खरी-अखरी : बात शह – मात के खेल से आगे निकल कर भारत को बरसों पीछे ले जाने की सोच में तब्दील हो चुकी है !
बात शह – मात के खेल से आगे निकल कर भारत को बरसों पीछे ले जाने की सोच में तब्दील हो चुकी है !
दुनिया जिक्र कर रही है सेमीकंडक्टर का। दुनिया जिक्र कर रही है रोबोटिक्स का। दुनिया जिक्र कर रही है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए आने वाले उस मानवीय पहलुओं पर होने वाले संकट का। भारतीय मौजूदा राजनीतिक सत्ता तैयार है अपने श्रमिकों, मजदूरों, इंफ्रास्ट्रक्चर, बाजार, पूंजी तथा देश के भीतर कार्पोरेट को पहुंचाने वाले लाभ को लेकर यानी वह सब कुछ देने के लिए तैयार है लेकिन शर्त एक ही है हमारी सत्ता डिगनी नहीं चाहिए और इस परिस्थिति में उस कुर्सी को पीछे से टेका लगाये हुए है नौकरशाही, जजेज, सम्पादक, पैसे वाले। तो कौन चाहेगा कि सब कुछ डगमगा जाए या फिर नियम कायदे कानून के तहत हर किसी को एक बार परखा जाए। तो क्या इंतहां हो चुकी है और इसीलिए एक ऐसी परिस्थिति में देश आकर खड़ा हो गया है जहां साख बननी थी रेड कार्पेट के जरिए बहुत सारी चीजों को छुपाकर आने वाले समय के लिए कुछ चीजों को खड़ा करने की भले ही वह प्रोपेगेंडा के रूप में ही क्यों ना हो लेकिन उसी रेड कार्पेट को उखाड़ दिया गया जिसके तले एप्स्टिन फाइल को छिपाया जा रहा है, जिसके नीचे ट्रेड डील को छुपाया जा रहा है, देश के भीतर खत्म होते हुए संविधान प्रदत्त ताकत को हाशिये पर धकेला जा रहा है। जिस रेड कार्पेट को बिछा रहना चाहिए उसी को उखाड़ दिया गया है।
मौजूदा सियासी हालातों ने देश को उस मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां दुनिया टकटकी लगाकर भारत के भीतर होने वाले हर घटनाक्रम को बखूबी देख रही है। उसका संदेशा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसे और किस रूप में जा रहा है और दुनिया की तमाम ताकतें भारत को खोखला बनाना चाहती हैं। मौजूदा राजनीतिक सियासत अपने हितों को साधने के लिए समर्पण करने को तैयार है। इन परिस्थितियों के बीच भारत में संवैधानिक संकट भी खड़ा है यानी चैक एंड बैलेंस करने की भूमिका निबाहने वाले कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका, मीडिया सभी गांधी के तीन बंदरों में तब्दील हो गये हैं तो फिर देश की राजनीति उस चौराहे पर आकर खड़ी हो गई है जहां पर सब कुछ उखाड़ कर रख देना है। यह सिर्फ और सिर्फ शह – मात भर का खेल नहीं है। यह भारत को बरसों पीछे ले जाने की सोच और परिस्थितियां हैं। दोबारा भारत कब, कैसे, किस रूप में खड़ा हो पायेगा जिसे लेकर प्रोफेशनल्स, पढ़े लिखे नौजवानों, जिंदगी जीने के लिए न्यूनतम जरूरतों की लड़ाई लड़ने वालों के भीतर भी इस बात को लेकर संघर्ष चल रहा है कि आखिर हम खड़े कहां पर हैं ?
