खरी-अखरी : जैसे कारनामे भारत में हो रहे हैं वैसे कारनामे दुनिया का कोई भी देश कर सकता है क्या ?
दो दिन पहले दो खबरें एक साथ निकलकर आती है। एक पिद्दी से देश ताइवान ने डायनासोर जैसे विशालकाय देश को ग्लोबल मार्केट कैप में पीछे धकेल दिया है और बलात्कार तथा हत्या में सजायाफ्ता राम रहीम 16वीं बार जेल से बाहर आया है। उसके दो दिन बाद खबर आई कि सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जयमाला बागची की बेंच ने एसआईआर वाले मामले में फैसला चुनाव आयोग के पक्ष में दे दिया है। पहले वाली दोनों खबरों से किसी को कोई भी फर्क नहीं पड़ा लेकिन दूसरी वाली तीसरी खबर से राजनीतिक और गैर राजनीतिक तौर पर मिली जुली प्रतिक्रिया सामने आई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जहां चुनाव आयोग और सत्ताधारी बीजेपी को आक्सीजन मिली वहीं विपक्षी पार्टियों, लीगल कम्युनिटी से लेकर प्रबुद्घ वर्ग तक के माथे पर चिंता की लकीरें दिखाई देने लगी। कोई इस फैसले को न्यायिक इतिहास पर काला धब्बा बताने लगा तो कोई सुप्रीम कोर्ट के इतिहास का काला अध्याय।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने अब बंदर के हाथ में पकड़े गए उस्तरे को ना केवल जायज ठहरा दिया है बल्कि उस्तरे की जगह तलवार थमा दी है। अब वह बेरहमी व मनमाने तरीके से किसी भी मतदाता का नाम मतदाता सूची से काट सकता है और वह व्यक्ति दर दर की ठोकरें खाता फिरेगा। सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि कल जो मतदाता अपने वोट से सरकार बदल दिया करते थे अब सरकार अपनी मर्जी से मतदाता चुनकर स्थाई रूप से चलती रहेगी। ऐसा भी नहीं है कि चुनाव आयोग मतदाता सूची में केवल सत्ता प्रेमी मतदाताओं के नाम ही शामिल करेगा, मतदाता सूची में सरकार के खिलाफ भी वोट देने वाले मतदाताओं के नाम भी शामिल करेगा लेकिन वो इतने ही होंगे जिससे निष्पक्षता से चुनाव होने का अह्सास तो हो लेकिन सत्ताधारी की सत्ता पर कोई आंच ना आये। यानी जो चुनाव परिणाम आयेगा वो जनमत का अह्सास तो करायेगा लेकिन जनमत होगा नहीं। वह तो मैन्युफैक्चरर्ड जनादेश होगा, मैन्युफैक्चरर्ड मैंडेट होगा।
समाज का एक बड़ा तबका कह रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से राइट टू लिबर्टी, राइट टू लाइफ, राइट टू जस्टिस, राइट टू लाइवली हुड, फेंडामेंटल्स राइट पर कुठाराघात किया गया है यानी ऐसा लग रहा है कि देश एक तरीके से अघोषित आपातकाल के दौर से गुजर रहा है और सुप्रीम कोर्ट ने उस पर वैधानिकता की मोहर लगा दी है। चुनाव आयोग सहित देश के सारे संवैधानिक संस्थान तो पहले से ही सरकार की चौखट पर माथा टेक रहे हैं रही सही कसर सुप्रीम कोर्ट ने भी पूरी कर दी है। यानी अब ऐसा एक भी संवैधानिक संस्थान नहीं बचा जो वर्तमान सत्ता का दरबारी ना हो। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि लोकतंत्र के चारों स्तम्भों में से तीन स्तम्भ कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया ने खुद को चौथे स्तंम्भ विधायिका में समाहित कर लिया है।
