नेता इंतजार में बस एक फोन कॉल आ जाए : टिकट की दौड़ ने बढ़ाई सियासी सरगर्मी, हर गली-मोहल्ले में एक ही सवाल—किसे मिलेगा मौका?
नगर निगम चुनाव: टिकट की दौड़ ने बढ़ाई सियासी सरगर्मी, हर गली-मोहल्ले में एक ही सवाल—किसे मिलेगा मौका?
नगर निगम चुनाव के लिए उम्मीदवारी दाखिल करने की समय सीमा समाप्त होते ही शहर का राजनीतिक माहौल पूरी तरह गर्म हो चुका है। गली-नुक्कड़ों से लेकर चाय की दुकानों और घरों के ड्राइंग रूम तक हर जगह एक ही चर्चा सुनाई दे रही है—आखिर टिकट किसके नाम पर तय होगी? राजनीतिक गलियारों में हलचल इतनी तेज है कि नेताओं के समर्थकों से लेकर आम नागरिक तक इस सवाल का जवाब जानने को उत्सुक नजर आ रहे हैं।
स्थिति यह है कि पत्रकारों के फोन लगातार बज रहे हैं। दिनभर में कई बार नेताओं के समर्थक सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क कर अंदरूनी स्थिति जानने की कोशिश कर रहे हैं। हर कोई यह जानना चाहता है कि पार्टी के अंदर क्या चल रहा है, कहीं ऐसा तो नहीं कि बनी-बनाई रणनीति में बदलाव हो जाए और जो खुद को मजबूत दावेदार मान रहे हैं, उनकी उम्मीदों पर पानी फिर जाए।
“जनता से नहीं, इस समय नेताओं से मिलना ज्यादा जरूरी”
इस बीच एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस समय जनता से ज्यादा जरूरी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से संपर्क बनाए रखना है। उनका कहना था कि “जनता से तो मुलाकात टिकट मिलने के बाद भी की जा सकती है, फिलहाल तो नेताओं को अपना चेहरा दिखाते रहना ही सबसे अहम है।” हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि “जरूरत से ज्यादा सक्रियता भी नुकसानदेह हो सकती है, इसलिए संतुलन बनाकर चलना जरूरी है।”
आशीर्वाद की तलाश में धार्मिक स्थलों की ओर रुख
टिकट की इस जंग में कई दावेदार धार्मिक और आध्यात्मिक स्थलों की ओर भी रुख कर रहे हैं। भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों के कई नेता अपने-अपने गुरुओं और आस्था केंद्रों में जाकर आशीर्वाद ले रहे हैं। उनका मानना है कि गुरु या भगवान की कृपा से ही राजनीतिक राह आसान हो सकती है और टिकट सुनिश्चित हो सकती है।
हालांकि, इस प्रवृत्ति को लेकर समाज में अलग-अलग राय भी देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे आस्था और संस्कार से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कुछ इसे अंधविश्वास करार दे रहे हैं।

मेयर पद के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा
अगर मेयर पद की बात करें तो भाजपा में करीब दो दर्जन दावेदार मैदान में हैं, जो इस प्रतिष्ठित पद के लिए अपनी दावेदारी जता रहे हैं। वहीं कांग्रेस में भी एक दर्जन से अधिक नेता मेयर बनने का सपना संजोए हुए हैं। ऐसे में यह साफ है कि मुकाबला बेहद दिलचस्प और कड़ा होने वाला है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 22 या 23 अप्रैल तक तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकती है, जब पार्टियां अपने अधिकृत उम्मीदवारों की घोषणा करेंगी।
पार्षद पद पर भी जबरदस्त भीड़
पार्षद पद के लिए भी स्थिति कम दिलचस्प नहीं है। भाजपा में 200 से अधिक नामांकन दाखिल हो चुके हैं, जबकि कांग्रेस में भी लगभग इतनी ही संख्या में उम्मीदवार मैदान में हैं। अनुमान के मुताबिक हर वार्ड में दोनों प्रमुख दलों से औसतन पांच से अधिक दावेदार हैं, जिससे टिकट वितरण की प्रक्रिया और भी जटिल हो गई है।
वहीं, इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो), जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) और आम आदमी पार्टी (आप) भी इस चुनावी मैदान में सक्रिय हैं। इनेलो के नेताओं का दावा है कि उनके पास सभी 20 वार्डों में उम्मीदवार तैयार हैं और उन्हें बाहर से उम्मीदवार लाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। साथ ही उन्होंने अन्य दलों पर तंज कसते हुए कहा कि “उम्मीदवार एक्सपोर्ट करने की जरूरत उन पार्टियों को पड़ती है, जो सालभर मैदान में नजर नहीं आतीं।”
टिकट की एक कॉल का इंतजार
कुल मिलाकर इस समय सभी राजनीतिक दलों के दावेदार एक ही उम्मीद लगाए बैठे हैं—फोन की घंटी बजे या व्हाट्सएप पर संदेश आए और उन्हें चुनाव मैदान में उतरने का संकेत मिल जाए। कई नेता तो मजाक में यह भी कहते नजर आ रहे हैं कि “बस एक मैसेज आ जाए—कुर्ता सिलवा लीजिए, टिकट फाइनल है।”
फिलहाल, शहर की राजनीति में उत्सुकता चरम पर है और हर कोई अंतिम सूची का इंतजार कर रहा है, जो कई उम्मीदों को पंख देगी तो कई सपनों को अधूरा छोड़ देगी।




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