एप्स्टिन फाइल के आधार पर दुनिया भर के भीतर गिरफ्तारी भी शुरू हो गई है। ब्रिटेन में किंग चार्ल्स के छोटे भाई एंडूस माउंटबेटन विंडसर को अपने पद का दुरुपयोग करने और पीड़िता वर्जिनया ग्रेफेने द्वारा लगाए गए आरोप के तहत गिरफ्तार किया गया है। दुबई के भीतर 6 महाद्वीप में पोर्ट और लाजिस्टिक का काम करने वाले वैश्विक पोर्ट आपरेटर यानी डी पी वर्ल्ड के चेयरमैन और सीईओ सुल्तान अहमद बिन सुलेमान को एप्स्टिन फाइल में नाम आने के कारण अपने पद से इस्तीफा देना पड़ गया। एप्स्टिन फाइल में ही भारत के एक कैबिनेट मिनिस्टर मिस्टर हरदीप पुरी का नाम एक दो बार नहीं बल्कि दर्जनों बार आया है। हर मेल का जिक्र है। यहां तक कि एप्स्टिन फाइल में किसी ना किसी रूप में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम का भी जिक्र है। एप्स्टिन फाइल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर जिस बात का जिक्र है उसमें इतना तो स्वीकार कर लिया गया है कि वे इजराइल गये थे। लेकिन भारत में ना तो अभी तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुर्सी छोड़ी है ना ही कैबिनेट मिनिस्टर हरदीप पुरी से इस्तीफा लिया गया है। एप्स्टिन फाइल को लेकर मोदी सरकार ने पूरी तरह से खामोशी बरती हुई है। तो क्या दिल्ली के प्रगति मैदान यानी भारत मंडपम में जो घटनाक्रम घटित हुआ उसने वहां पर बिछाए गए उस रेड कार्पेट को उखाड़ कर वह सब कुछ सामने ला दिया है जिसके नीचे एप्स्टिन फाइल और अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील की नग्न हकीकत को छुपाया जा रहा था।
भारत के भीतर पहली बार किसी नेता का उसी एप्स्टिन फाइल में आया है जिसके आधार पर दुनिया भर में गिरफ्तारियां हो रही हैं। शासनाध्यक्ष थरथर कांप रहे हैं कि कहीं उनका नाम ना निकल जाए उस एप्स्टिन की फाइल में जिसकी पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यौन शोषण वह भी बाल यौन शोषण करने वाले गिरोह के तौर पर है। भारत की भीतरी आर्थिक परिस्थितियों के बीच देश के दुनिया भर के दूसरे देशों से सौदे होने हैं और हो रहे हैं। उनको लेकर भी सवाल हैं। वो कैसे सौदे हो रहे हैं जिनका अधिकतम लाभ भारत को नहीं मिल रहा है ? भारत के किसानों को लाभ नहीं मिल रहा है ? भारत की एनर्जी को लाभ नहीं मिल रहा है ? और तो और जब इस तरह की ट्रेड डील में भारत की स्वतंत्रता और सम्प्रभुता का सवाल भी उठने लगा है तो कौन नहीं बिछाना चाहेगा रेड कार्पेट और कौन उठाना चाहेगा रेड कार्पेट ? और जो शख्स देश के करोड़ों लोगों की तरफ से लगातार सरकार से सवाल पर सवाल पूछ रहा है उसको जवाब देने के बजाय सरकार और सत्ताधारी पार्टी की पूरी की पूरी फौज देशद्रोही, गद्दार कहने लग जाए, यहां तक कि सत्ताधारी दल के नेता की तस्वीर के साथ दिखाई देने वाला एक शख्स गोली मार देने की धमकी दे और पूरी सरकार आंख कान मुंह बंद करके बैठ जाए इससे बड़ा दुर्भाग्य देश के लिए कोई दूसरा हो नहीं सकता है। तब यह सवाल गंभीर हो जाता है कि रेड कार्पेट के जरिए उस साख को बचाने की कोशिश की जा रही थी जो किसी एक शख्स की नहीं बल्कि एप्स्टिन फाइल और ट्रेड डील के जरिए देश की साख पर कालिख पुत गई है।
