खरी-अखरी : सूरज पर फेंका थूक खुद पर गिरता है तो फिर जं जी से इतनी नफरत आखिर क्यों हो रही है ?
जंतर-मंतर के आंदोलन ने मोदी सरकार, बीजेपी के साथ ही आरएसएस को भी पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया है। देश के टैक्स पेयर्स के अरबों रुपये लुटा कर मोदी का जो तिलिस्मी आभामंडल बनाया गया उसे जं जी ने एक झटके में ध्वस्त कर दिया। संघ जिस संस्कार और चरित्र निर्माण करने का दावा सौ साल से करता चला आ रहा है उसके भी परखच्चे उड़ गये हैं। यह साफ हो गया है कि नई पीढ़ी संस्कृति को आरएसएस की नजरों से ना तो देख रही है ना ही स्वीकार कर रही है। जिसकी वजह से उनकी खीज और बौखलाहट खुल कर सामने आने लगी है। जिसकी परिणिति टिप्पणी के रूप में खासतौर से बीजेपी की सांसद कंगना ने बच्चियों को लेकर की है, अच्छा होता यदि वे ऐसी टिप्पणी करने के पहले अपने गिरेबान में अपने चाल चरित्र की झांकी देख लेतीं। कहा जाने लगा है कि कंगना रनौत की टिप्पणी के बाद संस्कार और चरित्र दोनों भाईयों ने मंडी के पंडोह डैम में खुदकुशी कर ली होगी !
मैंने अपने जीवन में एक भी जगह इतनी बदसूरत नहीं देखी। जं जी के प्रोटेस्ट को लेकर जो रील बने हैं उन्हें देख कर उल्टी आती है। मैंने अपने जीवन में ऐसा कभी नहीं देखा। यह जिस तरह से बात करते हैं, जिस भाषा में बात करते हैं उनकी भाषा कर्कश है। रील के एक – एक फ्रेम को देख कर मन खराब हो जाता है। इन्हें कौन जन्म दे रहा है? कौन बड़ा कर रहा है? भारत विभिन्न प्रकार के खूबसूरत लोगों का देश है। इसकी संस्कृति में शालीनता नफासत है और आप खुद को काॅकरोच कहते हैं। उनकी तरह दिखते हैं। उनकी तरह बर्ताव करते हैं। असली काॅकरोच और इनमें कोई अंतर नहीं है। यह इस दुनिया पर अपनी गंदगी, कचरा और बदसूरती थोप रहे हैं। मुझे इस तरह के रील से आघात पहुंचा है। मुझे डिजिटल डिटाॅस्क की जरूरत है। सबसे हैरान और स्तब्ध करने वाला है जवान लड़कियों का बर्ताव, जो स्वतंत्र कैरियर औरतों की जिंदगी की नकल करना चाहती हैं। बिना उस स्वतंत्रता को कमाये जो औरतें सच में आजाद होती हैं वो बगावत का विकल्प चुनती हैं। उनकी बोल्ड ओपिनियन होती है। कैरियर के लिए गैर पारंपरिक चुनाव करती हैं और जो कदम उठाती हैं उसके लिए खुद को जवाबदेह मानती हैं। यहां पर एक नई पार्टी आई है जो अपने आप को वेस्टर्न इंडियन औरत कहती हैं। मैं इन्हें जनरेशन गटर कहती हूँ। इनमें से कुछ के पास सिस्टम को देने के लिए कुछ नहीं है। ना वे पढ़ने में अच्छी हैं और इतनी बदसूरत और भृष्ट हो चुकी हैं कि घर भी नहीं चला सकती हैं। होम मेकर नहीं हो सकती। अपनी आजादी बघार रही हैं ड्र्ग्स, शराब और शारीरिक संबंध बनाने की आजादी की नुमाइश कर रही हैं। बेशर्मी से अपने माता पिता की कमाई पर जिये जा रही हैं और अपनी आजादी में रहने की लड़ाई कर रही हैं। जबकि आजाद नहीं हैं। मैं याद दिला दूँ कि आजाद जिंदगी को हासिल करना पड़ता है। उसके लिए मेहनत करनी पड़ती है। ये 2024 में हिमाचल प्रदेश की मंडी संसदीय सीट से बीजेपी की टिकिट पर चुनाव लड़ कर पहली बार सांसद बनी कंगना रनौत की दो पोस्टें हैं जो उन्होनें इंस्ट्राग्राम पर लोड की हैं।
