कुंडली नहीं, अब क्रेडिट स्कोर मिलाइए!
प्रश्न अगर यह हो “गुण कितने मिले?” तो यह भी हो कि ” क्रेडिट स्कोर कितना है?”
भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन माना जाता है। परंपरागत रूप से शादी से पहले गुण–मिलान और कुंडली का विशेष महत्व रहा है। लेकिन बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या केवल ज्योतिषीय अनुकूलता पर्याप्त है, या आर्थिक पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक हो चुकी है।
बदलती प्राथमिकताएँ, बदलता समाज
आज अधिकांश परिवार अपनी बेटियों और बेटों के लिए शिक्षित, शहरी और अच्छी नौकरी वाले जीवनसाथी की तलाश करते हैं। छोटे कस्बों से महानगरों की ओर बढ़ते युवाओं की नई पीढ़ी, जिसे प्रचलित भाषा में जेन-Z कहा जाता है, कॉरपोरेट संस्कृति और उपभोक्तावादी जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी है।
विभिन्न वित्तीय सर्वेक्षणों और बैंकिंग आँकड़ों के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में कार्यरत 25–35 आयु वर्ग के युवाओं में व्यक्तिगत ऋण, क्रेडिट कार्ड बकाया और उपभोक्ता लोन तेजी से बढ़े हैं। अनुमान है कि मध्यम वेतन वर्ग (30,000 से 50,000 रुपये मासिक आय) के कई युवाओं पर 35 से 70 लाख रुपये तक के संयुक्त दायित्व—होम लोन, वाहन लोन, पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड बकाया—हो सकते हैं।
यह स्थिति केवल आय से नहीं, बल्कि जीवनशैली से संचालित होती है। महंगे स्मार्टफोन, प्रीमियम बाइक या कार, ब्रांडेड जीवनशैली—इन सबका बड़ा हिस्सा अक्सर किस्तों पर आधारित होता है। समाज में “सफल दिखने” का दबाव युवाओं को उधार आधारित उपभोग की ओर धकेल रहा है।
क्रेडिट संस्कृति और कर्ज का चक्र
मल्टीनेशनल कंपनियों में नौकरी लगते ही युवाओं को बैंक और वित्तीय संस्थान आसानी से क्रेडिट कार्ड और त्वरित ऋण उपलब्ध करा देते हैं। शुरुआती महीनों में यह सुविधा आकर्षक लगती है, परंतु धीरे-धीरे “एक कर्ज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज” लेने की प्रवृत्ति जन्म लेती है।
जब ऐसा होता है, तो व्यक्ति की क्रेडिट हिस्ट्री प्रभावित होती है। भारत में 300 से 900 के बीच निर्धारित क्रेडिट स्कोर किसी भी व्यक्ति की वित्तीय साख का पैमाना बन चुका है। कम स्कोर न केवल भविष्य के ऋण को महंगा बनाता है, बल्कि आर्थिक अस्थिरता का संकेत भी देता है।
परिवारों की अनभिज्ञता
अक्सर युवा अपने घर से दूर महानगरों में अकेले रहते हैं। परिवार यह मानकर संतुष्ट रहता है कि “बच्चा अच्छी नौकरी में है, तरक्की कर रहा है।” परंतु कई मामलों में वास्तविकता यह होती है कि वह बढ़ते कर्ज और मानसिक दबाव से जूझ रहा होता है।
विवाह के बाद जब आर्थिक जिम्मेदारियाँ बढ़ती हैं, तब छिपे हुए ऋण, ईएमआई का बोझ और खर्चों की असमान अपेक्षाएँ दांपत्य जीवन में तनाव का कारण बन सकती हैं। हाल के वर्षों में पारिवारिक विवादों, तलाक और घरेलू तनाव के पीछे वित्तीय असंतुलन एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में सामने आया है।
कुंडली से आगे क्रेडिट स्कोर भी मांगी जानी चाहिए !
इस बदलते परिदृश्य में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि विवाह पूर्व वित्तीय पारदर्शिता उतनी ही आवश्यक है जितनी स्वभाव और संस्कारों की समझ।
“क्रेडिट स्कोर मिलाना” कोई शाब्दिक अनिवार्यता नहीं, बल्कि एक प्रतीक है—आर्थिक ईमानदारी और जिम्मेदारी का।
परिवारों को चाहिए कि वे खुलकर आय, बचत, निवेश और दायित्वों पर चर्चा करें। यह अविश्वास नहीं, बल्कि भविष्य की स्थिरता के लिए परिपक्व दृष्टिकोण है।
विवाह केवल सामाजिक रस्म नहीं, दीर्घकालिक साझेदारी है। यदि कुंडली गुणों का मेल दिखाती है, तो वित्तीय स्थिति जीवन की वास्तविकताओं का आईना होती है।
समय की मांग है कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाया जाए।
शायद अब प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “गुण कितने मिले?”,
बल्कि यह भी होना चाहिए कि “आर्थिक स्थिति कितनी स्पष्ट है?”
क्योंकि मजबूत रिश्ते विश्वास पर टिकते हैं—और विश्वास की नींव पारदर्शिता से बनती है।
रितेश महेश्वरी



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