दिल्ली में आयोजित किए गए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समिट में दूसरे देश (चाइना) के प्रोडक्ट को अपना बता कर रही सही साख पर ना मिटने वाला एक और काला धब्बा चस्पा कर दिया गया है। इसी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समिट के भीतर अमेरिकी राजदूत ने एक तरीके से विपक्ष के नेता की इस टिप्पणी को कि प्रधानमंत्री काॅंम्प्रोमाइज्ड हैं यानी प्रधानमंत्री ने अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है पर मोहर लगा दी है यह कहकर कि भारत को अब रशिया से तेल नहीं खरीदना होगा क्योंकि अमेरिका नहीं चाहता है। विपक्ष के नेता ने देशवासियों की ओर से मोदी गवर्नमेंट से अमेरिका के साथ की गई ट्रेड डील पर यह कहते हुए कि यूएस ट्रेड डील के नाम पर हम भारत के किसानों के साथ विश्वासघात होते हुए देख रहे हैं पांच सवाल भी पूछे हैं। मैं प्रधानमंत्री से कुछ आसान सवाल पूछना चाहता हूं। (1) डीडीजी इंपोर्ट करने का वास्तव में क्या मतलब है ? क्या इसका मतलब यह है कि भारतीय मवेशियों को जीएम अमेरिकी मक्का से बने डिस्टीलाइजर ग्रेन खिलाए जायेंगे ? क्या इससे हमारे दूध उत्पाद प्रभावी रूप से अमेरिकी कृषि उद्योग पर निर्भर नहीं हो जायेंगे ? (2) अगर हम जीएम सोया तेल के आयात की अनुमति देते हैं तो मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और देशभर के हमारे सोया किसानों का क्या होगा ? वे एक और कीमतों का झटका कैसे झेल पायेंगे ? (3) जब आप एडीशनल प्रोडक्ट्स कहते हैं तो उसमें क्या – क्या शामिल है ? क्या यह समय के साथ दाल और अन्य फसलों को अमेरिकी आयात के लिए खोलने के दबाव का संकेत है ? (4) नन ट्रेड बैरियर्स हटाने का क्या मतलब है ? क्या भविष्य में भारत पर जीएम फसलों पर अपने रुख को ढीला करने प्रोक्योरमेंट को कमजोर करने या एमपीएस और बोनसेस को कम करने का दबाव डाला जायेगा ? (5) एक बार यह दरवाज़ा खुल गया तो हर साल इसे और ज्यादा खुलने से हम कैसे रोक पायेंगे ? क्या इसकी रोकथाम होगी या हर बार सौदे में धीरे – धीरे और भी फसलों को मेज पर रख दिया जायेगा ? किसानों को ये सफाई तो मिलना ही चाहिए। यह सिर्फ आज की बात नहीं है। ये भविष्य की बात है। क्या हम किसी दूसरे देश को भारत के कृषि उद्योग पर लंबे समय की पकड़ बनने दे रहे हैं ?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भी विपक्ष के नेता ने सवाल पूछा है कि क्या भारत एक डाटा काॅलोनी में तब्दील हो रहा है ? वही डाटा जिसे एआई समिट में सबसे प्रमुख माना गया है। दुनिया के प्रोफेशनल्स से जब यह सवाल पूछा गया कि जितना डाटा भारत के पास है क्या उतना ही डाटा अमेरिका के पास है, चाइना के पास है या उसी रूप में दुनिया के तमाम विकसित देशों के पास है ? इस एआई समिट में प्रोफेशनल्स के जरिए यह माना गया कि इस मामले में भारत कमजोर है। भारत के पास अपना डाटा सुरक्षित रखने की जगह ही नहीं है। उसके लिए जितनी एनर्जी चाहिए वह भारत के पास है ही नहीं। दुनिया भर के डाटा में 20 प्रतिशत डाटा भारत का होता है लेकिन भारत सिर्फ अपना 3 फीसदी डाटा रख सकता है। जिसके पास डाटा होगा उसी के हिसाब से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आने वाले समय में उस देश के लिए पालिसी को किस – किस प्रोडक्ट के जरिए और किन – किन पालिसी और प्रोडक्ट के बाद गवर्नेंस को लेकर वह प्रभावित कर सकता है शायद यह डाटा के जरिए तय होगा। तो भारत एक खुला बाजार है जहां पर हर सामान बेचने के लिए सरकार तैयार है और भारत का डाटा फ्री में अमेरिकी डील के तहत अमेरिका को दिया जायेगा।
