फरवरी में ही चढ़ा पारा, क्या मार्च में दस्तक देगी भीषण गर्मी? विशेषज्ञों ने दी चेतावनी
आमतौर पर हल्की ठंड और सुहानी धूप के लिए पहचानी जाने वाली फरवरी इस बार उत्तर भारत में गर्म तेवर दिखा रही है। दिल्ली-एनसीआर समेत कई राज्यों में अधिकतम तापमान सामान्य से 5 से 8 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया है। कई इलाकों में पारा 30 डिग्री के पार पहुंच चुका है, जो आम तौर पर मार्च के आखिर या अप्रैल की शुरुआत में देखने को मिलता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है—क्या इस बार गर्मी मार्च में ही पूरी ताकत से दस्तक दे देगी?
क्यों बदले फरवरी के मिजाज?
पूर्व अपर महानिदेशक, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) डॉ. आनंद शर्मा के अनुसार, तापमान में यह असामान्य बढ़ोतरी किसी एक कारण का परिणाम नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग, स्थानीय मौसम प्रणालियों में बदलाव और पश्चिमी विक्षोभ की कमजोर सक्रियता मिलकर यह स्थिति बना रहे हैं।
उत्तर भारत में इस महीने पश्चिमी विक्षोभ अपेक्षित रूप से सक्रिय नहीं रहे। सामान्य तौर पर ये प्रणालियां बादल और हल्की बारिश लाकर तापमान को नियंत्रित रखती हैं, लेकिन इस बार साफ आसमान और तेज धूप ने दिन के तापमान को तेजी से बढ़ाया।
साथ ही, अल नीनो जैसी महासागरीय घटनाओं का प्रभाव भी माना जा रहा है, जो सर्दियों की तीव्रता को कम कर देती हैं। शहरी इलाकों में “हीट आइलैंड इफेक्ट” भी तापमान बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है—कंक्रीट का विस्तार, हरित क्षेत्र की कमी और वाहनों का उत्सर्जन गर्मी को और तीखा बना रहे हैं।
किन राज्यों में ज्यादा असर?
दिल्ली-एनसीआर, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फरवरी के शुरुआती और मध्य सप्ताह में पारा सामान्य से काफी ऊपर रहा। राजस्थान के कुछ जिलों में तापमान 32 से 34 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया। दिल्ली में भी औसत अधिकतम तापमान लगातार सामान्य से ऊपर बना हुआ है।
मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि यही रुझान जारी रहा तो मार्च के मध्य तक कई हिस्सों में तापमान 35 से 38 डिग्री तक पहुंच सकता है और हीटवेव की शुरुआत सामान्य से पहले हो सकती है।
किसानों और आमजन पर असर
फरवरी में बढ़ती गर्मी का असर सिर्फ असहज मौसम तक सीमित नहीं है। रबी फसलें—जैसे गेहूं, चना और सरसों—तापमान के प्रति संवेदनशील होती हैं। अधिक गर्मी से हीट स्ट्रेस बढ़ सकता है, जिससे पैदावार प्रभावित होने की आशंका है।\
स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी चेतावनी दे रहे हैं कि यदि गर्मी जल्दी और तीव्र रूप से आती है तो डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक और त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों में। बिजली और पानी की मांग भी समय से पहले बढ़ने की संभावना है।
गर्मी को लेकर क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम के पैटर्न में यह बदलाव अस्थायी नहीं, बल्कि व्यापक जलवायु परिवर्तन का संकेत है। शहरी क्षेत्रों में हरित आवरण बढ़ाने, जल संरक्षण को प्राथमिकता देने और हीट एक्शन प्लान तैयार करने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। किसानों के लिए समय पर वैज्ञानिक सलाह और फसल बीमा को भी अहम बताया गया है।
आम लोगों के लिए सलाह
विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि बढ़ती गर्मी को देखते हुए दिन में तेज धूप से बचें, पर्याप्त पानी पिएं, हल्के सूती कपड़े पहनें और घरों में वेंटिलेशन का ध्यान रखें। बच्चों और बुजुर्गों को विशेष रूप से गर्मी से बचाने की जरूरत है।
फरवरी में रिकॉर्ड तोड़ तापमान ने संकेत दे दिया है कि इस बार गर्मी सामान्य से पहले और ज्यादा तीखी हो सकती है। आने वाले सप्ताह मौसम की दिशा तय करेंगे, लेकिन फिलहाल इतना साफ है कि बदलते जलवायु संकेतों को नजरअंदाज करना अब संभव नहीं।



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