खरी-अखरी : देश से बड़ा कोई नहीं * सवाल देश की प्रतिष्ठा का है * जवाब तो हरहाल में आने चाहिए
देश से बड़ा कोई नहीं * सवाल देश की प्रतिष्ठा का है * जवाब तो हरहाल में आने चाहिए
वर्तमान दौर में देशी और विदेशी (राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय) झंझावात से जूझ रही राजनीतिक सत्ता और उसके प्रमुख की तारीफ कर रहे थे या उनके जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया (सरसंघचालक) वह समझें मगर यह बात तो उनकी सौ टका सही लगती है कि बीजेपी के अच्छे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वजह से आये हैं तो यह बात भी उतनी ही सही है कि सरसंघचालक समेत तमाम स्वयंसेवक जिस तरह की सुख सुविधाओं, ऐशोआराम का लुफ्त उठा रहे हैं वह बीजेपी की वजह से ही उठा रहे हैं (आम आदमी की अंखियां तो बीते 11 बरस से तरस रही हैं अच्छे दिन देखने के लिए)। अब कोई भी स्वयंसेवक साइकिल पर नहीं घूमता, जनरल क्लास में सफर नहीं करता है ! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े तमाम संगठन अपने – अपने क्षेत्र की समस्याओं को लेकर सरकार को घेरा करते थे अब वो नजारा धोखे से भी नजर नहीं आता है। किसान संघ अब किसानों की परिस्थिति को लेकर सरकार से चर्चा नहीं करता है। भारतीय मजदूर संघ मजदूरों की समस्याओं को लेकर मौन है। स्वदेशी जागरण मंच का तो अता पता ही नहीं चल रहा है। देश के भीतर दम तोड़ते उद्योगों पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। अब तो सिर्फ कब मिंया मरेंगे कब रोजा घटेंगे मुहावरे की तर्ज पर 2047 में कहे जा रहे विकसित भारत को लेकर बातचीत होती है। यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक और बीजेपी या कहें सत्तापक्ष का हर चेहरा, हर नजरिया सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इर्द-गिर्द आकर खड़ा हो गया है। सच तो यही लग रहा है कि मोदी माइनस बीजेपी बराबर बीजेपी शून्य, मोदी माइनस आरएसएस बराबर आरएसएस शून्य !
2024 के चुनाव परिणाम ने दिल्ली की सल्तनत को या कहें बीजेपी को पायदान के जिस पाये पर लाकर खड़ा कर दिया और उसके बाद से सूबे दर सूबे वह जीत हासिल करते चली जा रही है (इस परिपेक्ष्य में चुनाव आयोग की भूमिका, सुप्रीम कोर्ट के फैसले यहां तक कि सूबे के मुखियाओं का नतमस्तक होना भी नजर आता है) तो अब दिल्ली दरबार किसी समझौते के मूड में नहीं है। कहा जा सकता है कि संसद से लेकर सड़क तक चल रहे घात प्रतिघात केवल स्पीकर के खिलाफ लाये गये अविश्वास प्रस्ताव को लेकर नहीं है, यह लड़ाई पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की एक किताब के अंशों को पढ़े जाने को लेकर नहीं है, यह बहस एप्स्टिन फाइल के तहत सत्ता की नब्ज क्या अमेरिका ने दबा ली है को लेकर भी नहीं है। यह तो एक तरफ भारत के उस इतिहास को बदलने को लेकर है जिसकी टीस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतर है, कभी जनसंघ के भीतर थी अब भारतीय जनता पार्टी के भीतर है तो दूसरी तरफ उसे रोकने की सोच कि इस दौर में नहीं लड़े तो फिर सब कुछ बदल जायेगा को लेकर है। इसीलिए एक ओर विपक्ष का नेता खड़ा है तो दूसरी तरफ सत्ता खड़ी है इस सोच के साथ कि भले ही संंसद में ताला लग जाए चलेगा लेकिन विपक्ष के नेता को बोलने नहीं देना है। तो सवाल यही है क्या मोदी सत्ता भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद देश के भीतर कांग्रेस ने जो काम किए हैं उनको पूरे तरीके से मिटा पायेगी ? अगर विपक्ष के नेता को संसद के भीतर बोलने दिया गया तो क्या बीते 10 – 11 बरस से सदन के नेता की गढ़ी गई छबि धराशाई हो जायेगी ?