दूसरे नजरिये से देखा जाए तो एक तरह से तो देश की जनता और विपक्षी दलों को सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जयमाला बागची का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि उन्होंने इस तरह का फैसला देकर उन्हें मुंगेरीलाल के हसीन सपनों की मृगमरीचिका से बाहर निकाल लिया है। वैसे फैसला ऐसा ही आयेगा जैसा आया है इसके संकेत सुनवाई के दौरान बीच-बीच में दिए जाते रहे हैं। हां न्याय प्राप्ति के अति आत्मविश्वास का भ्रम पाले देशवासी इसे नहीं समझ सके तो इसमें माई लाॅर्ड का क्या दोष.? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि हमसे सत्ताधारी के खिलाफ किसी भी फैसले की उम्मीद ना की जाए। हमारा हर बड़ा फैसला सत्ताधारी दल की विचारधारा को पुष्ट करता हुआ ही दिखाई देगा। वैसे भी अब तो केवल फैसले हो रहे हैं न्याय तो बिलकुल भी नहीं हो रहे हैं। माई लाॅर्ड तो फिर माई लाॅर्ड ही हैं संवैधानिक अधिकारों से लैस, विशेषाधिकार प्राप्त अगर किसी ने तिया पांचा किया तो फिर स्वसंज्ञान लेकर न्यायपालिका की अवमानना की तलवार तो चलाई ही जा सकती है।
सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत की बेंच ने एसआईआर पर फैसला देकर सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व जस्टिसों की यादों को जीवंत कर दिया। खासकर जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड को। जिनके शायद एक भी फैसले ऐसे नहीं थे जिनसे सत्ताधारी पार्टी कभी भी भंवर जाल में फंस कर डूबी हो। जस्टिस रंजन गोगोई तो ऐसा कीर्तिमान स्थापित करके गये जैसा सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में शायद ही किसी ने किया हो। जस्टिस रंजन गोगोई पर एक युवती ने यौन शोषण का आरोप लगाया। उस आरोप की सुनवाई करने वाली बेंच में खुद जस्टिस रंजन गोगोई शामिल हुए और खुद के पक्ष में फैसला सुना दिया। जस्टिस चंद्रचूड ने चंडीगढ़ में सत्तापक्ष के फेवर में की जा रही लाइव बेईमानी पकड़ी। बड़ी तीखी टिप्पणी की गई । लगा अधिकारी पक्का जेल जाएगा लेकिन नतीजा क्या रहा – टांय-टांय फिस्स। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रोजेक्ट किए गए चुनावी चंदे का मामला भी ढाक के तीन पात ही रहा। जस्टिस चंद्रचूड ने चुनावी चंदे को असंवैधानिक करार तो दे दिया लेकिन असंवैधानिक तरीके से इकट्ठा किये गये पैसे जो ब्लैकमनी में तब्दील हो चुकी थी उसे जप्त कर सरकारी खजाने में जमा करने का आदेश नहीं दिया। उसे राजनीतिक दलों के पास ही रहने दिया गया राजनीति चमकाने के लिए। जस्टिस चंद्रचूड की वह तस्वीर तो ऐतिहासिक तस्वीर में तब्दील हो चुकी है जिसमें वे अपने घर पर बिन बुलाए मेहमान की तरह आए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ भगवान गणेश की आरती करते रहे। सवाल तो आज भी बरकरार है – आखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है?
