पीएम केयर्स फंड पर नहीं पूछ सकते कोई भी सवाल : लोकसभा सचिवालय को पीएमओ का कड़ा निर्देश
प्रधानमंत्री केयर्स फंड को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श तेज हो गया है। हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा लोकसभा सचिवालय को दिए गए निर्देशों के बाद यह मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ गया है। निर्देशों के अनुसार पीएम केयर्स फंड, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (पीएमएनआरएफ) और राष्ट्रीय रक्षा कोष (एनडीएफ) से जुड़े प्रश्न संसद में नहीं उठाए जा सकेंगे, क्योंकि सरकार के मुताबिक ये फंड सीधे तौर पर सरकारी नियंत्रण या जिम्मेदारी में नहीं आते।
इस फैसले के बाद सोशल मीडिया, राजनीतिक हलकों और नागरिक संगठनों में कई पुराने सवाल फिर से सामने आ गए हैं। आलोचकों का कहना है कि जब इन फंडों का नाम प्रधानमंत्री पद से जुड़ा है और इनके शीर्ष पदों पर प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री जैसे संवैधानिक पदाधिकारी हैं, तो इन्हें पूरी तरह ‘निजी’ कैसे माना जा सकता है। उनका तर्क है कि सरकारी कंपनियों और कर्मचारियों के योगदान, साथ ही कर छूट जैसी सुविधाएं, इन फंडों की प्रकृति को और जटिल बनाती हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, पीएम केयर्स फंड, पीएमएनआरएफ और एनडीएफ—तीनों को मिलाकर इन फंडों में हजारों करोड़ रुपये की राशि जमा बताई जाती है। आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं कि इतनी बड़ी सार्वजनिक धनराशि के उपयोग, ऑडिट और निर्णय प्रक्रिया पर संसद और नागरिकों की निगरानी क्यों सीमित है।
खासतौर पर यह मुद्दा इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि पीएमएनआरएफ पहले से मौजूद था, जिसकी कार्यप्रणाली और ऑडिट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराए जाते रहे हैं, जबकि पीएम केयर्स फंड को आरटीआई के दायरे से बाहर रखा गया है।
सरकार का पक्ष यह रहा है कि पीएम केयर्स फंड एक ट्रस्ट है और इसे आपदा प्रबंधन के लिए तेज और लचीला ढांचा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाया गया था। सरकार यह भी कहती रही है कि फंड का इस्तेमाल सार्वजनिक हित में किया गया है। हालांकि, आलोचक पारदर्शिता की कमी, सूचना तक सीमित पहुंच और संसदीय प्रश्नों पर रोक को लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए चिंताजनक मानते हैं।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि सार्वजनिक पद से जुड़े फंडों के मामले में पारदर्शिता की सीमा क्या होनी चाहिए और संसद व नागरिकों की निगरानी की भूमिका कितनी व्यापक होनी चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस असंतोष का कैसे जवाब देती है और क्या इन फंडों की कार्यप्रणाली को लेकर कोई स्पष्ट, भरोसेमंद व्यवस्था सामने आती है।




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