खरी-अखरी : क्या सुप्रीम कोर्ट भी सत्ता से कंप्रोमाइज्ड हो गया है ?
क्या सुप्रीम कोर्ट भी सत्ता से कंप्रोमाइज्ड हो गया है ?
अगर देश के भीतर इलेक्शन कमीशन और सुप्रीम कोर्ट की साख ही नहीं बचेगी तो फिर डेमोक्रेसी के मतलब और मायने क्या होंगे ? अगर राजनीतिक सत्ता ने देश के हर उस संस्थान को अपने साथ खड़ा कर लिया है जिसका काम चैक एंड बैलेंस करना है तो फिर लोकतंत्र के मतलब और मायने क्या बचेंगे ? जब चैक एंड बैलेंस करने वाले संवैधानिक संस्थान ही विपक्ष की राजनीति को लेकर राजनीत करने लगेंगे तो फिर बचेगा क्या ? यह सवाल मौजूदा वक्त में इसलिए महत्वपूर्ण हो चलें हैं कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से विपक्ष के नेता को लेकर एक ऐसी टिप्पणी निकलकर सामने आई है जिससे ऐसा आभाष होता है कि राजनीतिक सत्ता समेत तमाम संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को चट कर जाने के बाद कुछ हद तक अपनी विश्वसनीयता को बचाये रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के जरिए विपक्ष की क्रेडिबिलटी को खत्म करने का खेल राजनीतिक सत्ता अपनी राजनीति की अंतिम लड़ाई लड़ने जा रही है। इस बात को इससे भी बल मिला जब खुद प्रधानमंत्री ने एनडीए संसदीय दल की बैठक में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का जिक्र अपनी राजनीति साधने के लिए किया। लगता तो यही है कि चल रही संसद को ना चलने देने के लिए पूरी व्यवस्था की जा रही है ताकि संसद के भीतर कोई गंभीर मुद्दा ना उभरने पाये क्योंकि इस समय विपक्ष के निशाने पर चुनाव आयोग की चुनावी प्रक्रिया है, चीन और चीन द्वारा हथियाई गई जमीन का जिक्र लगातार हो रहा है। ऐसे मौके पर सुप्रीम कोर्ट के जरिए राष्ट्रवाद की परिकल्पना को उभारने से यही मैसेज निकल कर आता है कि क्यों ना सामने वाले की साख को खत्म करने के लिए साख वाले को सामने खड़ा कर दिया जाय।
we have scene the announcement attending to mate of to new count in bhutancture of China part of jurisdiction of the so falt count fall in indias union territory of Ladakh we have never excited the illegal Chinese occupation of Indian territory in this area creation of new countries will nether have pay on India has long standing in consistent position regarding a sonity over the area an land legitimacy to China illegal and forcebal occupation of the say we have launch solid protest we the chaines side view diplomatic channels. यह भारत के विदेश मंत्रालय का व्यक्तव्य है चाइना की अनैतिक गतिविधियों को लेकर। इस दौर में जब देश के भीतर ना सिर्फ राजनीतिक तौर पर बल्कि लद्दाख के नागरिकों के भीतर भी सवाल उमड़ घुमड़ रहे हैं। जिसके बारे में देश की मीडिया रिपोर्ट्स, सेटेलाईट पिक्चर्स का जिक्र अंतरराष्ट्रीय तौर पर हो रहा है। मसलन वाशिंग्टन टाइम्स, टाइम मैग्जीन, न्यूयॉर्क टाइम्स पर छपी रिपोर्ट्स के साथ ही देश के भीतर फ्रंट लाइन मैग्जीन के भीतर छपी 16 पन्नों की रिपोर्ट, हिन्दू, टाइम्स आफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर छपी वह रिपोर्ट्स जो यह बताती है कि भारत की जमीन पर चीन ने कब – कहां – कैसे – किस तरीके से कितने क्षेत्रफल पर कब्जा किया हुआ है यानी राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय तौर पर भारत और चीन की झड़प अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मद्देनजर