अमेरिका, चीन, जापान, हांगकांग और भारत दुनिया के पांच सबसे बड़े बाजार माने जाते हैं लेकिन अब भारत को हटाकर ताइवान ने पांचवी जगह हासिल कर ली है और भारत छठवीं पायदान पर आ गया है। ठीक उसी प्रकार जैसे वह विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के मामले में पांचवें से छठवें नंबर पर आ चुका है। यानी भारत ना तो दुनिया के टाप पांच मार्केट में है ना ही एशिया के तीन टाप मार्केट में है। ताइवान ने यह करिश्मा अपनी एक कंपनी की बदौलत कर दिखाया है। जो है ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (TSMC) ।यह दुनिया में सेमीकंडक्टर बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी है। इसके शेयर 49 परसेंट ऊपर चढ़े हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले 3-4 साल से सेमीकंडक्टर मिशन का झुनझुना बजा रहे हैं लेकिन भारत की एक भी कंपनी टीएसएमसी के सामने खड़ा होने की हैसियत में नहीं है। भारत में तो प्रधानमंत्री मोदी अपनी नाकामियों को ढ़कने के लिए आये दिन 2047 तक देशवासियों को विकसित भारत का सपना बेचते रहते हैं।
दक्षिण कोरिया की कंपनी है SAMSUNG जिसका मार्केट कैप भारत की रिलायंस, एचडीएफसी बैंक, एयरटेल, एसबीआई बैंक जैसी 10 बड़ी कंपनियों (मिलाकर) के मार्केट कैप से भी ज्यादा है। एशिया के भीतर ताइवान की TSMC के बाद दक्षिण कोरिया की SAMSUNG ही दूसरी कंपनी है जिसका मार्केट कैप ट्रिलियन डॉलर में है। SAMSUNG ELECTRONICS का ही एक डिवीजन है सेमीकंडक्टर डिवीजन। खबर है कि इस डिवीजन के 78000 कर्मचारियों को इस साल 26.6 बिलियन डॉलर बोनस दिया जा रहा है। भारतीय करेंसी में देखा जाए तो हर कर्मचारी को लगभग 3.25 करोड़ रुपये बोनस मिलेगा, और यह संभव हुआ है दक्षिण कोरियाई वर्कर्स यूनियन और SAMSUNG ELECTRONICS के सेमीकंडक्टर डिवीजन के बीच हुई बातचीत की वजह से। और भारत का गोदी मीडिया देशवासियों को पेट्रोल, डीजल, गैस के दाम बढ़ने के फायदे बता रहा है। ताइवान, दक्षिण कोरिया ऐसी कंपनियों को बढ़ावा दे रहे हैं जो वैश्विक बाजार पर छा रही हैं और भारत के उद्योगपति सरकार को अपनी जेब में रखकर जैसा चाहते हैं वैसा नचा रहे हैं। वे नई कंपनी बनाने के बजाय दूसरों की कंपनी को सरकार की मदद से सारे हथकंडे अपना कर हड़प रहे हैं।
सदियों पुरानी को हकीकत का जामा पहनाकर एकबार फिर एक बच्चे ने सच बोल दिया राजा नंगा है
भारत में केवल मेडिकल की प्रवेश परीक्षा का ही पेपर लीक नहीं होता यहां तो केन्द्र सरकार द्वारा कराई जाने वाली एसएससी जीडी की परीक्षा के पेपर भी लीक हो जाते हैं। रांची पुलिस ने 9 मई 2026 को एसएससी जीडी की परीक्षा में चीटिंग करते हुए 6 अभ्यर्थियों को गिरफ्तार कर पूंछतांछ की तो पता चला कि बिहार के साल्वर गैंग ने परीक्षा पास कराने के लिए 78 लाख की डील की है। परीक्षा पास करवाने में जोखिम भी कोई ज्यादा नहीं था। अभ्यर्थियों को केवल परीक्षा में बैठना भर था मास्टर माइंड कम्प्यूटर अपने आप सारा पेपर साल्व कर देगा। यूपी में स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने हाई टेक नकल का पर्दाफाश किया है। STF ने नोयडा से 50 लाख कैश के साथ 7 आरोपियों को हिरासत में लिया है। जिनके पास से लैपटॉप, मोबाईल फोन, CG एग्जाम से जुड़े डाक्यूमेंट जप्त किए गए हैं। STF के अनुसार पेपर लीक के इन नए वैज्ञानिकों में प्रदीप चौहान, अरुण कुमार, संदीप भाटी, निशांत राघव, अमित राणा, विवेक कुमार और शाकिर मलिक शामिल हैं। ये वैज्ञानिक इसलिए हैं क्योंकि इन्होंने स्क्रीन शेयरिंग की टेक्नोलॉजी ईजाद कर भारत में होने वाली परीक्षाओं में फेल होने की समस्या को दूर करने का प्रयास किया है। ये लोग पेपर लीक या सिस्टम हैक नहीं करते ये तो डायरेक्ट स्क्रीन शेयरिंग के रास्ते नकल करा देते हैं।
