रण में प्रदर्शित दुनिया का सबसे विशाल खादी तिरंगा, आत्मनिर्भर नए भारत की गाथा
कच्छ का सफेद रण-जहां से आपको धरती और आसमान का क्षितिज दिखता है-न सिर्फ एक कुदरती करिश्मा बन गया है, बल्कि नए भारत के बदलते आत्मविश्वास की जीती-जागती निशानी भी है। इस विशाल फैलाव के बीच, हाल ही में रिपब्लिक-डे के मौके पर दुनिया के सबसे बड़े आइकॉनिक खादी तिरंगे का एक शानदार और दिव्य प्रदर्शन हुआ। यह सिर्फ एक इवेंट नहीं था, बल्कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की दूर की सोच वाली लीडरशिप में देसी परंपरा, राष्ट्रीय संकल्प और आज के भारत के विकास के विजन का एक मजबूत पब्लिक मैनिफेस्टेशन था।
यह अद्भुत, अविश्वसनीय और यकीन न करने लायक नजारा देश के कारीगरों, सेना के जवानों और नागरिकों ने देखा। इसने अपने आप में एक नया रिकॉर्ड भी बनाया कि देश भर के लाखों खादी कारीगरों ने वीडियो मैसेज के जरिए राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देकर इतिहास रच दिया। यह पल इस बात पर जोर देता है कि राष्ट्र-निर्माण किसी एक संस्था या वर्ग की कोशिश नहीं है, बल्कि सामूहिक इरादे का नतीजा है। यह तिरंगा सिर्फ कपड़े का हिस्सा नहीं है, बल्कि सोच का हिस्सा है। खादी, जिसे कभी आजादी के आंदोलन की आत्मा कहा जाता था, आज आत्मनिर्भर भारत की ऊर्जा के तौर पर फिर से परिभाषित हो रही है। महात्मा गांधी की यह बात-’खादी, भारत की आर्थिक आजादी और आत्म-सम्मान की निशानी है’-आज के भारत में एक नए मतलब के साथ जिंदा हो रही है।
इस राष्ट्रीय पुनर्जागरण को समझने के लिए, बस भुज को देखना होगा। एक बार एक भयानक भूकंप ने इस शहर को गहरे घाव दिए थे, लेकिन उसी मुश्किल घड़ी में, एक दूर की सोचने वाले ने पुनर्निर्माण को सिर्फ एक जरूरत नहीं बल्कि एक मौके के तौर पर देखा। उस समय के मुख्यमंत्री और आज के प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, भुज का फिर से जन्म हुआ-प्लांड शहरीकरण, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और कम्युनिटी रेस्टोरेशन के जरिए।
25 साल के पुनर्निर्माण के बाद, भुज न सिर्फ मजबूती से खड़ा है, बल्कि आगे बढ़ रहा है। यह इस बात का सबूत है कि जब लीडरशिप में साफगोई और पक्का इरादा हो, तो मुसीबत भी विकास की शुरुआत बन सकती है।

भौगोलिक रूप से, भुज का महत्व एक बॉर्डर इलाके में होने की वजह से और बढ़ जाता है। यहाँ, विकास और सुरक्षा एक-दूसरे के उलट नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे को पूरा करते हैं। तैनात भारतीय सैनिकों की चैकस मौजूदगी हमें याद दिलाती है कि किसी देश की आर्थिक तरक्की उसकी स्ट्रेटेजिक स्थिरता पर निर्भर करती है। ’ऑपरेशन सिंदूर’ की भावना से प्रेरित होकर, खादी तिरंगा (दुनिया का सबसे बड़ा आइकॉनिक तिरंगा) को सलाम करना, असल में, उन अनगिनत हीरो के लिए देश का सामूहिक आभार है, जिनके बलिदान से विकास का बिना रुके बहाव पक्का होता है।
अगर तिरंगा देश के गौरव का प्रतीक है, तो खादी उस गौरव की आत्मा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने खादी को पुरानी यादों से ऊपर उठाकर भविष्य की स्ट्रेटेजी का हिस्सा बनाया है। उनके शब्दों में, ’खादी सिर्फ एक कपड़ा नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की आइडियोलॉजी और मास मूवमेंट है।’