इसी पार्लियामेंट के भीतर नेहरू और राजीव को बड़ी जीत मिली थी। इसी संसद के भीतर इंदिरा की इमर्जेंसी को भी बखूबी देखा गया। देश के तमाम लोकप्रिय और ताकतवर प्रधानमंत्रियों के कालखंड में ऐसा मौका कभी नहीं आया कि संसद के भीतर जब विपक्ष का नेता बोलने के लिए खड़ा हो तो तमाम नियम कायदे का हवाला देते हुए उसे बोलने से रोक दिया गया हो। लेकिन आज संसद के भीतर सत्तापक्ष द्वारा स्पीकर की मदद से नियम कायदे का जिक्र करते हुए विपक्ष के नेता को बोलने नहीं दिया जा रहा है। तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्या डर है सत्तापक्ष को विपक्ष के नेता बोलने से ? 2014 और 2019 में कोई लीडर आफ अपोजीशन (एलओपी) नहीं था संसद के भीतर क्यों कि कोई भी पार्टी इतनी सीटें जीत नहीं पाई थी कि उसके नेता को विपक्ष के नेता का दर्जा दिया जा सके। यानी दो कालखंड यानी 10 साल तक सत्तापक्ष या कहें बीजेपी ही सब कुछ थी। वह अपने मनमाफिक चारों खूंट घूम-घूमकर शिवांबू का छिड़काव कर रही थी। बात तो पहली बार डगमगाई जब 2024 में कांग्रेस ने इतनी सीटों के साथ संसद में प्रवेश किया कि उसके नेता को विपक्ष के नेता का दर्जा मिल गया। संसदीय इतिहास गवाह है कि किसी भी प्रधानमंत्री के कालखंड में उसकी लोकप्रियता, उसकी ताकत यहां तक कि उसके द्वारा लगाए गये आपातकाल के बावजूद विपक्ष के नेता को अपनी बात कहने से रोका नहीं गया। किसी स्पीकर ने कभी भी विपक्ष के नेता की आवाज़ पर टेप नहीं लगाया। तो फिर इस कालखंड में ऐसा क्या हो गया संसद के भीतर विपक्ष के नेता को बोलने नहीं दिया जा रहा है ?
अगर विपक्ष का नेता संसद के अंदर बोलेगा तो सत्ता के लिए कौन सी मुश्किल खड़ी हो जायेगी ? यह एक हैरतअंगेज स्थिति है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि दशक भर में गढ़ी गई सदन के नेता की इमेज एक झटके में धराशाई हो जायेगी ? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाई गई छबि चकनाचूर हो जायेगी ? राष्ट्रवाद का पहाड़ा पढ़ते हुए, सेना की वर्दी पहन कर सैनिकों के खड़े होकर खिंचवाई गई तस्वीरों में कालिख पुत जायेगी ? दुनिया के साथ ही भारत के भीतर भी जिस तरह से एप्स्टिन फाइल की चर्चा हो रही है, 10 देशों में कद्दावरों के द्वारा अपने पदों से इस्तीफा दिये जाने की खबरें आ रही हैं, उस फाइल में सदन के नेता, मंत्री, सांसद यहां तक कि उनके करीबी कहे जाने वालों के नाम होने की गूंज सुनाई दे रही है तो क्या सदन के नेता, मंत्री, सांसद को भी अपने पद से इस्तीफा देना पड़ जायेगा ? अमेरिका के साथ जो डील हुई है और उस डील को करने के लिए भारत की स्वतंत्रता और संप्रभुता को गिरवी रखने के आरोप सरकार पर लगाये जा रहे हैं तो क्या उन आरोपों के मद्देनजर सदन के नेता को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ जाएगी ? रूस के साथ भारत के सामरिक और कूटनीतिक संबंध अमेरिकी दिशानिर्देश के बाद खुले तौर पर धराशाई होते नजर आ रहे हैं। 