इन वायरस और काॅकरोच वाले लोगों को निश्चित रूप से ध्यान रखने की जरूरत है। यह देश के टुकड़े करने वाले गैंग के लोग हैं। इन देश के टुकड़े करने वाले गैंग के लोगों को सबक सिखाने का काम भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता ही कर सकता है। ये विचार भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने बूथ वर्कर्स के बीच व्यक्त किए। संघ विचारक एस. गुरूमूर्ति कहते हैं कि आंदोलनकारी बलात्कारी, हत्यारे, अपराधी और गैंगस्टर थे। केरलम से आने वाले भाजपा के बौध्दिक प्रकोष्ठ के पूर्व संयोजक तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से निकटता रखने वाले विचारक टी जी मोहनदास एक वीडियो में कहते हैं कि वह जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों को गोली मार देते। अब गैंगरेप हो गया तो कोई शिकायत नहीं आएगी क्योंकि यह वह लोग हैं जिन्हें रेप पसंद है। ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें बलात्कार पसंद है। खासकर वामपंथी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक और सर्वहारा वर्ग की महिलाओं की यह सोच है। दिल्ली के अंदर में अवैध घुसपैठिए हैं।
इससे परेशानी है या नहीं है? बताओ। जरा जोर से बोलो। पीछे तक परेशानी है या नहीं है ? इन घुसपैठियों को निकालना चाहिए या नहीं निकालना चाहिए ? देश में करोड़ों की संख्या में घुसपैठिए घुसे हुए हैं। दीमक की तरह चाट गए हैं देश के भविष्य को। उनको उखाड़ फेंकना चाहिए या नहीं उखाड़ फेंकना चाहिए ? ये देश के गृह मंत्री अमित शाह के बोल हैं जो उन्होंने दिल्ली की जनता के बीच बोले थे। 2014 के बाद से देश की राजनीति में पब्लिक स्पेश से पहले सरकार से सवाल करने वालों को देशद्रोही, अर्बन नक्सल बताकर टार्गेट किया गया। फिर विरोधी पार्टी के वोटरों को टार्गेट करना शुरू कर दिया गया। कोरोना के दौरान तबलीग़ी जमात के लोगों को सुपर स्प्रेडर कहा जाने लगा। नतीजा यह हुआ कि मुसलमानों से नफरत के लिए एक नया शब्द हथियार के रूप में मिल गया। यह सौ आना सच है कि कोरोना तबलीग़ी जमात के कारण नहीं फैला इसके बावजूद भी उन्हें सुपर स्प्रेडर बताते हुए जेल में डाला जाने लगा।

हिटलर का दौर भी कुछ इसी तरह का था। दक्षिण पोलैंड में हिटलरी सरकार ने आस्विस का कंसंट्रेक्शन कैंप बनाया वहां पर रखे कपड़े यहूदी और हिटलर के विरोधियों को मार डालने के पहले पहनाए जाते थे। हिटलर यहूदियों को बैक्टीरिया कहता था। इसी समय से जनता को अवैध कीड़े मकोड़े दीमक बताने की राजनीति ने खतरनाक मोड़ लेना शुरू किया। यहूदियों के प्रवास को गटर में रहने वाले चूहों से तुलना की गई। कंसंट्रेक्शन कैंप बनाने के पहले ही यहूदियों की इंसानियत को मिटाया गया। लोगों के दिमाग में यह ठूंस ठूंस कर भर दिया गया कि ये इंसान नहीं हैं। ये कीड़े मकोड़े हैं। इनका कत्लेआम इंसान की रक्षा के लिए जरूरी है। इसी नफरती सोच ने लाखों यहूदियों का नरसंहार करा दिया।
रवांडा में हुतु समुदाय ने तुत्सी समुदाय के लिए काॅकरोच शब्द का इस्तेमाल किया। इससे पहले इंसान के लिए जानवर शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब इंसान और समुदाय के लिए काॅकरोच, दीमक, कीड़ा आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है आगे चल कर नरसंहार जरूर हुआ है। इतिहासकार लिनहंट ने लिखा है कि जब राजा या शासक का शरीर अश्लील कल्पनाओं और व्यंग का विषय बनने लगे तो समझ लेना चाहिए कि राजनीतिक व्यवस्था समस्याग्रस्त हो गई है। फ्रांस में 18 वीं सदी के अंत में राजतंत्र और चर्च की पारंपरिक दैविक छबि को चुनौती दी गई। फ्रांस के राजा ने खुद को दैवीय दर्जा दे रखा था लेकिन जनता ने उसके दैवीय दर्जे का पानी उतार कर रख दिया। लेबनान के भीतर 2017 में भृष्टाचार और इंटरनेट पर टैक्स लगाए जाने को लेकर उस विदेश मंत्री के खिलाफ आंदोलन किया गया जो सरकार और पार्टी का बड़ा चेहरा था। आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों ने एक गाने को इतना प्रचारित किया कि 13 दिनों के भीतर प्रधानमंत्री सहित पूरी कैबिनेट को इस्तीफा देना पड़ा और सरकार गिर गई।