उत्तर प्रदेश में कानपुर के एक परीक्षा सेंटर में 399 की बैठक व्यवस्था होने के बाद भी 819 को एडमिट कार्ड जारी कर दिया गया। ऐसा ही कारनामा लखनऊ, प्रयागराज, गोरखपुर और बिहार के मुजफ्फरपुर के परीक्षा सेंटर्स में भी किया गया। 21 मई को नोएडा में डाॅ एपीजे अब्दुल कलाम युनिवर्सिटी के एक सेंटर में बी टेक कम्प्यूटर साइंस के छठे सेमेस्टर की परीक्षा में नकल की पर्चियां पाई गई उसमें वही उत्तर लिखे थे जो सवाल प्रश्न पत्र में पूछे गए थे। पिछले साल माता वैष्णो देवी मेडिकल कालेज एडमीशन इस लिए कैंसिल कर दिया गया था क्योंकि अधिकाधिक मुस्लिम छात्रों ने क्वालीफाई कर लिया था। बेगूसराय से एक पिता अपनी बेटी को पालिटेक्निक की परीक्षा दिलाने पटना की एक होटल में आकर ठहरता है और आधी रात होटल का स्टाफ नशे की हालत में कमरे में घुसकर उस बेटी को जबरन उठाकर बाहर ले जाने की कोशिश करते हैं। होटल का सीसीटीवी कैमरा बंद पाया जाता है। मुजफ्फरनगर में अनस अहमद नाम के एक यूबर को मात्र इसलिए गिरफ्तार कर लिया जाता है उसके ब्लाग में एक मंदिर का शाॅट दिख जाता है। राजस्थान के भीलवाड़ा में लोकेश खटीक और हेमंत कोहली को इसलिए गिरफ्तार कर लिया जाता है कि माल सप्लाई के दौरान उनके थैले से कुछ मांस के टुकड़े एक मंदिर के सामने गिर जाते हैं। भारत के भीतर इतना आसान हो गया है किसी भी मंदिर, मस्जिद के सामने कुछ भी फेंककर तनाव फैला देना। वेदांत नाम के छात्र ने सीबीएससी को कटघरे में क्या खड़ा किया सरकार के चरण चुंबनों ने उसी को पाकिस्तानी बता दिया।
शायद ही दुनिया में ऐसा कोई देश होगा जिसका पूरा का पूरा सिस्टम हर जगह से सड़ांध मार रहा हो। भारत की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था मजाक बन कर रह गई है। एक ओर सुप्रीम कोर्ट उमर, शरजील को जमानत देने में बहुत बड़े संवैधानिक संकट का सामना करता है तो दूसरी ओर जब हत्या और बलात्कार का सजायाफ्ता आये दिन पैरोल पर जेल से बाहर आता है तो वह गिल्ट फ्री और लाइटर महसूस करता है। न्याय व्यवस्था को अपनी साख पर जरा सा भी शर्मिंदगी महसूस नहीं होती है। 2002 में पूरा सच नामक अखबार निकालने वाले रामचंद्र छत्रपति को उनके घर के सामने गोली मार कर हत्या कर दी जाती है। निचली अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा सुनाए गए अपराधी राम रहीम को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट बरी कर देता है। बलात्कार के केस में चल रही आजीवन कारावास की सजा के चलते हुए चंद दिन पहले रिकार्ड 16वीं बार सुनारिया जेल रोहतक से बाहर भेजा गया है और वह 10 लग्ज़री कारों के काफिले के साथ हूटर बजाते हुए अपने आशियाने डेरा सच्चा सौदा सिरसा में दाखिल हुआ। डेरा सच्चा सौदा में लोगों को जमा होने की अनुमति नहीं है लेकिन राम रहीम को आनलाईन संबोधन करने की अनुमति है। 