आरक्षण पर पुनर्विचार का समय: समाज को जोड़ना होगा, तोड़ना नहीं
भारत में आरक्षण व्यवस्था को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। लेखक का मानना है कि अधिकांश राजनीतिक दल आरक्षण व्यवस्था में व्यापक बदलाव करने का राजनीतिक जोखिम नहीं उठाना चाहते, जिसके कारण समाज में जातीय आधार पर विभाजन की प्रवृत्ति बढ़ी है। लेख के अनुसार, सामाजिक समरसता और सौहार्द जैसे मूल्यों को मजबूत करने के लिए आरक्षण नीति की समीक्षा पर गंभीर विमर्श होना चाहिए।
लेख में कहा गया है कि स्वतंत्रता के समय भारतीय समाज में ऊंच-नीच और जातिगत भेदभाव अधिक था। ग्रामीण अर्थव्यवस्था विभिन्न पारंपरिक जातिगत व्यवसायों पर आधारित थी और सामाजिक ढांचे में जमींदारों सहित प्रभावशाली वर्गों का वर्चस्व था। लेखक के अनुसार, 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई। बाद में 7 अगस्त 1990 को मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी आरक्षण का लाभ दिया गया।
लेखक का तर्क है कि आरक्षण का लाभ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े सभी जरूरतमंद लोगों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया। उनका कहना है कि इससे विभिन्न वर्गों के बीच असंतोष और सामाजिक दूरी भी बढ़ी है। लेख में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ राजनीतिक दलों ने आरक्षण और जातीय समीकरणों को राजनीतिक लाभ के साधन के रूप में इस्तेमाल किया, जिससे सामाजिक समरसता प्रभावित हुई।

हाल के घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए लेखक ने दावा किया है कि नीट पेपर लीक प्रकरण के बाद सोशल मीडिया पर “रिजर्वेशन हटाओ अभियान (RHA)” को लेकर चर्चा तेज हुई। लेखक का मत है कि इस बहस ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की मांग को नया बल दिया है।
लेख के अंत में लेखक का कहना है कि देश के राजनीतिक दलों और नीति-निर्माताओं को आरक्षण के संवैधानिक, सामाजिक और आर्थिक पहलुओं पर व्यापक चर्चा करनी चाहिए, ताकि सामाजिक सौहार्द बनाए रखते हुए सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर भविष्य की नीति तय की जा सके।
लेखक: सुधाकर आशावादी
स्रोत: विनायक फीचर्स
(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं। इससे वेबसाइट के संपादकीय विचारों का आवश्यक रूप से सहमत होना जरूरी नहीं है।)



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