2017 में ही दिल्ली के भीतर रामजस कालेज में हुई हिंसा का विरोध करने के लिए गुरमेर कौर “मैं दिल्ली युनिवर्सिटी की छात्रा हूँ, मैं अकेली नहीं हूँ, भारत का हर छात्र मेरे साथ है, मैं एबीवीपी से नहीं डरती” लिखा पोस्टर लेकर जब सामने आई तो उसे तथाकथित छात्र संगठन द्वारा अश्लीलता को भी अश्लील कर देने वाली गालियां दी गई। यहां तक कि उसको रेप करने की भी धमकी दी गई। उसके पिता की शहादत का मजाक उड़ाया गया।
फ्रांस के राजा की तरह ही भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी दैवीय छबि बनाने के लिए खुद को नान बायोलाजिकल बताया। सामान्य मानवीय पहचान से हटकर खुद को कभी सन्यासी तो कभी आध्यात्मिक और त्यागी बताने का ढोंग करते रहे। लेकिन जं जी के पहले कभी भी किसी ने इस छबि को चुनौती देने का साहस नहीं किया। मगर चंद रोज पहले ही जं जी ने जंतर-मंतर पर मोदी की इस दैविकता को ना केवल चुनौती दी बल्कि मोदी को भगवान होने की प्रतीकात्मक ऊंचाई से उतार कर प्रधानमंत्री के रूप में जनता को जवाब देने के पीढे पर लाकर बैठा दिया है। जं जी ने सही मायने में नरेन्द्र मोदी की तथाकथित करिश्माई और तिलिस्मी राजनीतिक छबि से रहस्य का नकाब नोच कर फेंक दिया है। यही कारण है कि अपने लम्बे राजनीतिक सफर में पहली बार नरेन्द्र मोदी को मित्रो से आगे बढ़कर फ्रेंड्स का सफर तय करना पड़ा।
जं जी के इस कमाल को समझने के लिए 1930 के नाजी जर्मनी के दौर में झांकना पड़ेगा, 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के पन्ने पलटने होंगे, 2018 में अमित शाह द्वारा दिए गए दीमक वाले बयान को समझना पड़ेगा। यहां तक कि सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत के काॅकरोच वाले बोल को भी जोड़ना होगा। मगर काॅकरोच शब्द भारत के भीतर लोकतंत्र, नागरिकों की गरिमा और उनके अधिकार का प्रतीक बन गया है। वह भी तब जब लोग यह मान चुके हैं कि भारत के भीतर हो रहे चुनाव फर्जी तरीके से हो रहे हैं। लोकतंत्र केवल दिखावा बनकर रह गया है। सरकार काॅकरोच को नरसंहार का हथियार नहीं बना पाई बल्कि उल्टा काॅकरोच जनता के लिए नैतिकता का टाॅनिक बन गया। जिसके आगे सरकार को झुकना पड़ गया।
एक तबका जं जी को जनरेशन गांधी कह रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जं जी को फ्रेंड्स भर नहीं कह रहे बल्कि उससे बात करने के लिए देर रात रील बना रहे हैं और उन्हीं की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और सांसद कंगना रनौत द्वारा वायरस और जनरेशन गटर कहा जा रहा है। इस्तीफा देने वाला मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने इस्तीफे के पत्र में राष्ट्र विरोधी तत्व लिखता है। सही मायने में ये वही लोग हैं जिन्हें सरकार की हिंसा गाली नहीं प्रसाद लगती है। माॅबलिंचिंग भोग लगता है। पेपर लीक से डाक्टर बनाने का विरोध इन्हें गाली नजर आ रहा है। मध्य प्रदेश में व्यापमं जैसा घोटाला करके पिछले दरवाजे से एमबीबीएस में हजारों छात्रों को भेजा गया। सुप्रीम कोर्ट ने ही 600 से ज्यादा एडमीशन कैंसिल किए थे। इसमें कंगना और नितिन को गंदगी और गाली नजर नहीं आई।
