कहानी : सरहदों के बीच
चारों ओर मिसाइलों की गूँज थी। बारूद की तीखी गंध से हवा भारी हो चुकी थी। कहीं से चीखें सुनाई दे रही थीं, तो कहीं मशीनगनों की दनदनाहट। आलीशान इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढह रही थीं। मार्च 2026 की वह सुबह किसी डरावने सपने जैसी थी, जिसने पूरी दुनिया को सहमा दिया था। कहते हैं, युद्ध केवल तब नहीं होता जब गोलियाँ चलती हैं। उसका असर पहले भी महसूस होता है और बाद में भी। युद्ध में सिर्फ सैनिक ही नहीं मरते, बल्कि वे भी हार जाते हैं जिन्हें अंत तक समझ ही नहीं आता कि यह सब क्यों हो रहा है। सच तो यह है कि युद्ध अपने पीछे केवल दर्द, डर और टूटे हुए सपने छोड़ जाता है।
टीवी चैनलों पर एक ही खबर बार-बार दोहराई जा रही थी-अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब भयानक युद्ध का रूप ले चुका है। खाड़ी क्षेत्र के शांत माने जाने वाले देशों में भी अचानक डर और अनिश्चितता का माहौल बन गया था। कुवैत, दुबई, बहरीन और मस्कट जैसे देशों में रोज़ी-रोटी की तलाश में आए लाखों भारतीयों की तरह हजारों राजस्थानी परिवार भी चिंता में डूब गए थे। राजस्थान के नागौर जिले के एक छोटे से गाँव में रहने वाला 21 वर्षीय आरिश भी इसी डर के बीच घिरा हुआ था।
आरिश, ओमान की राजधानी मस्कट के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष का छात्र था। वह सिर्फ एक छात्र नहीं था, बल्कि अपने परिवार की उम्मीदों का सहारा भी था। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, इसलिए पढ़ाई के साथ-साथ वह शाम को एक छोटे से कैफे में वेटर और क्लीनर का काम भी करता था। उसके पिता यूसुफ खान दुबई की तपती धूप में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में मजदूरी करते थे। उनका सपना था कि उनका बेटा पढ़-लिखकर इंजीनियर बने, ताकि उसे मजदूरी न करनी पड़े। गाँव में माँ सायरा बेगम और छोटी बहन आलिया हर दिन उसी उम्मीद में जीती थीं कि एक दिन आरिश पढ़ाई पूरी कर घर लौटेगा और उनका कच्चा घर पक्का बनवाएगा। लेकिन मार्च की उस मनहूस सुबह ने सब कुछ बदल दिया।
कैफे के काउंटर पर लगे टीवी पर जब आरिश ने आसमान से बरसते आग के गोले देखे, तो उसके हाथ से चाय का कप छूटकर जमीन पर गिर गया। कांच के टुकड़े बिखर गए। उसे लगा जैसे उसके सपने भी उन्हीं टुकड़ों की तरह टूट गए हों। सोशल मीडिया पर तरह-तरह की खबरें फैल रही थीं। कोई कह रहा था कि एयरपोर्ट के पास एक मिसाइल गिरी है। कहीं यह चर्चा थी कि समुद्री रास्ते बंद कर दिए गए हैं। मस्कट में बैठे आरिश के लिए ये खबरें केवल समाचार नहीं थीं, बल्कि उसके भविष्य पर मंडराता हुआ डर थीं। उसने घबराते हुए अपने पिता को दुबई फोन लगाया। कई बार नेटवर्क बिजी आया। आखिरकार कॉल लग गई। ‘अब्बू… वहाँ सब ठीक है ना? लोग कह रहे हैं कि दुबई पर भी खतरा है।’ आरिश की आवाज काँप रही थी।
फोन के उस पार कुछ पल खामोशी रही। फिर यूसुफ खान की थकी हुई आवाज आई- ‘बेटा, यहाँ बहुत अफरा-तफरी है। कंपनी ने काम बंद कर दिया है और हमें कैंप में रहने को कहा है। तुम बस अपनी हिफाजत करना।’