2017 में जब उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई तब से मई 2026 के बीच वह 447 दिन पैरोल और फरलो के जरिए जेल से बाहर रह चुका है। 2020 में 1 दिन, 2021 में 1 दिन, 2022 में 91 दिन (फरवरी-21,जून-30,अक्टूबर-50) , 2023 में 91 दिन (जनवरी-40,जुलाई-30,नवम्बर-21) , 2024 में 102 दिन (जनवरी-60,अगस्त-21,सितम्बर-21) , 2025 में 91 दिन (जनवरी-30,अप्रैल-21,अगस्त-40) और 2026 (मई तक) में 70 दिन (जनवरी-40,मई-30) ।
एक तरफ भारत का मीडिया राम रहीम जैसे हत्यारे, बलात्कारियों के बाहर आने पर उसका यशोगान करते हुए दिखाई देते हैं तो दूसरी तरफ युवाओं के सपने सड़कों पर बिखरे नजर आते हैं जिनका कोई माई बाप नहीं है। भला हो होम डिलीवरी के सस्ते काम का जो भारत की जवानी को बचाए हुए है। जबसे देश की सबसे बड़ी अदालत के मुखिया ने युवाओं की तुलना काॅकरोच से की है तो उन्हें भी समझ में आने लगा है कि अब उनके पास काॅकरोच बनने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं है। वैसे राम रहीम और उस जैसे तमाम लोग जानते हैं कि सभी युवा काॅकरोच नहीं बने हैं ना ही बनेंगे। उनमें से एक तबका उन जैसों का शिष्य बन चुका है और आगे भी बनता रहेगा। वह यह भी जानता है कि काॅकरोच बनने वाले युवाओं से ज्यादा संख्या तो उसके चेलों की है तभी ना राम रहीम का काफिला किसी बादशाह के माफिक जेल (रोहतक) से निकल कर डेरे (सिरसा) का रास्ता नाप रहा था। राम रहीम जैसों की कहानी पूरे सिस्टम को घुटने पर ला देने की कहानी है।
दुनिया में भारत प्रतिव्यक्ति सालाना आय के मामले में 140वीं पायदान पर खड़े होकर देशवासियों को विश्व गुरु होने का दिवास्वप्न बेच रहा है। भारत में प्रतिव्यक्ति आय 2.7-2.9 लाख रुपये सालाना है। जबकि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सुरक्षा पर सालभर में 500 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किया जा रहा है। देश की सच्चाई केवल पेपर लीक होना भर नहीं है। देश की सच्चाई यह भी है कि रेलवे में तकरीबन 3 लाख, आर्मी में 3 लाख, पोस्ट आफिस में 1 लाख, गृह मंत्रालय में 1 लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हुए हैं। कभी 10-13 हजार पदों की भर्ती एक साथ निकलती थी आज बमुश्किल 2-3 हजार पदों पर भर्ती निकलती है और आवेदन आ जाते हैं 40 लाख से अधिक। भारत में केवल स्कूल, कालेज की परीक्षाओं भर का पेपर लीक नहीं होता यहां तो नौकरी के लिए भर्ती की जाने वाली परीक्षिओं के पर्चे भी लीक होते हैं। लेकिन मजाल है कि प्रधानमंत्री के मुंह से पश्चात्ताप का एक शब्द भी निकला हो। शायद ही किसी ने किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री (नरेन्द्र मोदी को छोड़ कर) को मंच सजा कर, कैमरे बुला कर और करोड़ों रुपये फूंक कर ज्वाइनिंग लेटर बांटते देखा हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ज्वाइनिंग लेटर समारोह असल में सरकार की उपलब्धि नहीं बल्कि देश के भीतर पनप चुकी बेरोजगारी का भयावह आईना है। इससे शर्मनाक तस्वीर और क्या हो सकती है कि 5 साल में 51 हजार ज्वाइनिंग लेटर बांट कर अपना यशोगान करना ?
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार



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