सुभाष चंद्रा-अंबानी की जंग में असली धमाका! करोड़ों से बड़ा निकला ‘ऊपर से आदेश’ वाला खेल
अगर खबर भी ‘ऊपर’ से तय होगी तो संपादक आखिर करेगा क्या—हेडलाइन लिखेगा या सिर्फ हुक्म बजाएगा?
सुभाष चंद्रा और मुकेश अंबानी के बीच चल रही लड़ाई में अब तक चर्चा कर्ज, पैसों और आरोपों की होती रही है। लेकिन इस पूरे विवाद में एक बात ऐसी सामने आई, जिसने पत्रकारिता के न्यूज़रूम की खिड़की खोलकर अंदर का नजारा दिखाने का दावा किया है—‘ऊपर से आदेश आया था।’
सुभाष चंद्रा के मुताबिक, जब उन्होंने अपने खिलाफ चल रही खबरों को लेकर न्यूज18 के संपादक से सवाल किया तो जवाब मिला कि खबरें उनकी मर्जी से नहीं, बल्कि ‘ऊपर’ के निर्देश पर चल रही हैं।
अब जरा सोचिए, अगर यह बात सच है तो मामला सिर्फ सुभाष चंद्रा का नहीं रह जाता। सवाल सीधा पत्रकारिता के दरवाजे पर दस्तक देता है—संपादक है कहां?
न्यूज़रूम में कुर्सी तो जरूर होगी। कंप्यूटर भी होगा। कॉफी का कप भी होगा। लेकिन अगर खबर क्या चलानी है, किसे कितना दिखाना है और किसे कितना दबाना है, सब कुछ ‘ऊपर’ से तय होना है, तो फिर संपादक और कंप्यूटर में अंतर ही क्या बचा?
कंप्यूटर भी तो आदेश मानता है।
‘यह खबर चलाओ।’
चला दी।
‘यह खबर हटाओ।’
हटा दी।
‘इसका शीर्षक बड़ा करो।’
कर दिया।
‘इसे छोटा कर दो।’
छोटा कर दिया।
फर्क सिर्फ इतना है कि कंप्यूटर को वेतन नहीं देना पड़ता!
यही वजह है कि संपादक का पद कभी सिर्फ नौकरी नहीं माना जाता था। संपादक वह होता था जो मालिक से असहमति जता सके, सरकार से सवाल पूछ सके और जरूरत पड़े तो अपने ही संस्थान को बता सके कि यह खबर तथ्य के बिना नहीं चलेगी।
लेकिन आज पत्रकारिता के सामने एक नई मुश्किल है। खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि खबर किसके पक्ष में है।
दर्शक भी पूछता है—“किस चैनल ने बताया?”
फिर—“कौन सा एंकर बता रहा है?”
और आखिर में—“मेरी सोच के मुताबिक बता रहा है या नहीं?”
खबर सही है या गलत, यह सवाल कई बार बाद में आता है।
यानी पत्रकारिता धीरे-धीरे खबर से निकलकर नैरेटिव की दुकान में पहुंच गई है। यहां ग्राहक वही खबर खरीदना चाहता है जो उसकी जेब में पहले से मौजूद विचारों के आकार की हो।
ऐसे माहौल में संपादक की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि पत्रकारिता का काम दर्शक को वही बताना नहीं है जो वह सुनना चाहता है। पत्रकारिता का काम कई बार वह बताना भी है जो सुनकर दर्शक नाराज हो जाए।
सुभाष चंद्रा के बयान में कितनी सच्चाई है, यह संबंधित पक्ष ही स्पष्ट कर सकते हैं। लेकिन अगर वास्तव में किसी संपादक ने कहा कि खबरें ‘ऊपर’ से तय होती हैं, तो इस एक वाक्य पर पत्रकारिता को गंभीरता से सोचना चाहिए।
क्योंकि मालिक का अपना कारोबार होता है, सरकार की अपनी राजनीति होती है, नेता की अपनी मजबूरी होती है और चैनल की अपनी टीआरपी।
लेकिन संपादक की मजबूरी क्या होनी चाहिए?
सिर्फ तथ्य।
सिर्फ खबर।
और जनता के प्रति जवाबदेही।
अगर संपादक हर फैसले के लिए ‘ऊपर’ देखेगा, तो फिर पत्रकारिता की रीढ़ नीचे ही रह जाएगी।
और सबसे मजेदार बात देखिए—हम रोज टीवी खोलकर कहते हैं, “हमें सच्ची खबर चाहिए।”
शायद टीवी के उस पार बैठे किसी संपादक की भी यही इच्छा हो।
बस फर्क इतना है कि रिमोट हमारे हाथ में है और आदेश शायद किसी और के।
यही आज की पत्रकारिता का सबसे बड़ा व्यंग्य है—
स्क्रीन पर खबर आजाद दिखती है, लेकिन खबर का रास्ता कितना आजाद है, यह सवाल अब भी बाकी है।
केशव भुराड़िया



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