1962 के बाद चीन को लेकर जो संदेहास्पद स्थिति थी उसको पलटते हुए आर्थिक संबंध मेक इन इंडिया के नारे में समाहित कर दिये गए। पाकिस्तान के साथ छोटी-मोटी झड़पों के जरिए रची गई छबि, स्थानीय स्तर पर चुनाव जीतते चले जाने का औरा, अंतरराष्ट्रीय तौर पर विश्व गुरू की स्वमेव मान्यता बना लेना, भारत की डील को भारत के साथ भारत के हितों को जोड़ना और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में तमाम परिस्थितियों के बावजूद हर देश के साथ संबंध बनाते हुए यह ऐलान करना कि जो हमारे हित में होगा हम वही करेंगे, अगर यही सच है तो सवाल यह हैं कि फिर देश के भीतर इतनी बेरोजगारी क्यों है ? देश के भीतर किसानों – मजदूरों के हालात बदल से बदतर क्यों होते जा रहे हैं ? ऐसे हालात तो इससे पहले ऐसे बिल्कुल नहीं थे।
2014 के पहले जितने भी प्रधानमंत्री हुए किसी एक ने भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छबि चमकाने के लिए देश के टैक्सपेयर के पैसों को बेतहाशा नहीं उड़ाया जैसा मौजूदा प्रधानमंत्री उड़ा रहे हैं । सदन के भीतर सदन के नेता की गिरती हुई साख को थामने के लिए जिस तरह का भेदभाव करते हुए स्पीकर सामने आये तो विपक्ष 118 सांसदों का हस्ताक्षर युक्त अविश्वास प्रस्ताव स्पीकर के खिलाफ ही लेकर आ गया। जो विपक्ष का कास्टिटूशनल वैपन यानी संवैधानिक हथियार माना जाता है। सदन के इतिहास में ओम बिरला चौथे स्पीकर हैं जिनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। इसके पहले 1954 में जी वी मावलंकर, 1966 में सरदार हुकुम सिंह और 1985 में बलराम जाखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाये गये थे जो पास नहीं हो सके थे। स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव भी संख्या बल के अभाव में फेल हो सकता है लेकिन अगर ऐसा होता है तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि स्पीकर के ऊपर लगाये गये भेदभाव के आरोप का कलंकित धब्बा मिट जायेगा। अपराधी भले ही गवाहों और साक्ष्यों के अभाव में बरी हो जाए लेकिन उसका यह मतलब कतई नहीं होता है कि उसने अपराध किया ही नहीं है। सदन के भीतर स्पीकर के दोमुंहे रवैये को इस तरह भी समझा जा सकता है जब स्पीकर के सामने भाजपाई सांसद निशिकांत दुबे सदन के भीतर बिलो द बेल्ट भाषा का उपयोग करता है। वह उन तथ्यों का उल्लेख करता है जिसका राष्ट्रपति के अभिभाषण से कोई लेना देना नहीं होता है। वह दो – दो पूर्व प्रधानमंत्रियों का चरित्र हनन करता है और स्पीकर उसे रोकते-टोकते तक नहीं हैं। तब 349, 352, 353 के नियम कहां चले जाते हैं ? सदन की कार्यवाही के सीधे प्रसारण से स्पीकर द्वारा विपक्ष के साथ किया जाने वाला सौतेला व्यवहार खुले तौर पर दिखाई देता है। जबकि स्पीकर का प्रथम दायित्व होता है पक्ष और विपक्ष को समभाव से देखना। मुखिया मुख सों चाहिए खानपान सों एक, पाले पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक। सवाल है कि स्पीकर की कुर्सी पर बैठा हुआ शख्स अगर न्याय नहीं कर रहा है तो फिर विपक्ष के पास बचता क्या है ?