उधर नागौर के उस छोटे से घर में भी बेचैनी छाई हुई थी। सायरा बेगम सुबह उठते ही मोबाइल पर खबरें देखने लगी थीं। नमाज के बाद वह घंटों दुआ करतीं कि उनके बेटे और पति सुरक्षित रहें। एक दिन उन्होंने मोबाइल में रेडियो चलाया। खबर आ रही थी- ‘खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण युद्ध जैसे हालात बन गए हैं। आसमान में मंडराते खतरे और सायरनों की आवाजों के बीच आम लोग डर और अनिश्चितता में जी रहे हैं। हजारों प्रवासी अपने घर लौटने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।’ यह सुनकर सायरा बेगम की आँखें भर आईं। उस शाम गाँव के चबूतरे पर बैठी वह अपनी पड़ोसन से बोलीं- ‘एक बेटा मस्कट में फंसा है और उसके अब्बू दुबई में। अल्लाह जाने कैसी जंग है यह, जो सरहदों पर होकर भी हमारे घरों के चूल्हे बुझा रही है।’ पास ही खड़ी छोटी आलिया अपनी माँ का दुपट्टा पकड़कर मासूमियत से पूछने लगी- ‘अम्मी, ये जंग क्या होती है अम्मीजान ? जंग बुरी होती है क्या ? लोग आपस में लड़ते क्यों हैं? क्या भाईजान अब खिलौने लेकर नहीं आएंगे? क्या वो जंग में खो जाएंगे?’ आलिया ने प्रश्नों की जैसे झड़ी लगा दी थी। सायरा बेगम के पास आलिया के मासूम प्रश्नों का कोई जवाब नहीं था। उन्होंने बस उसे सीने से लगा लिया।
उधर मस्कट के कॉलेज हॉस्टल का माहौल भी बदल चुका था। जो गलियारे कभी हँसी-मजाक से भरे रहते थे, वहाँ अब जल्द-से-जल्द घर लौटने की बेचैनी थी। आरिश ने देखा कि अमीर देशों के छात्र चार्टर्ड विमानों से वापस बुलाए जा रहे थे। लेकिन उसके जैसे कई छात्र पैसे और साधनों की कमी के कारण वहीं फंसे हुए थे। तभी उसका दोस्त समीर घबराकर कमरे में आया। ‘आरिश, एयरपोर्ट पर हजारों लोगों की भीड़ है। अगर अभी नहीं निकले, तो शायद बाद में मौका ही न मिले।’ आरिश खिड़की से बाहर समुद्र की ओर देखने लगा। कुछ देर बाद बोला- ‘कैसे जाऊँ समीर? इस सेमेस्टर की फीस भर दी है। जेब में टिकट तक के पैसे भी नहीं हैं। और अब्बू दुबई में अकेले हैं… मैं यहाँ से चला गया तो उन्हें और चिंता होगी।’ कुछ पलों के लिए दोनों के बीच एक भारी सन्नाटा छा गया।
उस रात बिजली चली गई। अँधेरे में आरिश ने अपने पिता को वीडियो कॉल किया। स्क्रीन पर उनका चेहरा साफ नहीं दिख रहा था, लेकिन आँखों की चिंता साफ झलक रही थी।यूसुफ खान बोले- ‘बेटा, यहाँ कैंप के पास कल धमाका हुआ था। मुझे डर लगता है… पता नहीं हम फिर मिल पाएँगे या नहीं। तुम पढ़ाई की चिंता छोड़ो और किसी तरह घर पहुँच जाओ।’ आरिश ने खुद को संभालते हुए कहा-‘अब्बू, हिम्मत रखिए। अल्लाह की दुआओं से सब ठीक होगा।’ लेकिन वह भी जानता था कि यह दिलासा ही था, हकीकत नहीं।
उस रात वह हॉस्टल की छत पर जाकर खड़ा हो गया। दूर आसमान में तारे चमक रहे थे। उसे अचानक अपने गाँव की याद आने लगी-मिट्टी की खुशबू, माँ के हाथ की रोटियाँ और बहन की चुलबुली-सी हँसी। तभी उसे एहसास हुआ कि युद्ध की सबसे बड़ी त्रासदी मौत नहीं होती, बल्कि अपनों से दूर होने का वह दर्द होता है जो इंसान को भीतर से तोड़ देता है। उस दिन उसने अपनी डायरी में लिखा-‘युद्ध नक्शों पर सरहदें बदल देता है, लेकिन इंसानों के दिलों पर गहरे घाव छोड़ जाता है।’
इस कहानी का अंत किसी जीत या हार से नहीं हुआ।आरिश आज भी मस्कट की उस छत पर खड़ा आसमान देखता है। दुबई के एक कैंप में यूसुफ खान भी उसी चाँद को देखते होंगे। और शायद नागौर के उस छोटे से घर में सायरा बेगम भी उसी चाँद को देखकर अपने बेटे और पति की सलामती की दुआ कर रही होंगी। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। यह उन लाखों लोगों की कहानी है जिनकी जिंदगी के फैसले कहीं दूर सत्ता के गलियारों में लिए जाते हैं। युद्ध चाहे जहाँ भी हो, उसकी पीड़ा आखिरकार उन घरों तक पहुँच ही जाती है, जहाँ लोग रात भर चिराग जलाकर अपने प्रियजनों की सलामती की दुआ करते रहते हैं।
सुनील कुमार महला,
फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार,
पिथौरागढ़, उत्तराखंड




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