विदेशी आरोपियों की बेल पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: क्या भारत में आएंगे ‘पेशेवर जमानतदार’?
मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में जमानत पर रिहा होने के बाद विदेशी आरोपियों के फरार होने की घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारत में लाइसेंस प्राप्त “पेशेवर जमानतदार” (Professional Bail Bondsmen) की व्यवस्था पर विचार शुरू किया है। अदालत इस बात पर मंथन कर रही है कि क्या एक औपचारिक और नियंत्रित तंत्र बनाया जाए, जो जमानत मिलने के बाद आरोपी की अदालत में मौजूदगी सुनिश्चित कर सके।
यह मुद्दा एक एनडीपीएस मामले की सुनवाई के दौरान उठा, जिसमें एक विदेशी नागरिक जमानत पर रिहा होने के बाद फरार हो गया। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ए. जी. मसीह की पीठ कर रही है।
अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी सिद्धार्थ लूथरा से ऐसा तंत्र सुझाने को कहा, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि जमानत पर छूटे आरोपी मुकदमे के दौरान उपलब्ध रहें।
DRI के सुझावों पर तैयार मसौदा
एमिकस क्यूरी ने राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) के सुझावों के आधार पर पेशेवर जमानतदारों के लिए एक प्रारूप तैयार कर अदालत में पेश किया है। यह मसौदा सर्वोच्च अदालत की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है और संबंधित पक्षों व आमजन से सुझाव आमंत्रित किए गए हैं।
प्रस्तावित नियम फिलहाल केवल उन विदेशी नागरिकों पर लागू करने का विचार है, जिन पर एनडीपीएस कानून के तहत वाणिज्यिक मात्रा (commercial quantity) से जुड़े अपराधों में मुकदमा चल रहा है।
कौन बन सकता है जमानतदार ?
मसौदे के अनुसार, व्यक्ति या पंजीकृत व्यावसायिक संस्थाएं लाइसेंस लेकर पेशेवर जमानतदार बन सकती हैं। कोई भी जमानत बांड केवल लाइसेंस प्राप्त जमानतदार के माध्यम से ही जारी किया जाएगा।
हालांकि, पुलिस अधिकारी, जेल अधिकारी, न्यायिक अधिकारी, न्यायालय कर्मचारी, अधिवक्ता एवं उनके स्टाफ, और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को इस भूमिका से अयोग्य घोषित करने का प्रस्ताव है।
जमानतदार की जिम्मेदारी तय
प्रस्तावित नियमों के तहत जमानतदार की स्पष्ट जिम्मेदारी होगी कि वह अभियुक्त की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करे, जमानत की शर्तों के पालन पर नजर रखे और किसी भी उल्लंघन की स्थिति में तुरंत अदालत व जांच एजेंसी को सूचित करे।
साथ ही, अदालत को यह अधिकार देने का सुझाव है कि विदेशी आरोपियों को जमानत देते समय पासपोर्ट जमा कराने, यात्रा पर प्रतिबंध लगाने और अन्य निगरानी शर्तें अनिवार्य की जा सकें।
क्यों जरूरी समझा जा रहा है कदम?
एनडीपीएस मामलों में कठोर सजा और लंबी न्यायिक प्रक्रिया के चलते कई बार विदेशी आरोपी जमानत मिलने के बाद देश छोड़ देते हैं या लापता हो जाते हैं, जिससे मुकदमे की सुनवाई प्रभावित होती है। सुप्रीम कोर्ट अब ऐसे मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत व्यवस्था की संभावना तलाश रहा है।
यदि यह तंत्र लागू होता है, तो भारत में पहली बार पेशेवर जमानतदारों की औपचारिक प्रणाली अस्तित्व में आ सकती है—जो आपराधिक न्याय व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।




Leave a Reply
Want to join the discussion?Feel free to contribute!