जंतर-मंतर से बदला सियासत का एजेंडा! क्या Gen-Z अब जाति-मजहब से ऊपर तय करेगा चुनावी नतीजे?
युवा आंदोलन के बाद BJP-कांग्रेस दोनों का फोकस बदला; 2027 से 2029 तक होने वाले चुनावों में नई पीढ़ी को साधना बन सकता है सबसे बड़ा सियासी टारगेट
भारतीय राजनीति में चुनावी गणित लंबे समय से जाति, धर्म, क्षेत्र और महिला मतदाताओं के इर्द-गिर्द घूमता रहा है, लेकिन हालिया Gen-Z आंदोलन ने राजनीतिक दलों को एक नए वोटर समूह की ताकत का अहसास कराया है। जंतर-मंतर से उठी युवाओं की आवाज अब पार्टियों के रणनीतिकारों के लिए चर्चा का बड़ा विषय बन गई है। सवाल यह है कि क्या आने वाले चुनावों में Gen-Z का मुद्दा ‘हिंदू-मुस्लिम’ और पारंपरिक जातीय समीकरणों पर भारी पड़ सकता है?
आंदोलन के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों युवाओं के साथ संवाद बढ़ाने की कोशिश में दिखाई दे रहे हैं। BJP हो या कांग्रेस, दोनों के लिए यह समझना जरूरी हो गया है कि सोशल मीडिया, रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और अवसरों से जुड़े मुद्दों पर मुखर युवा वर्ग चुनावी नैरेटिव को प्रभावित कर सकता है।
2027-29 का चुनावी रोडमैप और युवा वोट
आने वाले वर्षों में कई बड़े राज्यों के विधानसभा चुनाव और 2029 का लोकसभा चुनाव राजनीतिक दलों के लिए अग्निपरीक्षा होंगे। ऐसे में Gen-Z के साथ-साथ Gen-Alpha के उन युवाओं पर भी नजर है, जो आने वाले वर्षों में पहली बार मतदान के अधिकार तक पहुंचेंगे।
परंपरागत वोट बैंक की राजनीति के बीच यह पीढ़ी राजनीतिक दलों से सीधे सवाल, तेज जवाब और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संवाद की उम्मीद करती है। यही वजह है कि पार्टियां अब केवल रैलियों और पोस्टरों के बजाय सोशल मीडिया, वीडियो कंटेंट और ऑनलाइन संवाद के जरिए युवाओं तक पहुंच बनाने पर जोर दे रही हैं।
BJP के सामने भरोसा कायम रखने की चुनौती
युवा आंदोलन ने BJP के लिए खास चुनौती पैदा की है। सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि युवाओं की नाराजगी को राजनीतिक विरोध में बदलने से पहले कैसे दूर किया जाए। RSS प्रमुख मोहन भागवत की ओर से आंदोलनकारी युवाओं की शिकायतों को जायज बताकर संवाद की जरूरत पर जोर देना भी इसी बदलते माहौल का संकेत माना जा रहा है।
BJP के लिए चुनौती सिर्फ युवाओं तक पहुंचने की नहीं, बल्कि उनके मुद्दों पर विश्वसनीय जवाब देने की भी है। सोशल मीडिया पर विपक्ष के आक्रामक नैरेटिव के बीच पार्टी को अपनी डिजिटल पहुंच और संवाद रणनीति दोनों मजबूत करनी होंगी।
कांग्रेस ने भी बदला युवाओं पर फोकस
कांग्रेस भी अब छात्र और युवा वर्ग के साथ सीधे संवाद को प्राथमिकता दे रही है। राहुल गांधी का प्रयागराज में छात्रों के कार्यक्रम में पहुंचना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर युवाओं से जुड़े मुद्दों को लगातार उठा रही है और विश्वविद्यालयों, बेरोजगारी तथा परीक्षा व्यवस्था जैसे विषयों को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला रही है।
हालांकि, कांग्रेस के सामने भी चुनौती कम नहीं है। युवाओं का एक बड़ा वर्ग पारंपरिक राजनीतिक नारों के बजाय ठोस रोजगार, पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था और भविष्य की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जवाब चाहता है।
NEET और परीक्षाओं की गड़बड़ी से नाराजगी का असर
युवा असंतोष के पीछे प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता और पेपर लीक जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण रहे हैं। NEET विवाद समेत विभिन्न परीक्षाओं से जुड़े मामलों ने लाखों छात्रों और उनके परिवारों में व्यवस्था को लेकर सवाल पैदा किए हैं। राजनीतिक दलों के लिए यह महज छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि युवा मतदाताओं और उनके परिवारों के बीच भरोसे का सवाल बनता जा रहा है।
2029 तक Gen-Alpha भी होगी सियासी चर्चा का हिस्सा
आने वाले लोकसभा चुनाव तक नई पीढ़ी का एक हिस्सा पहली बार वोटर बन सकता है। इन युवाओं की राजनीतिक याददाश्त भी पुरानी पीढ़ी से अलग होगी। वे डिजिटल दुनिया में पले-बढ़े हैं और राजनीतिक नेताओं, नीतियों तथा दावों को सोशल मीडिया पर तुरंत परखने की क्षमता रखते हैं।
इसलिए 2027 से 2029 के बीच होने वाले चुनाव सिर्फ जातीय समीकरणों की परीक्षा नहीं होंगे। राजनीतिक दलों को यह साबित करना होगा कि वे युवा पीढ़ी की बेचैनी, आकांक्षाओं और सवालों को कितनी गंभीरता से समझते हैं। आने वाले चुनावों में निर्णायक सवाल यही हो सकता है—Gen-Z को कौन सिर्फ वोटर समझता है और कौन उसकी आवाज को सच में राजनीतिक एजेंडा बनाता है?
नई दिल्ली अनिल सोनी पॉलिटिकल संपादक



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