इस मास मूवमेंट ने पूरे देश को एक कर दिया है। इसके नतीजे साफ हैं। आज, ग्राम स्वराज का कॉन्सेप्ट प्रैक्टिकल इकोनॉमिक्स में बदलता दिख रहा है। खादी और विलेज इंडस्ट्रीज के प्रोडक्ट्स की बिक्री 1.70 लाख करोड़ रुपये को पार कर गई है और बहुत जल्द 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचने वाली है। इससे भी ज्यादा खास बात यह है कि इस सेक्टर ने 20 मिलियन से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है। एक ऐसा बदलाव जो ग्रामीण भारत को सिर्फ कंज्यूमर ही नहीं, बल्कि एक प्रोडक्टिव ताकत के तौर पर स्थापित करता है। बॉर्डर इलाकों में ट्रेनिंग देने, टूल बांटने और लोकल स्किल को बढ़ावा देने की कोशिशों ने डेवलपमेंट का एक डीसेंट्रलाइज्ड मॉडल पेश किया है। पिछले 11 सालों में 2.88 लाख से ज्यादा मशीनों और टूलकिट का डिस्ट्रीब्यूशन साफ दिखाता है कि भारत का डेवलपमेंट अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। यह गांवों, कॉटेज इंडस्ट्री और पारंपरिक कारीगरों के जरिए एक बड़ा सोशल बेस बना रहा है।
इस बदलाव के दिल में मेहनत की इज्जत है। खादी कारीगरों की मजदूरी बढ़कर 15 रुपये प्रति हैंक हो गई है, और इसे 20 रुपये प्रति हैंक करने का फैसला दिखाता है कि इकोनॉमिक डेवलपमेंट का मतलब सच में मजदूरी बढ़ाना है, साथ ही इज्जत भी कायम करना है। यह बात सच में एक उभरते हुए ’कारीगर युग’ का इशारा है-एक ऐसा समय जिसमें परंपरा और टेक्नोलॉजी मिलकर नई खुशहाली ला रहे हैं।
डिजिटल युग में सिंबल की ताकत और बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर #IconicKhadiTiranga को 20 मिलियन से ज्यादा व्यूज मिलना सिर्फ तारीफ की निशानी नहीं है, बल्कि एक साइकोलॉजिकल बदलाव भी है। खास तौर पर, इस निशान से Gen-Z का कनेक्शन यह बताता है कि नई पीढ़ी ग्लोबल उम्मीदों के साथ-साथ अपनी कल्चरल पहचान को भी उतने ही पक्के यकीन के साथ अपनाना चाहती है।
कच्छ के सफेद रण में शान और खूबसूरती से चमकता तिरंगा, आखिरकार हमें एक बड़ी सच्चाई की ओर ले जाता है- देश बनाना किसी एक पॉलिसी, किसी एक प्रोजेक्ट या किसी एक समय का नतीजा नहीं है। यह विजन, मजबूती और सबकी आस्था पर बनता है। जब विरासत को संजोया जाता है, जब डेवलपमेंट सबको साथ लेकर चलने वाला होता है, जब बॉर्डर सुरक्षित होते हैं, और जब लीडरशिप में भविष्य की कल्पना करने की हिम्मत होती है-तब बदलाव एक घटना नहीं, बल्कि एक युग बन जाता है।
भुज का नया जीवन, खादी की वापसी और ग्राम स्वराज का नया जोश मिलकर न सिर्फ संभावनाओं वाला, बल्कि कामयाबियों वाला भारत बना रहे हैं-आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और निर्णायक।
’सफेद रेगिस्तान’ के कैनवस पर रोशन (खादी का मशहूर तिरंगा) इस भारत का झंडाबरदार है-एक ऐसा झंडा जो न सिर्फ हवा में लहराता है, बल्कि दुनिया भर में एक देश की सोच को एक नई पहचान भी देता है।
लेखक श्री मनोज कुमार
अध्यक्ष,खादी और ग्रामोद्योग,
भारत सरकार



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