयल ने नगर निगम के मेयर के रूप में शपथ ली थी। कुलभूषण गोयल को जनता ने चुनकर भेजा था ।
स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह चर्चा रही कि नगर निगम के अधिकांश फैसलों पर प्रभाव ज्ञानचंद गुप्ता का ही रहता था। यहां तक कि छोटे-छोटे उद्घाटन कार्यक्रमों में भी उनका नाम प्रमुखता से जुड़ा रहता था। यह भी कहा जाता रहा कि प्रशासनिक निर्णयों, यहां तक कि ट्रांसफर जैसे मामलों में भी उनकी भूमिका अहम रहती थी। और यही वजह थी कि पंचकूला की जनता कुलभूषण गोयल को डमी मेयर मानती थी । क्योंकि वह बिना ज्ञानचंद गुप्ता की मर्जी के कोई फैसला ले ही नहीं सकते थे ।
यही नहीं ज्ञानचंद गुप्ता हर महीने विधानसभा में अधिकारियों को बुलाकर अपना दरबार सजाते थे और वहीं से ज्यादातर आर्डर जारी कर दिए जाते थे । नगर निगम का कोई भी ठेका किसको दिया जाएगा और किसका टेंडर रिजेक्ट कर दिया जाएगा यह सब कुछ विधानसभा से ही फाइनल होगा ऐसा कहा जाता था ।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब पूरे सिस्टम पर एक मजबूत नियंत्रण की बात कही जाती रही, तो फिर इतनी बड़ी वित्तीय अनियमितता कैसे हो गई? क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही थी, या फिर किसी बड़े स्तर की साजिश?
इसको अगर बिल्कुल मुहावरे की भाषा में अगर कहा जाए तो यह बिल्कुल उसी तरीके से थे की थानेदार के घर में चोरी हो गई और थानेदार को पता भी नहीं चला ।
जानकारी थी या नहीं?
इस पूरे प्रकरण में यह स्पष्ट रूप से कहना मुश्किल है कि पिछले दरवाजे से हुई इस कथित डकैती मामले में गुप्ता को जानकारी थी अथवा नहीं थी लेकिन स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, जिस नगर निगम में बिना अनुमति के “परिंदा भी पर नहीं मार सकता”, वहां इतने बड़े स्तर का घोटाला होना कई सवाल खड़े करता है।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या इस पूरे मामले की भनक समय रहते जिम्मेदार लोगों तक नहीं पहुंची, या फिर किसी स्तर पर इसे नजरअंदाज किया गया।
घोटाला उजागर, लेकिन चुप्पी बरकरार
इस मामले की परतें 23 मार्च के आसपास मीडिया में खुलनी शुरू हुईं, जबकि सूत्रों के अनुसार निगम के कुछ अधिकारियों को इसकी जानकारी इससे करीब पांच दिन पहले ही मिल चुकी थी। उस समय से ही विभाग में हड़कंप की स्थिति बनी हुई थी।
करीब 12 दिन बीत जाने के बाद भी इस मामले में कई अहम पक्षों की ओर से स्पष्ट बयान सामने नहीं आए हैं। विशेष रूप से ज्ञानचंद गुप्ता की चुप्पी चर्चा का विषय बनी हुई है। ना तो ज्ञानचंद गुप्ता ने जब यह डकैती वाला मामला सामने आया था तब कोई बयान दिया और ना ही जब बैंक ने पैसे वापस कर दिए हैं तब किसी प्रकार का कोई बयान जारी किया ।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, पिछले विधानसभा चुनाव के समय से ही ज्ञानचंद गुप्ता और मेयर कुलभूषण गोयल के बीच मतभेद की स्थिति रही है। ऐसे में यह स्वाभाविक माना जाता है कि किसी भी विवादित मामले में राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हो जाती है।
आम तौर पर राजनीति में देखा जाता है कि यदि विरोधी पक्ष किसी विवाद में घिरता है तो दूसरा पक्ष खुलकर या परोक्ष रूप से प्रतिक्रिया देता है। लेकिन इस मामले में अपेक्षित राजनीतिक बयानबाजी का अभाव भी कई तरह की अटकलों को जन्म दे रहा है।
जवाब अब भी बाकी
हालांकि निगम को बड़ी रकम वापस मिल चुकी है, लेकिन इससे मामले की गंभीरता कम नहीं होती। सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है कि आखिर इतनी बड़ी वित्तीय गड़बड़ी कैसे हुई और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।
जांच के नतीजे और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई ही इस पूरे प्रकरण की सच्चाई को सामने ला पाएगी। फिलहाल, “थानेदार के घर में चोरी और थानेदार को पता नहीं ” जैसी स्थिति ने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।


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