पूरी दुनिया में घुमड़ रही है, भारत के भीतर जो गलवान में हुआ, जो लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के भीतर होता रहा है। जिसकी नंगी हकीकत सेटेलाईट पिक्चर्स तक के जरिए निकलकर आई उसके बावजूद अगर सुप्रीम कोर्ट के जज सीधे तौर पर देश के विपक्ष के नेता से कहते हैं आप यह ठीक नहीं कर रहे हैं, यह तो देशप्रेम कतई नहीं है। यहां तक कि एक कदम आगे बढ़ते हुए कह रहे हैं कि आपको कैसे पता चला ? तो फिर सवाल सुप्रीम कोर्ट के जजेज के लिए भी खड़े होते हैं। तो क्या सुप्रीम कोर्ट को पता है ? तो क्या सुप्रीम कोर्ट में फैसला या फैसले की व्याख्या करते हुए जो जज बैठकर बोल रहे हैं क्या उन्हें जानकारी है ? राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय तौर पर जो चिंतन-मनन भारत तथा चीन के संबंध और भारत की सीमा के भीतर घुसे चीन को लेकर हो रहा है क्या इस बात की जानकारी भी उन जजेज के पास है या फिर जज जो सिर्फ और सिर्फ संविधान के मातहत जो व्याख्या करते हैं उसी को करने के लिए बैठना है उससे हटकर वह नहीं कहता है। तो क्या वाकई स्थिति गंभीर है ?
इसलिए कभी-कभी सुप्रीम कोर्ट के पन्नों को खोलना चाहिए। अगर यह पन्ने अगर भारत की राजनीति से जुड़े हुए हों तो ज्यादा सलीके से खोलने चाहिए। सवाल यह आकर खड़ा हो गया है इन पन्नों के भीतर यह भी दर्ज हो कि विपक्ष की भूमिका सत्ता को निशाने पर लेना और इसके बीच भारत युद्ध की परिस्थितियों में फंसा हुआ हो तब भी सुप्रीम कोर्ट ने कोई टिप्पणी क्यों नहीं की और इस वक्त सुप्रीम कोर्ट विपक्ष के नेता पर टिप्पणी क्यों कर रहा है ? 1962 में जब चीन ने भारत पर हमला किया था उस वक्त राममनोहर लोहिया के निशाने पर नेहरू की नीतियां थीं। सुप्रीम कोर्ट के भीतर भी सुनवाई हुई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने नेहरू की नीतियों को लेकर देश की सेना के स्वाभिमान पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं की थी। 1975 में इमर्जेंसी के दौर में तो स्थिति ज्यादा विकट और भयावह थी। जयप्रकाश नारायण के निशाने पर श्रीमती इंदिरा गांधी थी। जेपी ने तो देश के सैनिकों और पुलिसकर्मियों से यहां तक कह दिया था कि अगर सत्ता ही गफलत कर रही हो तो उन्हें सोचना चाहिए यानी जेपी का ऐलान सेना और पुलिस के लिए बगावत करने का था। श्रीमती इंदिरा गांधी ने जेपी की इस हरकत को राजद्रोह करार दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर भी पहुंचा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के बीच घुसने की हिम्मत नहीं की यानी उसने माना कि दरअसल उसका यह पैमाना नहीं है वह तो संविधान की व्याख्या करने के लिए बैठा है। मंडल-कमंडल की राजनीति के दौर में भी बहुतेरे मामले सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तब भी सुप्रीम कोर्ट ने ना तो मंडल पर और ना ही कमंडल पर कोई टिप्पणी की थी।
2002 में गुजरात के भीतर तथा 1984 में हुए सिक्खों के नरसंहार का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने तरीके से मामले की सुनवाई करी लेकिन उसने विपक्ष की राजनीति पर कोई राजनीतिक छींटाकशी नहीं की खासतौर पर विपक्ष के नेता को तो निशाने पर बिल्कुल भी नहीं लिया। मनमोहन सिंह के समय देश की सुरक्षा, देश की कूटनीति के मद्देनजर अमेरिका से होने वाली न्यूक्लियर डील को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया राजनीतिक तौर पर लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बैरंग लौटा दिया था। मनमोहन सिंह के कालखंड में भी सीबीआई के निशाने पर विपक्षी नेता हुआ करते थे तब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई पर टिप्पणी करते हुए उसे पिंजरे में बंद तोता कहा था। नरेन्द्र मोदी के चल रहे काल में ईडी को लेकर संसद के भीतर जो फैक्ट्स रखे गए, ईडी के दस्तावेज खुद बताते हैं कि उसने किस तरीके से विपक्षी नेताओं के खिलाफ कैसी कार्रवाईयां करी और जब मामला सुप्रीम कोर्ट के भीतर पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट तक ने माना कि कन्विक्शन रेट एक दो परसेंट से ज्यादा नहीं है। ईडी ने बकायदा 125 पालिटीशियंस की सूची सुप्रीम कोर्ट को सौंपी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष और सत्तापक्ष को लेकर कोई टीका-टिप्पणी नहीं की। यानी सुप्रीम कोर्ट ने ईडी, सीबीआई, आईटी को लेकर राजनीतिक तौर पर कोई भी छींटाकशी नहीं की और तो और सीडब्लूजी तथा सीएजी को लेकर भी राजनीतिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया। कैग की रिपोर्ट पर भी की गई टिप्पणी में राजनीतिक तौर पर कभी किसी नेता को निशाने पर नहीं लिया सुप्रीम कोर्ट ने। सीबीसी जो इस देश की नौकरशाही को तय करती है उस पर कोई पालिटीशियन निशाने पर नहीं आया।
इलेक्टोरल बांड्स को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध और असंवैधानिक बसूली करार दे दिया फिर भी राजनीतिक तौर पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं की गई। इतना ही नहीं महाराष्ट्र में जब शिवसेना को तोड़ कर बीजेपी मिश्रित सरकार बनाई गई और मामला जब सुप्रीम कोर्ट के भीतर पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते वक्त यह माना कि महाराष्ट्र के राज्यपाल असंवैधानिक तरीके से काम कर रहे थे, राजभवन राजनीतिक तौर पर सक्रिय था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने किसी नेता का नाम लेकर यह नहीं कहा कि वह राजनीतिक सक्रियता के साथ जुड़ा हुआ है। उसने सिर्फ संवैधानिक व्यवस्था के मातहत चीजों को बतलाया था। महाराष्ट्र में शिवसेना का टूटना, सत्ता के लिए मध्यप्रदेश, गोवा, उत्तराखंड, कर्नाटक के भीतर विधायकों की खरीद-फरोख्त का मामला भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा लेकिन उस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने टीका-टिप्पणी राजनीतिक तौर पर नहीं की है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले किस तरह से राजनीतिक सत्ता को परेशान करते हैं और राजनीतिक सत्ता किस तरीके से सुप्रीम कोर्ट को ही निशाने पर लेती है इसका नजारा भी बखूबी इसी राजनीतिक सत्ता के दौरान सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान से ऊपर कोई नहीं है तब बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे ने खुलकर कहा कि सीजेआई देश में दंगा फैला रहे हैं इतना ही नहीं देश के दूसरे नंबर के संवैधानिक पद पर बैठे हुए उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी सुप्रीम कोर्ट को निशाने पर लेने से चूके नहीं । उन्होंने ने भी खुले तौर पर कहा था कि संसद से ज्यादा ताकत सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं है। संविधान बाद में आता है, कानून संसद बनाती है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने किसी राजनेता को निशाने पर नहीं लिया।
