‘गलत हेयरकट’ पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 2 करोड़ से घटकर 25 लाख हुआ मुआवजा, सबूतों को लेकर सख्त टिप्पणी
एक लग्जरी होटल के सैलून में कथित ‘गलत हेयरकट’ से जुड़े बहुचर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए 2 करोड़ रुपये के मुआवजे को घटाकर 25 लाख रुपये कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता मामलों में क्षतिपूर्ति “ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य” के आधार पर तय की जानी चाहिए, न कि केवल दावों या अनुमान के आधार पर।
जस्टिस राजेश बिंदल की अगुवाई वाली पीठ ने 6 फरवरी को सुनाए गए फैसले में कहा कि सेवा में कमी (deficiency in service) सिद्ध होना एक पहलू है, लेकिन करोड़ों रुपये के हर्जाने के लिए वास्तविक नुकसान का ठोस प्रमाण अनिवार्य है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि क्षतिपूर्ति मनमाने तरीके से या केवल शिकायतकर्ता की इच्छा के अनुरूप तय नहीं की जा सकती।
फोटोकॉपी के आधार पर नहीं बनता करोड़ों का दावा
शीर्ष अदालत ने कहा कि जब दावा अत्यधिक राशि का हो, तो उसके समर्थन में मूल दस्तावेज और विश्वसनीय सामग्री प्रस्तुत करना आवश्यक है। केवल दस्तावेजों की फोटोकॉपी के आधार पर 2 करोड़ रुपये का मुआवजा देना न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि प्रस्तुत दस्तावेजों में विसंगतियां थीं और पुनर्विचार का अवसर मिलने के बावजूद इतने बड़े नुकसान को प्रमाणित नहीं किया जा सका।
अदालत ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के उस दृष्टिकोण पर भी आपत्ति जताई, जिसमें मानसिक आघात के कारण मूल दस्तावेज सुरक्षित न रख पाने की दलील को स्वीकार करते हुए फोटोकॉपी के आधार पर भारी मुआवजा बरकरार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे त्रुटिपूर्ण माना।
क्या था मामला?
मामला अप्रैल 2018 का है, जब एक मॉडल दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल स्थित सैलून में हेयरकट के लिए गई थीं। उनका आरोप था कि हेयर स्टाइलिस्ट ने निर्देश से कहीं अधिक छोटे बाल काट दिए, जिससे उन्हें मानसिक आघात पहुंचा और मॉडलिंग असाइनमेंट व करियर के अवसरों का नुकसान हुआ।
पहले चरण में NCDRC ने 2 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पुनर्मूल्यांकन के लिए वापस भेजा, लेकिन आयोग ने 2023 में फिर वही राशि बरकरार रखी। इसके बाद होटल कंपनी ने दोबारा शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया।
शीर्ष अदालत ने क्यों घटाया गया मुआवजा ?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह सेवा में कमी के निष्कर्ष में दखल नहीं दे रहा है, लेकिन मुआवजे की राशि तय करते समय प्रमाण का स्तर उच्च होना चाहिए। अंततः अदालत ने 2 करोड़ की राशि को घटाकर 25 लाख रुपये कर दिया।
यह फैसला उपभोक्ता विवादों में मुआवजे के निर्धारण के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। अदालत का संदेश साफ है—भावनात्मक तर्कों से नहीं, बल्कि पुख्ता सबूतों से तय होगा ।



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