इस सवाल को उठाते ही सरकार और बीजेपी की पूरी की पूरी ट्रोल आर्मी विपक्ष के नेता को निशाने पर लेते हुए देशद्रोही, गद्दार जैसे शब्दों की बौछार करने लगी। फिर वो चाहे किरण रिजुजू हों या पीयूष गोयल, शिवराज सिंह चौहान । Now few minutes back I saw worry radiculus proposition that the leader of opposition mister Rahul Gandhi who probably doesn’t get an audience any were else other than the twitter X handle make a comment that India. India has committed to buy 100 billion dollar every year from the US without a counter commitment from the US. ये कामर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल कह रहे हैं। जहां कामर्स मिनिस्टर देश की अपेक्षाओं को पूरा करने की बात कह रहे हैं वहीं विपक्ष का नेता अमेरिकी डील को देश के व्यापारियों और किसानों को होने वाले दीर्घकालीन नुकसान की बात कहता है। जहां कामर्स मिनिस्टर 50 से 18 फीसदी टेरिफ पर सरकार की पीठ ठोंक रहे हैं वहीं लीडर आफ अपोजीशन 2-3 फीसदी की जगह 18 फीसदी टैक्स देने की बात बता रहे हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समिट के अंतिम दिन यूथ कांग्रेस के चंद मेम्बरान ने जिस तरह से आयोजन स्थल पर देश की उस राजनीतिक साख और देश के भीतर देश को ही बेचने की परिस्थिति और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जो अपराध हुए उसे छुपाने के लिए बिछाई गई रेड कार्पेट को उधाड़ते हुए प्रदर्शन करके अपनी गिरफ्तारी दी उसने भारत सरकार के गृह मंत्रालय या कहें गृहमंत्री अमित शाह को कटघरे में खड़ा कर दिया है ! यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदयभानु चिब ने कहा कि जब भी देश के युवाओं के ऊपर बेरोजगारी का संकट आया पिछले 12 सालों में या कोई भी संकट देश पर आया तो एक डायवर्जन करने के लिए इवेंट्स हो जाते हैं। डिमोनोटाइजेशन, जी-20 समिट, मेक इन इंडिया और अब यह एआई समिट। बीजेपी या मोदी जी को शायद लगता है जब देश के इश्यूज को साल्व नहीं कर सकते या उस पर ध्यान नहीं दे सकते तो एक इवेंट कराकर डायवर्ट कर दिया जाय। इवेंट करके भाग नहीं सकते। आज का मुद्दा बेरोजगारी का है। आज का मुद्दा यह है कि ट्रेड डील करके आपने देश के किसानों का नुकसान किया है। देश के लोगों का नुकसान किया है। अमेरिका को फायदा दिया है। यह क्यों किया है? क्या कारण हैं? यानी वह कह रहे हैं कि देश के भीतर होने वाला हर अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम देश की हकीकत को छुपाने के लिए किया जाता है।
जब रेड कार्पेट बिछाई जाती है तो उस पर कोई भी दाग अच्छा नहीं लगता है और अगर कोई दाग लग जाए तो उसे मिटाने की भरसक कोशिश की जाती है। यह रेड कार्पेट दुनिया के नामचीन और सबसे प्रमुख लोगों के लिए बिछाया जाता है जिस पर चलते हुए उन्हें सुकून महसूस हो। कभी – कभी रेड कार्पेट इसलिए भी बिछा दिया जाता है कि वहां की जमीन पोपली होती है, गंदी होती है जिससे उसके नीचे के हालात पर किसी की नजर ना पड़ जाए। लेकिन अगर कोई जमीन की हकीकत को दिखाने के लिए उस रेड कार्पेट को ही उठा दे तो क्या महसूस करेगी वो शख्सियतें जिनके लिए बिछाया गया था वह रेड कार्पेट ?