2018 में जनवरी महीने की 12 तारीख शुक्रवार का दिन सुप्रीम कोर्ट और भारत के इतिहास का वह पन्ना है जिसमें स्वर्ण अक्षरों से नहीं बल्कि स्वर्ण पन्ने पर काले अक्षरों से लिखा जा चुका है जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजेज जस्ती चलमलेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर, कुरियन जोसेफ ने संयुक्त रूप से कोर्ट परिसर में प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर सीजेआई दीपक मिश्रा की कार्यप्रणाली को निशाने पर लेते हुए कहा था कि लोकतंत्र खतरे में है। उन्हीं में से एक जज रंजन गोगोई जिन पर एक महिला ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाये थे और उन्होंने खुद ही अपनी जांच कर खुद को पाक-साफ होने का फैसला सुनाकर एक नया इतिहास लिख दिया और आगे चलकर सीजेआई बने तथा सीजेआई पद से रिटायर्मेंट के चंद महीने के भीतर ही राजनीतिक सत्ता द्वारा उन्हें राज्यसभा सदस्य के रूप में नामिनेट कर दिया गया। रंजन गोगोई को लेकर ही देश के भीतर सवालों का बवंडर खड़ा होने लगा कि सुप्रीम कोर्ट क्या सत्ता के ईशारे पर काम करता है ? देश के भीतर सुप्रीम कोर्ट को लेकर तमाम सवाल खड़े होते चले गए। इसके बावजूद भी सुप्रीम कोर्ट ने कभी भी नेता प्रतिपक्ष की देशभक्ति को लेकर सवाल खड़ा नहीं किया। उसने कभी यह तय नहीं किया कि नेता प्रतिपक्ष को कौन से सवाल उठाने चाहिए ? इतना तो लगभग लगभग तय हो चुका है कि देश के भीतर जितने भी इंस्टिट्यूशनंस, कांस्टिटूशनल इंस्टिट्यूशनंस काम कर रहे हैं उनकी क्रेडिबिलटी खत्म हो चुकी है। फिर चाहे वह मीडिया हो और चुनाव आयोग ही क्यों ना हो।
लोकतंत्र के चार पायों के भीतर अगर कोई थोड़ा बहुत क्रेडिबिलटी वाला पाया बचा है तो वह है ले दे के सुप्रीम कोर्ट। जो संविधान की व्याख्या करता है लेकिन जब वहां से भी पाॅलिटिकल आवाज आने लगे तो समझ जाना चाहिए कि संकट बहुत बड़ा है और इस संकट की राजनीतिक जमीन देश की राजनीतिक सत्ता के हिस्से में आकर खड़ी हो गई है। शायद इसीलिए सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक आवाज़ में यह तय करने की भूमिका में आने लगा है कि कौन सच्चा भारतीय है कौन नहीं है ? जबकि यह तय करना सुप्रीम कोर्ट के दायरे से बाहर है। तो सवाल यही है कि आज ऐसा क्या हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट के जज लीडर आफ अपोजीशन को निशाने पर लेकर न्यायिक भाषा के दायरे से निकल कर राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल करने लगे हैं। क्या इस दौर में राजनीतिक तौर पर सत्ता यह मानकर चलने लगी है कि वही देश है। भले ही वर्तमान सत्ताधारी अपने 2015 वाले प्रयास में सफल ना हो पाया हो लेकिन जिस तरह से एक विशेष विचारधारा से ग्रसित जजेज सुप्रीम कोर्ट के भीतर आ रहे हैं तो क्या इसीलिए सुप्रीम कोर्ट से राजनीतिक सत्तानुकूल फैसले आ रहे हैं ? सुप्रीम कोर्ट से सत्तानुकूल आने वाले फैसलों का ही प्रभाव कहा जाना चाहिए कि वर्तमान दौर में डेमोक्रेसी की परिभाषा ही बदल दी गई है। लोकतंत्र का मतलब चुनाव हो गया है, चुनाव का मतलब चुनाव आयोग की निगरानी है और चुनाव आयोग सत्तानुकूल हो गया है। इसका खुला नजारा महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली से होते हुए बिहार में देखने को मिला ! तो फिर बचेगा क्या और बचा क्या ?
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार




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