लिस्ट जारी होने के पहले संकेत : कुछ भाजपाई बन सकते हैं कांग्रेसी !
पंचकूला में बदले सियासी समीकरण, ‘उम्मीदवारों की तलाश’ के बीच दल-बदल की आहट
नगर निगम चुनावों से पहले राजनीतिक तस्वीर लगातार बदलती दिख रही है। ताज़ा संकेत बताते हैं कि कई वार्डों में उम्मीदवारों को लेकर जूझ रही कांग्रेस अब अपने दायरे से बाहर भी संभावनाएं तलाश रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी के भीतर टिकट को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा नए समीकरण बना रही है।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, कुछ वार्डों में कांग्रेस को “मजबूत और जीतने योग्य” चेहरे तलाशने में कठिनाई हो रही है। ऐसे में पार्टी की नजर उन भाजपा दावेदारों पर है जिन्हें टिकट मिलने की संभावना कम मानी जा रही है। बताया जा रहा है कि ऐसे नेताओं से अनौपचारिक स्तर पर संपर्क साधा जा रहा है, ताकि अंतिम समय में उन्हें कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतारा जा सके।
हालांकि कांग्रेस का दावा है कि उसके पास 200 से अधिक आवेदन आए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर समीकरण इतने सरल नहीं दिख रहे। पार्टी के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ पिछले प्रदर्शन को बनाए रखना और दूसरी तरफ इस बार मेयर पद पर कब्जा जमाने की कोशिश। इस बार विधायक और सांसद कांग्रेस की झोली में आने से और उसके बाद मजबूत संगठन होने से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल थोड़ा ऊंचा जरूर है । पर स्थानीय स्तर पर विधायक के पिछले डेढ़ साल के प्रदर्शन से कांग्रेस के अपने ही अंदरूनी तौर पर नाराज भी बताई जा रहे हैं ।

दूसरी ओर, भाजपा के भीतर टिकट को लेकर बढ़ती दावेदारी भी इस पूरी तस्वीर को प्रभावित कर रही है। कई वार्डों में एक से अधिक मजबूत दावेदार होने के कारण असंतोष की संभावना बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसे दावेदारों को टिकट नहीं मिलता, तो वे निर्दलीय या अन्य दलों के टिकट पर चुनाव लड़ने का विकल्प चुन सकते हैं।
यही वह बिंदु है जहां दोनों दलों के बीच अप्रत्यक्ष “क्रॉसओवर राजनीति” की संभावना बनती दिख रही है। यदि भाजपा के असंतुष्ट कार्यकर्ता कांग्रेस या अन्य मंचों से चुनाव मैदान में उतरते हैं, तो यह न केवल चुनावी समीकरण बदल सकता है, बल्कि वोटों के बंटवारे पर भी असर डाल सकता है।
सूत्रों का यह भी संकेत है कि कांग्रेस की अंतिम सूची जारी होने के बाद भी उम्मीदवारों में बदलाव से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में आने वाले दिनों में टिकट वितरण केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा बनकर सामने आ सकता है।
कुल मिलाकर, पंचकूला नगर निगम चुनाव इस बार केवल दलों के बीच मुकाबला नहीं, बल्कि दलों के भीतर की खींचतान और संभावित पुनर्संयोजन का भी मैदान बनते जा रहे हैं। अब नजर इस बात पर है कि अंतिम समय में कौन-सा दांव किस पार्टी को बढ़त दिलाता है।




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