बीजेपी कह रही है जब भारत ग्लोबल एआई समिट की मेजबानी कर रहा है और अपनी टेक्नोलॉजी लीडरशिप को दिखा रहा है तब कांग्रेस ने गरिमा के बजाय डिसरप्शन चुना। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने टाॅपलेस होकर वेन्यू पर हंगामा किया। यह भारत को दुनिया के सामने शर्मिंदा करने की शाजिस है। जहां तक शर्टलेश विरोध प्रदर्शन की बात है तो 22 सितम्बर 2013 को हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार के खिलाफ अंबाला में अनिल विज की अगुवाई में बीजेपी ने अर्धनग्न रोष मार्च निकाला था। 18 मई 2015 को साउथ कोरिया के शहर सियोल में भारत की सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठे हुए व्यक्ति ने कहा था “एक समय था जब लोग कहते थे यार पता नहीं पिछले जन्म में क्या पाप किया था कि हिन्दुस्तान में पैदा हुए। ये कोई देश है, ये कोई सरकार है, ये कोई लोग हैं चलो छोड़ो चले जायेगे हम। हम ये भी देखते थे कि उद्योग जगत के लोग बोलते थे अब तो यहां व्यापार नहीं करना है, अब यहां नहीं रहना है। सवाल है कि क्या यह बयान जो विदेशी जमीन पर सत्ता प्रमुख ने दिया वह देश का मान बढ़ाने वाला था ? यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने तो प्रदर्शन देश की सरजमीं पर किया है। हकीकत यह है कि सियासत के हमाम में सभी नंगे हैं। इसी बीजेपी के एक नेता थे अटलबिहारी बाजपेई जब उनसे विदेश दौरे के दौरान भारत की तत्कालीन सरकार के बारे में सवाल किया गया था तो उनका जवाब था “भारत की सरकार पर जो बोलूंगा वो भारत जाकर ही बोलूंगा विदेशी जमीन पर नहीं”।
वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार ने ट्यूट किया है “प्रदर्शन करना एक वैध लोकतांत्रिक अधिकार और प्रक्रिया है। दुनिया भर में बड़े आयोजनों के सामने प्रदर्शन होते हैं। जिस संयुक्त राष्ट्र में लोग केवल हिंदी में भाषण देकर हेडलाइन में छा जाते हैं उस संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय के बाहर लगातार प्रदर्शन होते रहते हैं। जिन देशों को इससे हैरानी होती है वो मूर्ख हैं और उनके यहां प्रदर्शनों को बुरा माना जाता होगा। बदनामी प्रदर्शन से नहीं हुई है बदनामी हुई है खराब आयोजन से। गलगोटिया से। झूठ बोलने से। उन कंपनियों का विरोध करना अपने आप में प्रदर्शन करना है अगर देश का मीडिया प्रदर्शनों को देश की छबि से जोड़ने लग जाए तो इसका मतलब है वह मीडिया नहीं है। वह उस प्रोजेक्ट का हिस्सा है जिसके जरिए लोकतंत्र को खत्म कर दिया जाता है”।
क्या बीजेपी द्वारा कांग्रेस के शर्टलेश प्रोटेस्ट पर सवाल उठाना गलगोटिया कांड से दुनिया भर में हुई किरकिरी, बदनामी को ढकने की कोशिश है ?
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार




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