सबसे ज्यादा तो भद्द पिट रही है मेन स्ट्रीम मीडिया यानी गोदी मीडिया की। भद्द भी और किसी के द्वारा नहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा ही पीटी जा रही है। 2023 में ही नरेन्द्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर क्रिएटर्स के बीच कहा था कि उनके यू ट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करें औ बेल आइकन दबाएं, शेयर करें। 2024 में दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित नेशनल क्रिएटर्स अवार्ड कार्यक्रम में पीएम मोदी ने यू ट्यूब और इन्फ्लुएंसर कम्युनिटी से जुड़े लोगों को सम्मानित किया था। यहां पर भी उल्टी ही गंगा बहाई जा रही है कि एक तरफ पीएम मोदी आइकान को सम्मानित करते हैं तो दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी की सांसद कंगना आइकान कंजूमर्स और फालोवर्स जं जी को गटर और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन वायरस कह रहे हैं ।
फ्रांस की क्रांति के समय की भाषा से समझा जा सकता है कि सत्ताधारी वर्ग यह दिखाना चाहता है कि उसकी भाषा ही जनता की भाषा है यानी वह जनता की सोच पर कंट्रोल करता है लेकिन विद्रोह करने वाली जनता के पास सत्ता नहीं केवल भाषा होती है। उसी से वह सत्ता को चैलेंज करती है। गोदी मीडिया का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है कि जिस प्रधानमंत्री की चरण पादुका सिर पर रख कर वह नृत्य करता रहता है वही प्रधानमंत्री अपना बयान जारी करने के लिए गोदी मीडिया की जगह Instagram का चयन करता है।
बीजेपी और आरएसएस के पास जं जी से बात करने की भाषा नहीं है और जो भाषा उनके खिलाफ है उस भाषा को वे अपना नहीं सकते। इसीलिए तो 2014 के बाद बीजेपी के आईटी सेल ने जिस गाली की भाषा को विकसित किया है उस पर ये बात नहीं करते। जो सरकार आये दिन विपक्ष को अपमानित करना अपना धर्म समझती हो, विपक्षी विधायक, सांसद को खरीदना अपनी नैतिकता बना चुकी हो, न्यूज क्लिक जैसे मीडिया संस्थान को रौंदना अपनी शान समझती हो, अपने विरोधियों को जेल में डालना ओलंपिक के मेडल समझती हो, जिसे हर बात में डिक्टेट करने की आदत हो वह बिना डिक्टेशन जं जी से बात कैसे कर सकती है ? आरएसएस को लगता है कि संवाद की कमी है और जं जी को लगता है कि जवाब की कमी है। बीजेपी को जवाब के साथ जं जी के पास जाना पड़ेगा, संवाद का दुशाला ओढ़ कर नहीं।
जं जी ने बीते 12 बरस से चले आ रहे मिथक को तोड़ कर बता दिया है कि नरेन्द्र मोदी एक जनसेवक हैं ना भगवान हैं, ना राजा हैं वह भी आपकी और मेरी तरह एक सामान्य नागरिक हैं (NARENDRA MODI IS A PUBLIC SERVANT, NOT GOD, NOT KING, A NORMAL HUMAN LIKE YOU AND I) बीजेपी भारत नहीं है। वह इस देश की अनेक राजनीतिक पार्टियों में से एक है (BJP IS NOT INDIA, IT’S ONE OF THE MANY POLITICAL PARTIES IN INDIA) भाजपा और मोदी का विरोध करना राष्ट्र विरोधी होना नहीं है (IF I’M AGAINST BJP AND MODI THAT DOESN’T TRANSLATE TO ANTI NATIONAL)
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार




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