विश्व स्तनपान सप्ताह : हर माँ को मिले सहयोग, हर शिशु को मिले पोषण
शिशुओं के लिए स्तनपान के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाने के क्रम में प्रतिवर्ष 1–7 अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है। वास्तव में इस दिवस मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य सभी माताओं, परिवारों, स्वास्थ्यकर्मियों और नीति-निर्माताओं को स्तनपान के महत्व के प्रति जागरूक करना तथा प्रत्येक शिशु को जीवन की सर्वोत्तम शुरुआत दिलाना है। इस अभियान को विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ के साथ ही साथ वर्ल्ड अलायंस फोर ब्रेस्टफीडिंग एक्शन का व्यापक समर्थन प्राप्त है। हाल फिलहाल, यहां यदि हम इस दिवस के इतिहास की बात करें तो पाठकों को बताता चलूं कि इस सप्ताह को मनाने की शुरुआत 1992 में ‘वर्ल्ड अलायंस फॉर ब्रेस्टफीडिंग एक्शन’ (डब्ल्यूएबीए) ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के साथ मिलकर की थी। उल्लेखनीय है कि अगस्त 1990 में दुनिया भर के नीति निर्माताओं द्वारा हस्ताक्षरित ‘इन्नोसेंटी घोषणा पत्र’ की याद में ही हर साल अगस्त के पहले सप्ताह को चुना गया था।
इस साल(वर्ष 2026 में) इस दिवस की थीम-‘जीवन की सतत एवं स्वस्थ शुरुआत के लिए स्तनपान: जो प्रभावी है, उसे और सशक्त बनाएं।’ रखी गई है। वास्तव में, इस थीम का संदेश है कि माताओं को हर स्तर पर सहयोग मिले, ताकि वे अपने बच्चों को आसानी और सुरक्षित रूप से स्तनपान करा सकें। मतलब यह है कि सरकार, अस्पताल, कार्यस्थल, परिवार और समाज मिलकर एक ऐसा माहौल बनाएँ, जिससे हर माँ बिना किसी कठिनाई के अपने शिशु को सुरक्षित और सफलतापूर्वक स्तनपान करा सके। जन्म के छह माह तक हर शिशु को केवल मां के दूध की आवश्यकता होती है। मां का दूध शिशु के लिए वरदान है। मां का दूध शिशु को पोषण व अच्छा स्वास्थ्य देता है तथा शिशु मृत्यु दर और कुपोषण को कम करता है, इसलिए प्रत्येक शिशु के लिए मां का दूध बहुत ही जरूरी और महत्वपूर्ण है। जन्म के तुरंत बाद आने वाला गाढ़ा पीला दूध ‘लिक्विड गोल्ड’ कहलाता है। इसमें इतने ज्यादा इम्यून सेल्स होते हैं कि इसे बच्चे का पहला प्राकृतिक टीका (फर्स्ट वैक्सीन ) माना जाता है। सच तो यह है कि स्तनपान से मां और बच्चे का डीएनए संवाद संभव हो पाता है।
मां के दूध में प्राकृतिक रूप से एंडोर्फिन और अन्य ऐसे तत्व होते हैं जो बच्चे को दर्द और तनाव से राहत दिलाते हैं। दुनिया भर में चिकित्सक जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करने की सलाह देते हैं तो इसके पीछे विशेष कारण हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि पहले 6 महीने तक केवल माँ का दूध शिशु के लिए सर्वोत्तम आहार माना जाता है।स्तनपान से शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है तथा संक्रमण का खतरा कम होता है। इतना ही नहीं, स्वयं माँ के लिए भी स्तनपान लाभकारी है; यह प्रसवोत्तर स्वास्थ्य सुधार और कुछ रोगों के जोखिम को कम करने में सहायक हो सकता है। इतना ही नहीं, यह परिवार की आर्थिक बचत और पर्यावरणीय स्थिरता में भी योगदान देता है। दरअसल,माँ का दूध प्राकृतिक रूप से उपलब्ध होता है, इसलिए शिशु आहार खरीदने की आवश्यकता कम या नहीं पड़ती।और तो और बोतल, निप्पल, स्टेरिलाइज़र और अन्य सामान पर होने वाला खर्च बचता है। सच तो यह है कि स्तनपान करने वाले शिशु अपेक्षाकृत कम बीमार पड़ते हैं, जिससे दवाइयों और अस्पताल के खर्च में भी कमी आ सकती है।माँ का दूध बनाने के लिए किसी कारखाने, पैकेजिंग या लंबी दूरी के परिवहन की आवश्यकता नहीं होती। यह प्राकृतिक है।इससे प्लास्टिक, टिन और पैकेजिंग कचरा कम उत्पन्न होता है। साथ ही साथ, ऊर्जा, पानी और ईंधन की खपत कम होती है, जिससे कार्बन उत्सर्जन भी घटता है।इसलिए स्तनपान एक प्राकृतिक, पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ (सस्टेनेबल) विकल्प माना जाता है।
अंत में यही कहूंगा कि स्तनपान की सफलता एक मां के अकेले की यात्रा नहीं है; यह पूरे परिवार, कार्यस्थल और समाज के संयुक्त सहयोग का परिणाम है। यदि समाज सही जानकारी, सम्मान और सुविधाएं प्रदान करे, तो हम एक स्वस्थ, सुरक्षित और सशक्त आने वाली पीढ़ी का निर्माण कर सकते हैं।
सुनील कुमार महला,
फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार




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