रूस भारत के बहुत करीब है। इसीलिए पुतिन ने कहा कि ना तो भारत की जनता ऐसी है ना ही भारत ऐसा है कि वह अमेरिका के कहने पर हमसे तेल लेना बंद कर देगा। और अगर भारत ऐसा करता है तो उसे तत्काल 9 से 10 बिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ेगा। असल में अमेरिका रशिया को आर्थिक तौर पर बर्बाद करना चाहता है। If India response our energy damage bead upon them like to 9 to 10 billion if decline to buy from us Indian people will look at dis are made by the pitical leadership never acceptance before I know prime minister modi will cooperation military, technical, logistics partners like India other we can ICS members. भारत अमेरिका के बीच जिस डील को होने की चर्चा है। इस संबंध में जब भारत के कामर्स मिनिस्टर से पूछा जाता है तो वह गेंद भारत के विदेश मंत्री की ओर बढ़ा देते हैं और जब विदेश मंत्री से पूछा जाता है तो वे भी गेंद वापस कामर्स मिनिस्टर की ओर धकेल देते हैं। यानी कोई भी स्पष्ट तौर पर डील के भीतर की हकीकत बताने को तैयार नहीं है। इसीलिए डील को लेकर संदेहास्पद परिस्थिति पैदा हो रही और जितने मुंह उतनी बातें की जा रही है। विदेश सचिव जरूर अपने तौर पर कुछ सफाई देने सामने आये। मगर वे भी संदेह के बादलों को छांट नहीं पाये। You are aware that India is a net transporter in the oil and gas sector. We are a developing economy. We have to be conscious about our resource ability. A naturally when you are dissented to the extent of 80-85% on an imported resource you have to have concerns about the possibility of election drivan buy energy cost. So does not surprising there for that our for most priority is to safeguard the interest of Indian consumers in so for yes energy concern to. पूर्व सेनाध्यक्ष नरवाणे की जिस पुस्तक फोर स्टार्स आफ डेस्टिनी की चंद लाइनों को बोलने को लेकर संसद में हंगामा मचा हुआ है। उसको लेकर विपक्ष का नेता नरवाणे के द्वारा पूर्व में किये गये ट्यूट से ही अपनी बात शुरू करते हुए कहता है। Narvane tute – My book is available. Just follow the link. Happy reading. Jai Hind. You can look into the tute. So the point I am making is either mister narvane is long and I believe the army chief OK. I don’t think he will lay are penguin is laying. Somebody needs to both can not be tailing the truth. So I believe mister narvane he is the army chief. He has made certain statements in the book. That is in convenient for the government of India. He in convenient for the prime minister of India. And habitually you have to decide whether penguin is tailing the truth are army chief is tailing the truth.
वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नरवाणे द्वारा लिखा गया अपना मेमोआर किताब के रूप में (फोर स्टार्स आफ डेस्टिनी) पब्लिकली पब्लिशड है, सर्कुलेटेड नहीं है। क्योंकि अगर किताब पब्लिश्ड नहीं होती तो किताब की शक्ल में हाथ में कैसे आती ? भारत सरकार किताब को भारत की ज्योग्राफी के अंदर पब्लिस सर्कुलेट होने से रोक सकती है मगर अगर किताब ग्लोबली पब्लिश्ड है तो फिर भारत सरकार उसे कैसे रोक पायेगी ? किताब में पब्लिश्ड होने की तारीख भी लिखी हुई नजर आ रही है Amazon पर 30 अप्रैल 2014। अगर सूर्य पूर्व में उदय नहीं हुआ तो इसका मतलब ये तो नहीं है कि वह पश्चिम में भी उदय नहीं हुआ होगा। विश्लेषकों के अनुसार सरकार को जब किताब पब्लिश होने की जानकारी लगी तो उसने नियम का हवाला देते हुए कहा होगा कि आपको एसओडी की परमीशन लेनी होगी और परमीशन देने के लिए किताब को अपने पास रख लिया होगा और इंडिया में सर्कुलेशन के लिए रोक दिया होगा लेकिन किताब तो ग्लोबली पब्लिश्ड है ! सवाल यह नहीं है कि नरवाणे की किताब फोर स्टार्स आफ डेस्टिनी पब्लिश्ड हुई है या नहीं हुई है ? सवाल यह है कि उस किताब में लिखे हुए शब्द जिसकी गूंज सुनाई दे रही है वह सही हैं या नहीं है ? क्योंकि आरोप सीधे-सीधे प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। जिसका जवाब प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री देना चाहिए। सदन के भीतर जिस तरह का गतिरोध पैदा किया जा रहा है वह तो यही बताता है कि प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री की दाल में कुछ काला है या फिर पूरी दाल ही काली है ! यही सवाल अमेरिका से की गई डील और एप्स्टिन फाइल को लेकर भी हैं। जिस पर प्रधानमंत्री और मंत्री को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए ऐसी अपेक्षा तो देश कर ही रहा है। क्योंकि सवाल अब प्रधानमंत्री और मंत्री या धनाढ्यों की साख का नहीं भारत देश की साख का हो गया है और देश से बड़ा कोई नहीं है। प्रधानमंत्री भी नहीं हैं।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार



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